अगर आप अब भी मंदिर के बाहर बैठे उस काले कुत्ते को बिस्किट खिलाकर अपनी बिजनेस की तरक्की की दुआ मांग रहे हैं तो मुबारक हो आप बहुत बड़े वाले बेवकूफ हैं। किस्मत के भरोसे बैठने वाले सिर्फ अपनी बर्बादी का इंतजार करते हैं जबकि स्मार्ट लोग खुद अपना लक लिखते हैं।
आज हम ईलीन शापिरो और हावर्ड स्टीवनसन की शानदार बुक मेक योर ओन लक से वो सीक्रेट्स जानेंगे जो आपको रिस्क लेना सिखाएंगे। तैयार हो जाइए क्योंकि ये ३ लेसन आपकी लाइफ और बिजनेस करने का तरीका हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : लक कोई लॉटरी नहीं बल्कि एक स्ट्रेटेजी है
ज्यादातर लोग लाइफ में फेल होने के बाद एक बहुत ही प्यारा बहाना ढूंढ लेते हैं और वो है मेरी तो किस्मत ही खराब थी। भाई साहब अगर किस्मत ही सब कुछ होती तो अंबानी के घर का रसोइया भी आज अरबपति होता। ईलीन शापिरो और हावर्ड स्टीवनसन अपनी बुक मेक योर ओन लक में सबसे पहले इसी भ्रम को तोड़ते हैं। वो कहते हैं कि लक वो नहीं है जो आसमान से टपकता है बल्कि लक वो है जिसे आप खुद अपनी मेहनत और सही फैसलों से डिजाइन करते हैं।
मान लीजिए आपका एक दोस्त है जो हर हफ्ते लॉटरी का टिकट खरीदता है और दूसरा दोस्त है जो हर हफ्ते अपनी सेविंग्स को किसी अच्छे स्टॉक या बिजनेस में लगाता है। अब दस साल बाद अगर दूसरा दोस्त अमीर बन जाए तो पहला दोस्त पक्का यही कहेगा कि साले की किस्मत चमक गई। भाई उसकी किस्मत चमकी नहीं है उसने उसे घिस घिस कर चमकाया है। उसने स्मार्ट रिस्क लिया और आपने सिर्फ दुआएं मांगी।
असली लक तब आता है जब आपकी तैयारी और सही मौका एक साथ मिल जाते हैं। अगर आप घर में सो रहे हैं और बाहर सोना बरस रहा है तो भी आप गरीब ही रहेंगे क्योंकि आपने दरवाजा खोलने का रिस्क ही नहीं लिया। बिजनेस की दुनिया में लोग अक्सर सोचते हैं कि काश मुझे कोई बड़ा ब्रेक मिल जाए। लेकिन सच तो ये है कि बड़े ब्रेक उन लोगों को मिलते हैं जो छोटे छोटे रिस्क लेने से नहीं डरते।
हकीकत ये है कि हममें से कई लोग रिस्क के नाम से ऐसे डरते हैं जैसे कोई छोटा बच्चा इंजेक्शन से डरता है। हम चाहते हैं कि सब कुछ सेफ रहे। लेकिन भाई साहब सेफ तो सिर्फ श्मशान घाट होता है जहाँ कोई हलचल नहीं होती। अगर आप बिजनेस में हैं और आप रिस्क नहीं ले रहे हैं तो आप सबसे बड़ा रिस्क ले रहे हैं क्योंकि दुनिया बदल रही है और आप वहीं खड़े हैं।
किस्मत के भरोसे बैठने वाले लोग उस ड्राइवर की तरह हैं जो गाड़ी की सीट पर बैठकर ये इंतजार कर रहा है कि कब सारे सिग्नल ग्रीन होंगे तब मैं गाड़ी चलाऊंगा। यकीन मानिए वो ड्राइवर कभी अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचेगा। स्मार्ट रिस्क टेकर वो है जो पीली लाइट पर भी अपनी नजर जमाए रखता है और जैसे ही मौका मिलता है एक्सीलेटर दबा देता है।
इसलिए, अगली बार जब आप किसी को कामयाब देखें तो ये मत कहिए कि वो लकी है। बल्कि ये देखिए कि उसने उस वक्त क्या किया जब सब लोग डर के मारे दुबक कर बैठे थे। लक बनाना एक आर्ट है और इस आर्ट का पहला नियम है मैदान में उतरना। जब तक आप पिच पर खड़े नहीं होंगे तब तक आप छक्का नहीं मार सकते। और हां अगर आप सिर्फ ये सोचकर खुश हो रहे हैं कि भगवान सब देख रहा है तो याद रखिए वो ये भी देख रहा है कि आप कितनी आलस कर रहे हैं।
लेसन २ : कैलकुलेटेड रिस्क और अंधे जुए में फर्क पहचानो
अक्सर लोग रिस्क लेने का मतलब समझते हैं कि अपनी सारी जमा पूंजी किसी ऐसी जगह लगा देना जिसके बारे में उन्हें ए बी सी डी भी नहीं पता। इसे रिस्क नहीं कहते भाई साहब इसे शुद्ध भाषा में बेवकूफी कहते हैं। बुक में लेखक समझाते हैं कि मेक योर ओन लक का मतलब ये नहीं है कि आप आंख बंद करके कुएं में कूद जाएं। बल्कि इसका मतलब ये है कि कूदने से पहले आप ये चेक कर लें कि कुएं में पानी कितना है और आपके पास रस्सी है या नहीं।
आजकल के मोटिवेशनल वीडियो देखकर कई लौंडे जोश में आ जाते हैं और सोचते हैं कि नौकरी छोड़कर चाय की टपरी खोल लेंगे क्योंकि रिस्क है तो इश्क है। अब भाई रिस्क तो चलती बस से कूदने में भी है पर उसमें इश्क नहीं सिर्फ हड्डियां टूटती हैं। स्मार्ट रिस्क वो होता है जहाँ आपको पता हो कि अगर मैं फेल हुआ तो मेरा कितना नुकसान होगा और अगर मैं पास हुआ तो कितना फायदा होगा।
मान लीजिए आप एक नई डिश ट्राई करना चाहते हैं। एक तरीका ये है कि आप पूरा का पूरा रेस्टोरेंट ही खरीद लें ये देखने के लिए कि खाना कैसा है। दूसरा तरीका ये है कि आप सिर्फ एक प्लेट आर्डर करें। अब अगर डिश गंदी निकली तो आपका सिर्फ एक प्लेट का पैसा जाएगा पूरा बैंक बैलेंस नहीं। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। स्मार्ट रिस्क टेकर हमेशा छोटे एक्सपेरिमेंट करता है।
किस्मत उन लोगों का साथ देती है जो अपने रिस्क को प्रेडिक्टेबल बनाते हैं। अगर आप बिना हेलमेट के १८० की स्पीड पर बाइक चला रहे हैं तो आप रिस्क नहीं ले रहे आप ऊपर जाने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन अगर आप पूरे गियर्स पहनकर ट्रैक पर रेसिंग कर रहे हैं तो आप एक कैलकुलेटेड रिस्क ले रहे हैं। बिजनेस में भी लोग अक्सर अपनी ईगो की वजह से बड़े रिस्क ले लेते हैं। उन्हें लगता है कि उनका आईडिया तो वर्ल्ड क्लास है और दुनिया उसे हाथों हाथ लेगी। फिर जब मार्केट उन्हें लात मारता है तब उन्हें याद आता है कि शायद रिसर्च कर लेनी चाहिए थी।
इंसानी दिमाग की एक बहुत बड़ी बीमारी है जिसे हम लॉस एवर्जन कहते हैं। हमें खोने का डर पाने की खुशी से कहीं ज्यादा लगता है। इसी डर की वजह से हम कभी कुछ नया ट्राई नहीं करते। लेकिन ईलीन शापिरो कहती हैं कि अगर आप कुछ नहीं कर रहे हैं तो आप वैसे भी धीरे धीरे अपना लक खो रहे हैं। जैसे खड़ा पानी सड़ जाता है वैसे ही रिस्क न लेने वाला बिजनेस भी एक दिन दम तोड़ देता है।
इसलिए, अगर आप अपना लक खुद बनाना चाहते हैं तो पहले डेटा देखना सीखिए। भावना में बहकर फैसले लेना बंद कीजिए। अगर आपका दिल कह रहा है कि ये डील पक्का चलेगी पर आपके बैंक का बैलेंस और मार्केट का ट्रेंड कुछ और कह रहा है तो अपने दिल को थोड़ा आराम दीजिए। असली लक वो है जहाँ आपकी कैलकुलेशन और आपकी हिम्मत का सही तालमेल हो। जब आप समझदारी से रिस्क लेते हैं तो दुनिया को लगता है कि आपकी किस्मत बहुत तेज है लेकिन सिर्फ आपको पता होता है कि उसके पीछे कितनी रातें आपने हिसाब किताब में गुजारी हैं।
लेसन ३ : छोटे बदलाव और कंसिस्टेंसी ही असली मैजिक हैं
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो रातभर जागकर किसी चमत्कार का इंतजार करते हैं कि अचानक कोई फरिश्ता आएगा और उनकी लाइफ बदल देगा। दूसरे वो जो जानते हैं कि रोज एक परसेंट का सुधार ही एक दिन सौ परसेंट की कामयाबी दिलाता है। ईलीन शापिरो और हावर्ड स्टीवनसन कहते हैं कि अपना लक बनाने का सबसे बड़ा सीक्रेट ये है कि आप कभी भी रुकें नहीं। छोटे छोटे स्टेप्स लीजिए क्योंकि बड़े पहाड़ भी छोटे पत्थरों से ही बने होते हैं।
इसे ऐसे समझिए जैसे आप जिम जाने का फैसला करते हैं। अब एक दिन में २० घंटे वर्कआउट करके आप बाहुबली नहीं बन जाएंगे। उल्टा अगले दिन अस्पताल में भर्ती होना पड़ेगा। लेकिन अगर आप रोज सिर्फ ३० मिनट पसीना बहाते हैं तो साल भर बाद लोग आपसे पूछेंगे कि भाई कौन सा प्रोटीन ले रहे हो। यही है लक का असली चेहरा। जो काम आप रोज चुपचाप बिना किसी शोर शराबे के करते हैं वही एक दिन दुनिया के सामने लक बनकर आता है।
बिजनेस में भी लोग अक्सर सोचते हैं कि एक बड़ी डील मिल जाए तो लाइफ सेट हो जाएगी। पर भाई साहब वो बड़ी डील तभी मिलती है जब आपने उससे पहले हजार छोटी डील्स पर काम किया हो। कई बार हम फेल होते हैं और हमें लगता है कि हमारा लक खराब है। लेकिन असल में वो फेलियर हमें अगले बड़े रिस्क के लिए तैयार कर रहा होता है। अगर आप गिरकर खड़े नहीं हो रहे हैं तो आप कभी नहीं सीख पाएंगे कि दौड़ना कैसे है।
किस्मत का खेल बड़ा अजीब है। ये उनके पास ज्यादा देर नहीं टिकती जो इसे संभालना नहीं जानते। मान लीजिए कल को आपकी करोड़ों की लॉटरी लग जाए। अगर आपको पैसे मैनेज करना नहीं आता तो साल भर बाद आप फिर से उसी मोड़ पर खड़े होंगे जहाँ से शुरू किया था। इसलिए खुद को इस काबिल बनाइए कि जब लक आपके दरवाजे पर दस्तक दे तो आप उसे अंदर बुलाकर चाय पिला सकें न कि डर के मारे दरवाजा बंद कर लें।
सच्चाई तो ये है कि हम लोग बहुत आलसी हो गए हैं। हमें सब कुछ इंस्टेंट चाहिए। इंस्टेंट नूडल्स इंस्टेंट कॉफी और इंस्टेंट सक्सेस। लेकिन भाई साहब सक्सेस कोई पिज्जा नहीं है जो ३० मिनट में घर पहुंच जाए। इसके लिए आपको मैदान में डटे रहना होगा। जब आपके कॉम्पिटिटर सो रहे हों तब आपको अपनी स्किल पर काम करना होगा। जब सब लोग पार्टी कर रहे हों तब आपको अपनी स्ट्रेटेजी बदलनी होगी। लोग इसे आपकी किस्मत कहेंगे पर आप जानते होंगे कि ये आपकी रातों की नींद का नतीजा है।
तो अब वक्त आ गया है कि आप उस पुराने घिसे पिटे किस्मत के रोने को बंद करें। उठिए और अपना रास्ता खुद बनाइए। याद रखिए समंदर में लहरें सबके लिए एक जैसी उठती हैं पर जो अपनी नाव को सही दिशा में मोड़ना जानता है वही किनारे तक पहुंचता है। किस्मत के भरोसे बैठने वालों को उतना ही मिलता है जितना मेहनत करने वाले छोड़ देते हैं। अब फैसला आपका है कि आपको बचा खुचा चाहिए या आप खुद अपनी दावत तैयार करना चाहते हैं।
जाते जाते बस इतना ही कहूंगा कि रिस्क लेने से मत डरिए। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा या तो आप जीतेंगे या फिर आप सीखेंगे। और यकीन मानिए सीखना हारने से कहीं ज्यादा बेहतर है। तो क्या आप तैयार हैं अपना खुद का लक लिखने के लिए। अगर हां तो आज ही वो छोटा सा रिस्क लीजिए जिससे आप कल तक डर रहे थे। क्योंकि आपकी कामयाबी का रास्ता उसी डर के पीछे छिपा है।
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