Loops (Hindi)


अभी भी वही पुराना घिसा-पिटा बिजनेस मॉडल फॉलो कर रहे हो? बधाई हो, आप अपनी मेहनत और पैसा दोनों को आग लगाने की तैयारी में हैं। जबकि दुनिया रॉकेट की तरह आगे बढ़ रही है, आप अभी भी अंधेरे में तीर मार रहे हैं। सच तो यह है कि बिना सही सिस्टम के आपका फेल होना पक्का है।

लेकिन डरिए मत, जे कॉर्नेलियस की किताब लूप्स आपको उस गड्ढे से बाहर निकालने आई है। आज हम इस किताब के उन ३ बड़े लेसन के बारे में बात करेंगे जो आपके प्रोडक्ट बनाने के तरीके को हमेशा के लिए बदल देंगे।


लेसन १ : द पावर ऑफ लूप्स - सीधा रास्ता हमेशा मंजिल तक नहीं ले जाता

मान लीजिए आपने तय किया कि आप दुनिया का सबसे बेहतरीन समोसा बनाएंगे। आप किचन में जाते हैं, दरवाजा बंद करते हैं, और छह महीने तक चुपचाप रिसर्च करते हैं। आप आलू की क्वालिटी, मैदे की थिकनेस और तेल के टेम्परेचर पर पीएचडी कर लेते हैं। छह महीने बाद आप बाहर निकलते हैं और गर्व से अपना समोसा लोगों को खिलाते हैं। पता चलता है कि लोगों को तो अब समोसा पसंद ही नहीं, वो तो मोमोज के दीवाने हो चुके हैं। बधाई हो! आपने अपनी जिंदगी के छह महीने और अपनी सेविंग्स एक ऐसे पत्थर को तराशने में लगा दी जिसे कोई खरीदना ही नहीं चाहता।

जे कॉर्नेलियस अपनी किताब 'लूप्स' में सबसे पहले इसी 'लीनियर थिंकिंग' यानी सीधे रास्ते वाली सोच पर प्रहार करते हैं। इंडिया में हमारे साथ दिक्कत यही है कि हम इमोशनल बहुत जल्दी हो जाते हैं। हमें लगता है कि हमारा आइडिया 'क्रांतिकारी' है और दुनिया बस हमारे ऐप या प्रोडक्ट का इंतजार कर रही है। हम एक सीधा रास्ता चुनते हैं: आइडिया, कोडिंग, लॉन्च और फिर सीधे बर्बादी। हम फीडबैक लेने से ऐसे डरते हैं जैसे कोई स्टूडेंट रिजल्ट देखने से डरता है। हमें लगता है कि अगर किसी ने कमी निकाल दी तो हमारा दिल टूट जाएगा।

लेकिन 'लूप्स' हमें सिखाता है कि बिजनेस कोई सीधी लकीर नहीं है, बल्कि एक सर्कल है। एक ऐसा सर्कल जिसे आपको बार-बार घूमना पड़ेगा। इसे कहते हैं 'फीडबैक लूप'। इसका मतलब है कि आप कुछ छोटा बनाइए, उसे असली लोगों को दिखाइए, उनकी गालियाँ या तारीफ सुनिए, और फिर उसे सुधारिए। यह प्रोसेस तब तक चलता रहना चाहिए जब तक आप परफेक्ट न हो जाएं।

सोचिए, अगर आप पहले दिन ही एक खराब सा समोसा बनाकर पड़ोस वाले शर्मा जी को चखा देते, तो वो पहले ही बता देते कि भाई इसमें नमक कम है। आप अगले दिन नमक ठीक करते और फिर चखाते। इसे कहते हैं 'लूप में काम करना'। इसमें आप अपनी ईगो को साइड में रखकर मार्केट की सुनते हैं। अगर आप लूप का इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, तो आप एक ऐसी ट्रेन चला रहे हैं जिसका ट्रैक ही गायब है। आप बहुत तेजी से तो भाग रहे हैं, लेकिन पहुँचेंगे सिर्फ खाई में।

ज़्यादातर स्टार्टअप्स और बिजनेस सिर्फ इसलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि वो अपनी ही दुनिया में खोए रहते हैं। वो 'परफेक्शन' के पीछे भागते हैं, जबकि हकीकत में मार्केट को परफेक्शन नहीं, सॉल्यूशन चाहिए होता है। आप जितना ज्यादा समय अकेले कमरे में बिताएंगे, आपके फेल होने के चांस उतने ही बढ़ते जाएंगे। इसलिए लूप को अपनाइए। गलतियाँ कीजिए, लेकिन जल्दी कीजिए और उनसे सीखकर तुरंत सुधार कीजिए। याद रखिए, मार्केट आपका सगा नहीं है, उसे आपके पसीने से मतलब नहीं है, उसे सिर्फ अपने काम से मतलब है।


लेसन २ : क्लैरिटी बिफोर कोड - बिना नक्शे के महल नहीं बनते

हमारे यहाँ एक बहुत बड़ी बीमारी है, जिसे मैं 'कोडिंग की खुजली' कहता हूँ। जैसे ही दिमाग में कोई आइडिया आया, हम सीधे लैपटॉप खोलकर कोडिंग करने बैठ जाते हैं या किसी डेवलपर को ढूंढने लगते हैं। हमें लगता है कि अगर हमने दो-चार बटन और एक चमकता हुआ लोगो बना लिया, तो हम मार्क जुकरबर्ग के अगले वारिस बन गए। लेकिन सच तो यह है कि बिना क्लैरिटी के कोड लिखना वैसा ही है जैसे बिना एड्रेस पूछे टैक्सी में बैठ जाना। ड्राइवर पूछेगा कहाँ जाना है, और आप कहेंगे बस चलो, रास्ता बहुत सुहाना है। सुहाना रास्ता आपको पेट्रोल खत्म होने पर बीच सड़क पर ही छोड़ेगा।

जे कॉर्नेलियस कहते हैं कि 'क्लैरिटी' यानी स्पष्टता सबसे महंगा टूल है, लेकिन इसे लोग मुफ्त समझकर इग्नोर कर देते हैं। हम लोग अक्सर फीचर्स की लिस्ट बनाने में इतने खो जाते हैं कि यह भूल जाते हैं कि हम यह बना क्यों रहे हैं। आपका ऐप क्या करेगा? वह यूजर की कौन सी प्रॉब्लम सॉल्व करेगा? क्या वाकई किसी को उस प्रॉब्लम का हल चाहिए, या आप जबरदस्ती लोगों के सर में दर्द पैदा करके अपनी एस्पिरिन बेचना चाहते हैं?

जरा सोचिए, एक ऐसी बिल्डिंग के बारे में जहाँ बिल्डर ने सीधा ईंटें रखना शुरू कर दिया। न कोई मैप है, न कोई आर्किटेक्ट। बीच में उसे याद आया कि अरे, बाथरूम तो बनाना ही भूल गए! अब वो दीवार तोड़ रहा है, फिर पाइप लगा रहा है। इंडिया में स्टार्टअप्स का यही हाल है। हम पहले 'फेंक' देते हैं और फिर 'सेट' करने की कोशिश करते हैं। इससे सिर्फ पैसा बर्बाद नहीं होता, बल्कि आपकी टीम का भरोसा भी टूटता है। जब तक आपको यह क्लियर नहीं है कि आपका प्रोडक्ट किसके लिए है और क्यों है, तब तक कोड की एक लाइन भी लिखना गुनाह है।

लोग अक्सर कहते हैं, 'भाई, एमवीपी (MVP) बना लेते हैं ना, फिर देखेंगे।' लेकिन भाई साहब, एमवीपी का मतलब कचरा बनाना नहीं होता। क्लैरिटी का मतलब है कि आपको पता हो कि आपके यूजर की सबसे बड़ी तकलीफ क्या है। क्या वह एक क्लिक में खाना आर्डर करना चाहता है या उसे आपकी ऐप में फ़िल्टर की दस वैराइटी चाहिए? अक्सर हमें लगता है कि ज्यादा फीचर्स मतलब ज्यादा सक्सेस। हकीकत में, ज्यादा फीचर्स मतलब ज्यादा कंफ्यूजन।

क्लैरिटी लाने का सबसे सस्ता तरीका है कागज और पेन। अपने आइडिया को लिखो, उसे ड्रॉ करो। अगर आप अपने आइडिया को एक १० साल के बच्चे को नहीं समझा सकते, तो यकीन मानिए, आपको खुद भी वो समझ नहीं आया है। जब आपके पास दिमाग में और पेपर पर क्लैरिटी होती है, तब आपका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होता है। तब आपको पता होता है कि अगर आप पैसे लगा रहे हैं, तो वो डूबेंगे नहीं। क्लैरिटी वो टॉर्च है जो आपको अंधेरे जंगल में रास्ता दिखाती है। बिना इसके, आप बस पेड़ों से टकराते रहेंगे और कहेंगे कि किस्मत खराब थी। किस्मत नहीं, आपकी प्लानिंग खराब थी।


लेसन ३ : कॉन्फिडेंस थ्रू डेटा - अपनी फीलिंग्स को डस्टबिन में डालिए

अक्सर जब कोई नया बिजनेस शुरू करता है, तो वो कहता है, 'मुझे अंदर से फीलिंग आ रही है कि ये आइडिया हिट होगा।' भाई साहब, ये जो आपको अंदर से फीलिंग आ रही है ना, ये बिजनेस की समझ नहीं, शायद सुबह का अधकचरा नाश्ता है। जे कॉर्नेलियस बहुत प्यार से समझाते हैं कि बिजनेस 'फीलिंग्स' पर नहीं, 'फैक्ट्स' पर चलता है। इंडिया में हम थोड़े ज्यादा ही जज्बाती लोग हैं। हमें अपने आइडिया से प्यार हो जाता है। हमें लगता है कि हमारा प्रोडक्ट हमारा बच्चा है, और भला अपना बच्चा किसे बुरा लगता है? लेकिन मार्केट कोई रिश्तेदार नहीं है जो आपके बच्चे की झूठी तारीफ करेगा। मार्केट वो सख्त टीचर है जो फेल करने में एक सेकंड भी नहीं लगाता।

'लूप्स' बुक का तीसरा सबसे बड़ा लेसन है - डेटा पर भरोसा करना। अब डेटा का मतलब ये नहीं कि आप नासा के साइंटिस्ट बन जाएं। इसका सीधा सा मतलब है कि जो लोग आपका प्रोडक्ट इस्तेमाल कर रहे हैं, वो क्या कर रहे हैं? क्या वो आपके ऐप को खोलकर तुरंत बंद कर देते हैं? क्या वो पेमेंट पेज तक जाकर वापस आ जाते हैं? अगर १० में से ९ लोग एक ही जगह पर अटक रहे हैं, तो इसका मतलब है कि दिक्कत आपके प्रोडक्ट में है, उनकी किस्मत में नहीं।

हम अक्सर फीडबैक लेने से इसलिए बचते हैं क्योंकि हमें सच सुनने की आदत नहीं है। हम चाहते हैं कि सब कहें 'वाह! क्या बात है'। लेकिन एक सफल आंत्रप्रेन्योर वो है जो 'क्या बात है' से ज्यादा 'ये बेकार है' सुनने के लिए बेताब रहता है। क्योंकि जब कोई कहता है कि ये बेकार है, तभी आपको पता चलता है कि सुधारना क्या है। डेटा वो आईना है जो आपको आपकी असली सूरत दिखाता है, बिना किसी ब्यूटी फ़िल्टर के। अगर डेटा कह रहा है कि लोग नीले बटन की जगह लाल बटन ज्यादा दबा रहे हैं, तो अपनी ईगो को साइड में रखिए और बटन लाल कर दीजिए।

असली कॉन्फिडेंस तब नहीं आता जब आप शीशे के सामने खड़े होकर कहते हैं 'मैं कर सकता हूँ'। असली कॉन्फिडेंस तब आता है जब आपके पास १०० कस्टमर्स का डेटा हो जो कह रहे हों कि 'हमें ये चीज पसंद आ रही है'। अंदाजों पर बिजनेस खड़ा करना वैसा ही है जैसे ताश के पत्तों का महल बनाना। हल्की सी हवा चलेगी और सब ढह जाएगा। लेकिन अगर आपकी नींव डेटा और टेस्टिंग पर टिकी है, तो आप तूफान में भी शान से खड़े रहेंगे।

याद रखिए, आप अपने लिए प्रोडक्ट नहीं बना रहे हैं, आप दूसरों की प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं। तो फैसला भी उन्हीं का होना चाहिए। जब आप डेटा की भाषा समझने लगते हैं, तो आप जुआ खेलना बंद कर देते हैं और एक सॉलिड बिजनेस चलाना शुरू करते हैं। जे कॉर्नेलियस की ये किताब हमें यही सिखाती है कि लूप में रहिए, क्लियर रहिए और हमेशा डेटा की सुनिए। अगर आप इन तीन चीजों को पकड़ लेते हैं, तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता।


तो दोस्तों, क्या आप अभी भी अपनी 'फीलिंग्स' के भरोसे बैठे हैं या अब असली लूप्स में कदम रखने के लिए तैयार हैं? अगर आप वाकई अपने सपनों को एक सफल बिजनेस में बदलना चाहते हैं, तो आज ही अपनी ईगो को छोड़िए और फीडबैक लेना शुरू कीजिए। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो रोज एक नया 'क्रांतिकारी' आइडिया लेकर आता है लेकिन कभी कुछ शुरू नहीं कर पाता। कमेंट में बताइए कि आपके बिजनेस या स्टार्टअप का सबसे बड़ा चैलेंज क्या है? चलिए, मिलकर एक बेहतर कम्युनिटी बनाते हैं।

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