It's Not What You Say...it's What You Do (Hindi)


अगर आपको लगता है कि सिर्फ मीटिंग्स में बड़ी बड़ी बातें करने और कूल स्लोगन्स चिपकाने से आपकी कंपनी रॉकेट बन जाएगी तो बधाई हो आप एक मीठे धोखे में जी रहे हैं। बिना एग्जीक्यूशन के आपकी सारी प्लानिंग वैसी ही है जैसे बिना पेट्रोल की फरारी जो खड़ी खड़ी बस धूल चाट रही है और आप पीछे बैठे उसे धक्का मार रहे हैं।

लॉरेंस हॉटन की यह बुक हमें आईना दिखाती है कि कैसे कथनी और करनी का अंतर अच्छे खासे बिजनेस को ले डूबता है। चलिए समझते हैं वो ३ धांसू लेसन जो आपके काम करने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देंगे।


लेसन १ : क्लेरिटी का असली मतलब और कन्फ्यूजन का अंत

ज्यादातर कंपनियों में जब बॉस कहता है कि हमें अपना बेस्ट देना है तो आधे एम्प्लॉई को लगता है कि उन्हें ज्यादा देर तक ऑफिस में रुकना है और बाकी आधे सोचते हैं कि शायद अब फ्री में कॉफी नहीं मिलेगी। लॉरेंस हॉटन कहते हैं कि बिना साफ इंस्ट्रक्शन के काम करना अंधेरे कमरे में काली बिल्ली ढूंढने जैसा है जो वहां है ही नहीं। आप खुद को बहुत बड़ा विजनरी समझ सकते हैं पर अगर आपकी टीम को यही नहीं पता कि आज शाम तक उन्हें असल में क्या उखाड़ना है तो आपकी लीडरशिप सिर्फ एक खोखली आवाज है।

सोचिए आप एक टैक्सी में बैठते हैं और ड्राइवर से कहते हैं कि मुझे बहुत अच्छी जगह ले चलो जहाँ बहुत शांति हो। अब वो आपको श्मशान घाट छोड़ दे या किसी लाइब्रेरी में ये उसकी मर्जी है क्योंकि आपने उसे डेस्टिनेशन बताई ही नहीं। ऑफिस में भी यही होता है जब आप कहते हैं कि हमें कस्टमर सर्विस सुधारनी है। सेल्स वाला सोचता है कि शायद डिस्काउंट देना है और सपोर्ट वाला सोचता है कि शायद अब ज्यादा तमीज से बात करनी है। नतीजा यह निकलता है कि महीने के अंत में सब एक दूसरे का मुंह ताकते हैं और आप सोचते हैं कि मेरी टीम ही निकम्मी है।

सच्चाई तो यह है कि लोग निकम्मे नहीं होते बस उन्हें यह नहीं पता होता कि जीत की लाइन कहाँ है। जब गोल्स धुंधले होते हैं तो काम भी आधा अधूरा ही होता है। हॉटन हमें समझाते हैं कि हमें अपनी भाषा से वो सारे शब्द हटा देने चाहिए जिनका मतलब हर इंसान अलग निकाल सकता है। अगर आप चाहते हैं कि सेल १० परसेंट बढ़े तो सीधा बोलिए कि भाई मुझे १० परसेंट की ग्रोथ चाहिए। इसमें कोई रॉकेट साइंस नहीं है पर लोग इसे इतना कॉम्प्लिकेटेड बना देते हैं जैसे नासा का कोई सीक्रेट मिशन हो।

एक बार एक मैनेजर ने अपनी टीम से कहा कि हमें इस प्रोजेक्ट में आग लगा देनी है। अगले दिन ऑफिस के किचन में माइक्रोवेव जल रहा था क्योंकि किसी ने सच में आग लगाने की कोशिश की थी। यह सुनने में मजाक लगता है पर बिना क्लेरिटी के आपके रिजल्ट्स भी ऐसे ही जलकर राख हो जाते हैं। जब तक हर इंसान को अपनी जिम्मेदारी का क ख ग नहीं पता होगा तब तक आप सिर्फ शोर मचा रहे हैं काम नहीं कर रहे। सही लीडर वो नहीं है जो सबसे ज्यादा बोलता है बल्कि वो है जिसकी बात सुनकर हर किसी को अपना रोल एकदम क्रिस्टल क्लियर दिखने लगे।

अगले लेसन में हम देखेंगे कि जब सबको अपना काम पता चल जाता है तो फिर असली सिरदर्द कहाँ शुरू होता है।


लेसन २ : अकाउंटेबिलिटी की जंजीर और बहानेबाजी का अंत

जब काम बिगड़ता है तो ऑफिस में एक बहुत ही मजेदार खेल शुरू होता है जिसे कहते हैं उंगली उठाना। मार्केटिंग वाला कहता है कि सेल्स वालों को बेचना नहीं आता और सेल्स वाला कहता है कि प्रोडक्ट ही घटिया है। अंत में बेचारा वो कस्टमर पछताता है जिसने गलती से आप पर भरोसा कर लिया था। लॉरेंस हॉटन कहते हैं कि जब तक आप यह तय नहीं करते कि किस गलती का ठीकरा किसके सिर फूटेगा तब तक आपकी कंपनी एक ऐसा जहाज है जिसका कोई कैप्टन नहीं है। बस सब अपनी अपनी लाइफ जैकेट पहनकर डूबने का इंतजार कर रहे हैं।

अकाउंटेबिलिटी का मतलब यह नहीं है कि आप हाथ में डंडा लेकर सबके पीछे पड़ जाएं। इसका मतलब यह है कि हर किसी को पता हो कि अगर गेंद उनके पाले में गिरी है तो उसे गोल तक ले जाने की जिम्मेदारी उनकी है। हमारे यहाँ दिक्कत यह है कि हम जिम्मेदारी तो बाँट देते हैं पर उसे फॉलो अप करना भूल जाते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप जिम की मेंबरशिप ले लें और सोचें कि पैसे दे दिए हैं तो अब बॉडी अपने आप बन जाएगी। भाई साहब पसीना तो आपको ही बहाना पड़ेगा और अगर नहीं बहेगा तो ट्रेनर आपको टोकने वाला होना चाहिए।

एक बहुत ही सीरियस मैनेजर था जो अपनी हर मीटिंग में कहता था कि हमें ओनरशिप लेनी चाहिए। उसने अपनी टीम को एक टास्क दिया और तीन हफ्ते तक पूछा ही नहीं कि क्या हुआ। जब क्लाइंट ने गाली दी तब उसे याद आया कि ओनरशिप तो उसने दी थी पर लगाम अपने पास नहीं रखी थी। असल में जब आप किसी को जिम्मेदार बनाते हैं तो आपको उन्हें वो रिसोर्स और पावर भी देनी पड़ती है जिससे वो काम पूरा कर सकें। बिना पावर के जिम्मेदारी देना वैसा ही है जैसे किसी को बिना बंदूक के बॉर्डर पर खड़ा कर देना और कहना कि अब दुश्मन को धूल चटा दो।

हॉटन यहाँ बहुत गहरी बात कहते हैं कि अकाउंटेबिलिटी ऊपर से नीचे की तरफ बहनी चाहिए। अगर बॉस खुद मीटिंग में लेट आता है और टीम को डिसिप्लिन सिखाता है तो टीम भी मन ही मन उसका मजाक उड़ाती है। लोग आपके शब्दों को नहीं बल्कि आपके एक्शन को कॉपी करते हैं। अगर आप चाहते हैं कि टीम वादे पूरे करे तो पहले आपको अपने वादे निभाने होंगे। यहाँ कोई भी बेवकूफ नहीं है सब देख रहे हैं कि कब आप सिस्टम का फायदा उठा रहे हैं और कब आप सच में काम कर रहे हैं।

ज्यादातर लोग अकाउंटेबिलिटी से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सजा देने का एक तरीका है। पर हकीकत में यह भरोसा जीतने का जरिया है। जब आपकी टीम को पता होता है कि उनका काम देखा जा रहा है और उसकी वैल्यू है तो वो जी जान लगा देते हैं। लेकिन अगर उन्हें पता हो कि चाहे वो काम करें या न करें महीने के आखिर में सैलरी तो आ ही जाएगी और कोई कुछ पूछेगा नहीं तो फिर वो ऑफिस में बैठकर सिर्फ चाय और गॉसिप का लुत्फ उठाएंगे।

अब जब हमने यह देख लिया कि जिम्मेदारी कैसे तय होती है तो अगले लेसन में हम समझेंगे कि असली जादू तब होता है जब ये सारी प्लानिंग हकीकत की जमीन पर उतरती है।


लेसन ३ : स्ट्रेटजी और एक्शन का मिलन और असली रिजल्ट्स

दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो सिर्फ ख्याली पुलाव पकाते हैं और दूसरे वो जो वाकई में चूल्हा जलाकर खाना बनाते हैं। बिजनेस की दुनिया में भी यही हाल है। बोर्ड रूम में बैठकर पीपीटी स्लाइड्स पर रंगीन ग्राफ बनाना बहुत आसान है, पर जब बात उन ग्राफ्स को हकीकत में बदलने की आती है, तो बड़े बड़े दिग्गजों के पसीने छूट जाते हैं। लॉरेंस हॉटन कहते हैं कि एक औसत स्ट्रेटजी जिसे जबरदस्त तरीके से लागू किया गया हो, वो उस महान स्ट्रेटजी से कहीं बेहतर है जो सिर्फ फाइलों में दबी धूल चाट रही है।

सोचिए आपने वजन घटाने का एक बहुत ही फैंसी डाइट प्लान बनाया है। आपने महंगे जूते खरीदे, जिम की टी-शर्ट ली और इंस्टाग्राम पर पोस्ट भी डाल दी कि मंडे से ट्रांसफॉर्मेशन शुरू। लेकिन मंडे की सुबह जब अलार्म बजा, तो आपने उसे थप्पड़ मारकर सुला दिया और खुद चादर तानकर सो गए। आपकी स्ट्रेटजी तो वर्ल्ड क्लास थी, पर आपका एक्शन जीरो था। ऑफिस में भी यही होता है। लीडर्स बड़ी बड़ी बातें करते हैं कि हम मार्केट बदल देंगे, हम रिवोल्यूशन ले आएंगे, पर जब काम शुरू करने की बारी आती है, तो सब एक दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं कि शुरुआत कौन करेगा।

असली दिक्कत यह है कि हम प्लान तो पहाड़ जैसा बनाते हैं, पर उसे छोटे छोटे टुकड़ों में नहीं बांटते। जब काम इतना बड़ा दिखने लगता है कि समझ ही न आए कि पहला कदम कहाँ रखें, तो इंसान हार मानकर बैठ जाता है। हॉटन हमें सिखाते हैं कि एग्जीक्यूशन का असली सीक्रेट है छोटे और लगातार कदम। अगर आप रोज सिर्फ एक परसेंट भी सुधार करते हैं, तो साल के अंत तक आप कहाँ पहुँच जाएंगे, इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते। पर लोग तो एक ही दिन में अंबानी बनना चाहते हैं और जब ऐसा नहीं होता, तो वो सिस्टम को दोष देने लगते हैं।

एक बार एक कंपनी ने तय किया कि वो अपनी डिलीवरी स्पीड दोगुनी कर देंगे। उन्होंने लाखों रुपये सॉफ्टवेयर पर खर्च किए, बड़ी बड़ी मीटिंग्स कीं, पर डिलीवरी फिर भी लेट हो रही थी। जब गहराई से जांच हुई, तो पता चला कि डिलीवरी बॉय के पास बाइक की चाबी रखने की कोई फिक्स जगह ही नहीं थी और वो आधा घंटा चाबी ढूंढने में ही बर्बाद कर देता था। यह सुनने में छोटा लगता है, पर यही वो छोटे छोटे छेद हैं जो आपके बिजनेस की नैया डुबो देते हैं। बड़ी बड़ी स्ट्रेटजी तब तक काम नहीं करतीं, जब तक आप जमीन पर मौजूद इन छोटी समस्याओं को हल नहीं करते।

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं है, बस सही दिशा में किया गया लगातार काम है। जो लोग सिर्फ बातें करते हैं, वो इतिहास पढ़ते हैं और जो उन बातों को सच कर दिखाते हैं, वो इतिहास रचते हैं। अब फैसला आपका है कि आपको सिर्फ एक अच्छा स्पीकर बनना है या एक ऐसा लीडर, जिसकी मिसाल लोग उसके काम से दें। अपनी जुबान को आराम दीजिए और अपने हाथों को काम पर लगाइए, क्योंकि दुनिया को आपके इरादों से नहीं, आपके नतीजों से मतलब है।


तो, क्या आप भी अब तक सिर्फ बातें ही कर रहे थे? आज ही अपने उस एक पेंडिंग काम को पकड़िए जिसे आप हफ्तों से टाल रहे हैं और उसे पूरा करके ही दम लीजिए। अगर यह आर्टिकल आपको अपनी असलियत का आईना लगा हो, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो सिर्फ बड़ी बड़ी डींगे हांकते हैं पर करते कुछ नहीं। नीचे कमेंट में बताएं कि आपका वो कौन सा वादा है जो आप खुद से पूरा नहीं कर पा रहे हैं। चलिए, अब बातें बंद और काम शुरू।

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