Know-How (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर गधों की तरह मेहनत करते हैं पर प्रमोशन के वक्त बॉस को आपका चेहरा याद तक नहीं आता। शायद आपमें टैलेंट की नहीं बल्कि उस नो हाउ की कमी है जो असली लीडर्स को आपसे मीलों आगे रखती है। बिना इन स्किल्स के आप बस भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे और दुनिया आपको पीछे छोड़ देगी।

आज हम राम चरन की मशहूर किताब नो हाउ से वो ८ सीक्रेट स्किल्स सीखेंगे जो एक परफॉर्मर और फेलियर के बीच की दीवार को गिरा देती हैं। चलिए इन ३ खास लेसन के साथ अपने करियर को एक नई उड़ान देते हैं।


लेसन १ : बिजनेस की नस पहचानना और सही पोजिशनिंग करना

जरा सोचिए आप एक ऐसी जगह पर जूस की दुकान खोलकर बैठे हैं जहाँ लोग सिर्फ कड़क चाय के दीवाने हैं। अब आप चाहे दुनिया का सबसे बेस्ट संतरा इस्तेमाल कर लें या अपनी मुस्कान से सबका दिल जीतना चाहें पर आपका बिजनेस तो डूबेगा ही। राम चरन कहते हैं कि बहुत से लोग मेहनत तो बहुत करते हैं पर उन्हें यही नहीं पता होता कि मार्केट में उनकी जगह कहाँ है। इसे ही वह पोजिशनिंग कहते हैं। अगर आप अपनी कंपनी या अपने काम को सही जगह फिट नहीं कर पा रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपनी एनर्जी नाली में बहा रहे हैं।

बिजनेस एक्यूमेन का मतलब है यह समझना कि आखिर पैसा आता कहाँ से है। कई मैनेजर्स को लगता है कि बस ऑफिस में बैठकर ईमेल भेजना ही असली काम है। पर भाई साहब अगर आप यह नहीं समझ पा रहे कि कस्टमर की जेब से पैसा किस बात के लिए निकल रहा है तो आप बस एक महंगे क्लर्क बनकर रह जाएंगे। जैसे हमारे पड़ोस के शर्मा जी को ही ले लीजिए। उन्होंने बहुत बड़ा जिम खोला पर ऐसी जगह जहाँ सब लोग सुबह उठकर योग और फ्री वाली सैर करना पसंद करते हैं। अब शर्मा जी वहां जिम की मशीनों पर धूल झाड़ रहे हैं। उनके पास मेहनत की कमी नहीं थी बस उन्हें इस बात का नो हाउ नहीं था कि उनका बिजनेस उस जगह के लिए सही है भी या नहीं।

परफॉर्म करने वाले लोग हमेशा यह देखते हैं कि मार्केट की हवा किस तरफ बह रही है। वह खुद को और अपने बिजनेस को उस जगह रखते हैं जहाँ डिमांड सबसे ज्यादा हो। अगर आप भी अपने करियर में अटके हुए हैं तो एक बार रुककर सोचिए। क्या आप वो स्किल्स बेच रहे हैं जिनकी आज जरूरत है। या फिर आप अभी भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपना रहे हैं जो दादा जी के जमाने में चलते थे। सही पोजिशनिंग का मतलब यह नहीं कि आप सिर्फ सबसे अच्छे हों। इसका मतलब यह है कि आप सही समय पर सही जगह पर हों।

जब आप मार्केट की नस पकड़ लेते हैं तो काम आसान हो जाता है। आपको चिल्ला चिल्लाकर अपनी तारीफ नहीं करनी पड़ती। लोग खुद आपके पास आते हैं। यह स्किल आपको रातों रात नहीं आती। इसके लिए आपको अपनी आंखें और कान खुले रखने पड़ते हैं। आपको यह देखना होगा कि आपके कॉम्पिटिटर क्या गलती कर रहे हैं। जिस दिन आपने यह जान लिया कि सामने वाले की कमजोरी आपकी ताकत बन सकती है उसी दिन आप एक साधारण एम्प्लॉई से एक लीडर बन जाएंगे। तो अगली बार जब आप अपने काम की प्लानिंग करें तो सिर्फ मेहनत के बारे में मत सोचिए। यह सोचिए कि क्या आपकी जगह सही है। क्योंकि गलत पटरी पर दौड़ती हुई ट्रेन चाहे कितनी भी तेज हो वह मंजिल तक कभी नहीं पहुंचती।


लेसन २ : सही खिलाड़ियों को चुनना और टीम को सेट करना

अगर आप सोचते हैं कि अकेले आप दुनिया जीत लेंगे तो शायद आप किसी सुपरहीरो फिल्म के असर में हैं। राम चरन साहब साफ कहते हैं कि एक लीडर की असली ताकत उसके दिमाग में नहीं बल्कि उसकी टीम में होती है। पर यहाँ ट्विस्ट यह है कि सही टीम बनाना कोई सब्जी खरीदने जैसा काम नहीं है। बहुत से लोग सिर्फ डिग्री और बड़े बड़े सर्टिफिकेट देखकर लोगों को काम पर रख लेते हैं। बाद में पता चलता है कि बंदे के पास दिमाग तो है पर एटीट्यूड किसी नवाब जैसा है। ऐसे लोग आपकी प्रोग्रेस की गाड़ी में ब्रेक लगाने का काम करते हैं।

जरा सोचिए आपने एक क्रिकेट टीम बनाई और उसमें ११ के ११ ओपनिंग बैट्समैन भर लिए। अब जब विकेट गिरेंगे या फील्डिंग की बारी आएगी तब क्या होगा। टीम का कचरा होना तय है। परफॉर्म करने वाले लीडर्स के पास यह नो हाउ होता है कि उन्हें कब एक आक्रामक प्लेयर चाहिए और कब एक ऐसा इंसान जो शांति से मैच को संभाल सके। आपको सिर्फ टैलेंट नहीं चाहिए आपको वो लोग चाहिए जो उस काम के लिए बने हों। अगर आप किसी ऐसे इंसान को सेल्स में डाल देंगे जिसे लोगों से बात करने में डर लगता है तो आप उसकी जिंदगी और अपना बिजनेस दोनों बर्बाद कर रहे हैं।

हमारे एक दोस्त हैं वर्मा जी। उन्होंने अपनी कंपनी के लिए सबसे टॉपर लड़के को मैनेजर बनाया। उस लड़के को कोडिंग तो जबरदस्त आती थी पर इंसानों से बात करना उसे पहाड़ चढ़ने जैसा लगता था। नतीजा यह हुआ कि पूरी टीम ने एक महीने में इस्तीफा दे दिया। वर्मा जी को लगा कि लड़का होशियार है तो सब संभाल लेगा। पर भाई साहब लीडरशिप का मतलब खुद काम करना नहीं बल्कि दूसरों से काम करवाना होता है। सही लोगों को चुनने का मतलब है उनकी नब्ज पहचानना। आपको देखना होगा कि क्या उस इंसान के अंदर वो आग है जो आपके विजन को अपना मान सके।

अक्सर हम लोगों को इसलिए काम पर रखते हैं क्योंकि वो हमें पसंद आते हैं या वो हमारी तरह बात करते हैं। यह सबसे बड़ी गलती है। आपको अपनी परछाई नहीं बल्कि अपनी कमी को पूरा करने वाले लोग चाहिए। अगर आप प्लानिंग में अच्छे हैं तो आपको ऐसा बंदा चाहिए जो एग्जीक्यूशन में माहिर हो। जो लीडर सही लोगों को सही जगह फिट करना सीख जाता है उसे फिर ऑफिस में बैठकर डंडा चलाने की जरूरत नहीं पड़ती। काम अपने आप होने लगता है।

याद रखिए एक सड़ा हुआ सेब पूरी टोकरी को खराब कर सकता है। अगर आपकी टीम में कोई ऐसा है जो सिर्फ नेगेटिविटी फैलाता है तो उसे बाहर का रास्ता दिखाने में देरी मत कीजिए। सुनने में यह थोड़ा कठोर लग सकता है पर एक लीडर का काम सबको खुश करना नहीं बल्कि रिजल्ट्स लाना होता है। जब आप सही टीम बना लेते हैं तो आपका आधा बोझ हल्का हो जाता है। तब आप छोटी मोटी चीजों में उलझने के बजाय बड़े गोल्स पर फोकस कर पाते हैं। असली नो हाउ यही है कि आप लोगों के टैलेंट को पहचानें और उन्हें वहां रखें जहाँ वो चमक सकें।


लेसन ३ : सोशल सिस्टम का जादू और तालमेल बिठाना

क्या आपने कभी ऐसी शादी देखी है जहाँ दूल्हा और फूफा जी के बीच बात ही नहीं हो रही। बाहर से सब चकाचक दिखता है पर अंदर ही अंदर माहौल गर्म होता है। ऑफिस और बिजनेस का हाल भी कुछ ऐसा ही है। राम चरन इसे सोशल सिस्टम कहते हैं। इसका मतलब है वो तरीका जिससे लोग एक दूसरे से बात करते हैं और मिलकर काम करते हैं। अगर आपके ऑफिस में लोग एक दूसरे की टांग खींचने में लगे हैं या जानकारी छुपा कर रखते हैं तो समझ लीजिए कि आपका जहाज डूबने वाला है। भले ही आपके पास दुनिया की सबसे अच्छी मशीनें हों पर अगर इंसानों के बीच का तार टूटा हुआ है तो आउटपुट जीरो ही आएगा।

परफॉर्म करने वाले लीडर्स के पास यह जबरदस्त नो हाउ होता है कि वो लोगों के बीच के इस कचरे को कैसे साफ करें। वो जानते हैं कि जब तक लोग खुलकर अपनी बात नहीं रखेंगे तब तक असली प्रॉब्लम सामने नहीं आएगी। हमारे ऑफिस के एक बॉस थे जो मीटिंग में सबको बोलने का मौका देते थे पर सुनते सिर्फ अपनी ही थे। लोग आते थे सिर हिलाते थे और वापस जाकर वही करते थे जो वो चाहते थे। इसे कहते हैं दिखावे का सोशल सिस्टम। जहाँ सब हां में हां मिला रहे हैं पर अंदर से सब एक दूसरे को कोस रहे हैं। असली परफॉरमेंस तब आती है जब लोग बिना डरे सच बोल सकें और गलतियों से सीख सकें।

इस सिस्टम को मैनेज करना कोई रॉकेट साइंस नहीं है पर इसके लिए आपको अपना ईगो जेब में रखना पड़ता है। जैसे एक अच्छे ढाबे पर वेटर से लेकर रसोइया तक सब जानते हैं कि ग्राहक को गरम रोटी मिलनी चाहिए। वहां कोई यह नहीं कहता कि यह मेरा काम नहीं है। अगर रोटी जल गई तो रसोइया उसे बदल देता है और वेटर उसे हंसी खुशी सर्व करता है। बिजनेस में भी यही तालमेल चाहिए। जब आप लोगों को एक कॉमन गोल से जोड़ देते हैं तो वो छोटे मोटे झगड़ों को भूल जाते हैं। आपको एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ काम करने में मजा आए न कि लोग मंडे का इंतजार सजा की तरह करें।

अक्सर हम सोचते हैं कि सिर्फ रूल्स और रेगुलेशन से कंपनी चलती है। पर सच तो यह है कि कंपनी भरोसे से चलती है। अगर आपकी टीम को आप पर और एक दूसरे पर भरोसा है तो वो पहाड़ भी हिला सकते हैं। इस भरोसे को बनाने के लिए आपको पारदर्शी होना पड़ेगा। जब चीजें खराब हों तो सबको बताइए और जब अच्छी हों तो सबका साथ मिलकर जश्न मनाइए। यह सोशल सिस्टम ही है जो एक साधारण टीम को एक अजेय सेना में बदल देता है। जो लीडर इसे समझ गया उसे फिर माइक्रो मैनेजमेंट करने की जरूरत नहीं पड़ती।


तो दोस्तों, राम चरन की ये ८ स्किल्स और हमारे ये ३ खास लेसन आपको यह बताने के लिए काफी हैं कि सिर्फ कड़ी मेहनत आपको टॉप पर नहीं ले जाएगी। आपको अपनी पोजिशनिंग सुधारनी होगी सही खिलाड़ियों को अपनी टीम में शामिल करना होगा और एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ हर कोई अपना बेस्ट दे सके। क्या आप अभी भी पुराने ढर्रे पर चलना चाहते हैं या आज से ही अपने अंदर वो नो हाउ डेवलप करना शुरू करेंगे जो दुनिया को बदल सकता है। उठिए अपनी स्किल्स पर काम कीजिए और एक ऐसे परफॉर्मर बनिए जिसकी मिसाल लोग दें। अपने करियर की बागडोर अपने हाथ में लीजिए क्योंकि अगर आप अपनी कहानी खुद नहीं लिखेंगे तो कोई और उसे अपने हिसाब से लिख देगा। आज ही कमेंट में बताएं कि इन ३ लेसन में से आप सबसे पहले किस पर काम करने वाले हैं।

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