Measure What Matters (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सुबह उठकर ढेर सारे गोल्स बनाते हैं और शाम तक सिर्फ चाय के कप गिन पाते हैं। बधाई हो। आप अपनी मेहनत और समय को नाली में बहाने के एक्सपर्ट बन चुके हैं। बिना सही सिस्टम के काम करना और बिना दिशा के भागना आपकी सबसे बड़ी बेवकूफी है।

लेकिन घबराइए मत। आज हम जॉन डोएर की किताब मेज़र व्हाट मैटर्स से वो सीक्रेट्स जानेंगे जो गूगल और बिल गेट्स जैसे दिग्गजों को सक्सेसफुल बनाते हैं। चलिए देखते हैं वो ३ लेसन्स जो आपकी प्रोडक्टिविटी को जीरो से सीधा हीरो बना देंगे।


लेसन १ : फोकस और कमिटमेंट का जादू - जो जरूरी है वही चुनो

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो एक ही समय पर बॉडी बनाना चाहते हैं। कोडिंग सीखना चाहते हैं। गिटार बजाना चाहते हैं और साथ में दुनिया भी घूमना चाहते हैं। अगर हाँ। तो सच तो यह है कि आप इनमें से एक भी काम ढंग से नहीं कर पाएंगे। हमारा दिमाग कोई सुपर कंप्यूटर नहीं है जो हर चीज एक साथ हैंडल कर ले। जॉन डोएर कहते हैं कि सक्सेस का पहला मंत्र है फोकस। अगर आप सब कुछ हासिल करने की कोशिश करेंगे। तो अंत में आपके हाथ सिर्फ खाली चाय का कप और थकावट लगेगी।

यहाँ काम आता है ओकेआर यानी ऑब्जेक्टिव्स और की रिजल्ट्स। ऑब्जेक्टिव का मतलब है कि आपको आखिर पहुँचने कहाँ है। और की रिजल्ट्स वो सीढ़ी हैं जो आपको वहाँ तक ले जाएंगी। मान लीजिए आपका ऑब्जेक्टिव है एक फिट बॉडी पाना। अब यह तो बहुत बड़ा और हवा-हवाई गोल है। इसे ट्रैक कैसे करेंगे। यहाँ की रिजल्ट्स आएंगे। जैसे कि हफ्ते में ५ दिन जिम जाना। रोज २००० कैलोरीज से ज्यादा न खाना और कम से कम ४ लीटर पानी पीना। अगर आप ये ३ काम कर रहे हैं। तो आप अपने गोल की तरफ बढ़ रहे हैं। वरना आप सिर्फ जिम की मेंबरशिप लेकर डोनेशन दे रहे हैं।

आजकल के दौर में डिस्ट्रैक्शन हर जगह है। फोन की एक नोटिफिकेशन आती है और आपका फोकस सीधे चांद से जमीन पर गिर जाता है। हम अक्सर उन कामों में उलझे रहते हैं जो दिखने में तो बहुत जरूरी लगते हैं। लेकिन असल में उनका कोई फायदा नहीं होता। इसे कहते हैं बिजी होने का दिखावा करना। अगर आप सारा दिन ईमेल का रिप्लाई देने और मीटिंग्स में बैठने में निकाल रहे हैं। तो आप काम नहीं कर रहे। आप सिर्फ समय काट रहे हैं। असली काम वो है जो आपको आपके मुख्य गोल के पास ले जाए।

गूगल ने भी शुरुआत में यही किया था। उनके पास हजार आइडियाज थे। लेकिन उन्होंने सिर्फ कुछ चीजों पर फोकस किया। उन्होंने तय किया कि उन्हें दुनिया की सारी जानकारी को एक जगह लाकर आर्गेनाइज करना है। उन्होंने बाकी सारे फालतू के प्रोजेक्ट्स को मना कर दिया। नो कहना सीखना सबसे बड़ी स्किल है। अगर आप अपने बॉस। अपने दोस्तों या खुद के फालतू के ख्यालों को नो नहीं कह सकते। तो आप कभी भी अपने बड़े गोल्स को यस नहीं कह पाएंगे।

फोकस का मतलब यह नहीं है कि आप बाकी चीजों को भूल जाएं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी एनर्जी को एक लेजर बीम की तरह एक ही पॉइंट पर डाल रहे हैं। जब लेजर की तरह फोकस होता है। तो पत्थर भी कट जाता है। लेकिन अगर आप एक टॉर्च की तरह हर तरफ रोशनी फैलाएंगे। तो बस अँधेरा ही दूर होगा। कुछ बड़ा क्रिएट नहीं होगा। कमिटमेंट का मतलब है कि एक बार जब आपने तय कर लिया कि ये ३ काम आज करने हैं। तो फिर चाहे भूकंप आए या आपका पसंदीदा शो। आप वो काम पूरा करके ही उठेंगे।

अक्सर लोग गोल्स तो बना लेते हैं। लेकिन उसे कागज पर लिखकर भूल जाते हैं। जैसे नए साल के रेजोल्यूशन। जो हफ्ते भर में ही दम तोड़ देते हैं। जॉन डोएर कहते हैं कि अपने ऑब्जेक्टिव्स को सबके सामने रखें। जब आप दुनिया को बता देते हैं कि आप क्या कर रहे हैं। तो एक प्रेशर बिल्ड होता है। जो आपको आलस करने से रोकता है। खुद से झूठ बोलना आसान है। लेकिन दूसरों के सामने फेल होना सबको चुभता है। इसी चुभन का इस्तेमाल अपनी प्रोग्रेस के लिए कीजिए।


लेसन २ : अलाइनमेंट और टीमवर्क - सबको एक धागे में पिरोना

जब पहला लेसन समझ आ जाए कि करना क्या है। तब बारी आती है कि उसे सबके साथ मिलकर कैसे करना है। इमेजिन कीजिए कि एक नाव है और उसमें चार लोग बैठे हैं। पहला बंदा उत्तर की तरफ चप्पू चला रहा है। दूसरा दक्षिण की तरफ। तीसरा सिर्फ पानी उछाल रहा है और चौथा सो रहा है। क्या वो नाव कभी किनारे पर पहुँचेगी। बिल्कुल नहीं। बल्कि वो नाव वहीं गोल गोल घूमकर डूब जाएगी। हमारे ऑफिस और बिजनेस में भी अक्सर यही होता है। हर कोई अपनी धुन में मगन है और कंपनी का असल गोल कहीं पीछे छूट जाता है।

जॉन डोएर कहते हैं कि अलाइनमेंट ही वो फेविकोल है जो एक पूरी आर्गेनाइजेशन को जोड़े रखता है। टॉप लेवल मैनेजमेंट से लेकर इंटर्न तक। सबको पता होना चाहिए कि बड़ा मिशन क्या है। जब गूगल में कोई नया कर्मचारी आता है। तो उसे कंपनी के मुख्य ओकेआर दिखाए जाते हैं। इससे उसे समझ आता है कि उसके छोटे से काम का बड़े गोल पर क्या असर पड़ेगा। अगर आपको पता ही नहीं कि आप जो कोडिंग कर रहे हैं या जो एक्सेल शीट भर रहे हैं। उससे दुनिया कैसे बदलेगी। तो आप बस एक मशीन बनकर रह जाएंगे। और मशीनें तो आजकल एआई भी बन चुका है।

अलाइनमेंट का मतलब यह नहीं है कि बॉस ने जो कह दिया वही पत्थर की लकीर है। यहाँ सार्केज्म यह है कि कई कंपनियों में बॉस को लगता है कि वो भगवान है। वो ऊपर से आदेश फेंकता है और नीचे वाले उसे पकड़ लेते हैं। लेकिन असली ओकेआर सिस्टम में बातचीत दोनों तरफ से होती है। नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे। जब एक एम्प्लोयी खुद अपने की रिजल्ट्स सेट करता है। तो उसे उस काम को पूरा करने की ज्यादा भूख होती है। उसे लगता है कि यह उसका अपना मिशन है। न कि किसी खडूस बॉस का थोपा हुआ काम।

अक्सर देखा जाता है कि सेल्स टीम कहती है कि मार्केटिंग वाले काम नहीं कर रहे। और मार्केटिंग वाले कहते हैं कि प्रोडक्ट खराब है। ये जो आपस में तू तू मैं मैं चलती है। इसका कारण है अलाइनमेंट की कमी। जब सबके गोल्स एक दूसरे से जुड़े होते हैं। तो कोई किसी पर उंगली नहीं उठाता। सबको पता होता है कि अगर एक फेल हुआ। तो पूरी चैन टूट जाएगी। यह बिल्कुल एक क्रिकेट मैच की तरह है। अगर बॉलर अच्छी बॉल डाले और फील्डर कैच छोड़ दे। तो हार पूरी टीम की होती है। केवल बॉलर की नहीं।

कनेक्टिविटी का एक और बड़ा फायदा है ट्रांसपेरेंसी। इमेजिन कीजिए एक ऐसी कंपनी जहाँ हर कोई देख सके कि सीईओ के गोल्स क्या हैं। अजीब लगता है न। लेकिन यही गूगल की सक्सेस का राज है। वहाँ कोई भी किसी का भी ओकेआर देख सकता है। इससे फालतू की राजनीति और पीठ पीछे बुराई करने का मौका ही नहीं मिलता। जब सबको पता है कि कौन क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। तो फालतू के शक की गुंजाइश ही खत्म हो जाती है। आप किसी को बेवकूफ नहीं बना सकते क्योंकि डेटा सबके सामने है।

अलाइनमेंट का मतलब है कि हर कोई एक ही सुर में गा रहा है। भले ही उनके इंस्ट्रूमेंट्स अलग हों। कोई गिटार बजा रहा हो। कोई ढोल। लेकिन धुन एक ही होनी चाहिए। अगर आपकी टीम में अलाइनमेंट नहीं है। तो आप चाहे कितने भी टैलेंटेड लोगों को हायर कर लें। आप सिर्फ शोर मचाएंगे। संगीत नहीं। इसलिए अपने गोल्स को दीवार पर चिपकाएं। सबको समझाएं और सबको एक ही दिशा में दौड़ाएं। तभी आप उस फिनिश लाइन को पार कर पाएंगे जिसे दुनिया सक्सेस कहती है।


लेसन ३ : ट्रैकिंग और एकाउंटेबिलिटी - हवा में बातें करना बंद करो

अब तक आपने फोकस करना सीख लिया और अपनी टीम को भी लाइन पर ले आए। लेकिन अगर आप यह चेक ही नहीं कर रहे कि आप कहाँ पहुँचे हैं। तो आप उस ड्राइवर की तरह हैं जो आँखों पर पट्टी बांधकर गाड़ी चला रहा है। उसे लगता है कि वो सही जा रहा है। लेकिन असल में वो खाई की तरफ बढ़ रहा है। जॉन डोएर कहते हैं कि जो चीज आप मेजर नहीं कर सकते। आप उसे मैनेज भी नहीं कर सकते। बिना डेटा के आपकी मेहनत सिर्फ एक तुक्का है। और किस्मत हर बार आपका साथ नहीं देगी।

हम भारतीयों की एक बड़ी समस्या है। हम कहते हैं कि भाई बहुत मेहनत कर रहा हूँ। दिन रात एक कर दिए हैं। लेकिन जब रिजल्ट पूछा जाता है। तो डब्बा गोल निकलता है। यहाँ सार्केज्म यह है कि हम अपनी थकान को अपनी कामयाबी समझ लेते हैं। पसीना बहाने का मतलब यह नहीं है कि आप सही दिशा में जा रहे हैं। एक गधा भी सारा दिन बोझ उठाता है। लेकिन वो प्रधानमंत्री नहीं बनता। आपको अपनी प्रोग्रेस को नंबर्स में ट्रैक करना होगा। नंबर्स झूठ नहीं बोलते। जबकि आपका मन आपको रोज झूठ बोलता है कि कल से पक्का काम करेंगे।

ट्रैकिंग का मतलब सिर्फ गलतियां निकालना नहीं है। इसका मतलब है यह देखना कि क्या काम कर रहा है और क्या नहीं। ओकेआर सिस्टम में हम हर हफ्ते अपनी प्रोग्रेस को चेक करते हैं। अगर कोई की रिजल्ट जीरो पर पड़ा है। तो उसका गला दबाने के बजाय यह पूछिए कि दिक्कत कहाँ आ रही है। क्या आपका गोल बहुत मुश्किल था या आप आलस कर रहे थे। खुद के प्रति ईमानदार होना ही सबसे बड़ी एकाउंटेबिलिटी है। अगर आप खुद को धोखा दे रहे हैं। तो दुनिया को बेवकूफ बनाना तो आपके लिए बाएं हाथ का खेल होगा।

एकाउंटेबिलिटी का मतलब है अपनी जिम्मेदारी खुद लेना। जब चीजें खराब होती हैं। तो लोग अक्सर किस्मत। सरकार या खराब मौसम को दोष देने लगते हैं। लेकिन जिसके पास क्लियर डेटा होता है। वो बहाने नहीं बनाता। वो अपनी स्ट्रेटेजी बदलता है। गूगल में भी कई बार प्रोजेक्ट्स फेल होते हैं। लेकिन वो उन फेलियर्स को ट्रैक करते हैं और उनसे सीखते हैं। फेल होना बुरा नहीं है। लेकिन बिना कुछ सीखे बार बार फेल होना बेवकूफी की निशानी है। आप डेटा के साथ खेलिए। वरना डेटा आपके साथ खेल जाएगा।

यहाँ एक और बात जरूरी है। वो है रिफ्लेक्शन। हर महीने के अंत में खुद के साथ एक मीटिंग कीजिए। देखिए कि आपने जो वादे खुद से किए थे। उनमें से कितने पूरे हुए। क्या आप अपने की रिजल्ट्स के करीब पहुँचे। या आप बस सोशल मीडिया पर मोटिवेशनल कोट्स शेयर करने में बिजी थे। असली मोटिवेशन नंबर्स को बढ़ते हुए देखने में है। जब आप देखते हैं कि पिछले महीने से इस महीने आपकी ग्रोथ १० परसेंट बढ़ी है। तो जो डोपामिन रिलीज होता है। वो किसी भी नेटफ्लिक्स सीरीज से ज्यादा नशीला होता है।

याद रखिए कि बड़े गोल्स रातों रात हासिल नहीं होते। वो छोटे छोटे की रिजल्ट्स को रोज पूरा करने से मिलते हैं। अगर आप रोज १ परसेंट भी खुद को ट्रैक करके बेहतर बना रहे हैं। तो साल के अंत में आप कहाँ होंगे। इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। हवा में महल बनाना बंद कीजिए और जमीन पर उतरकर डेटा की नींव रखिए। क्योंकि अंत में वही मायने रखता है जिसे आप मेजर कर सकते हैं।


तो दोस्तों, मेज़र व्हाट मैटर्स सिर्फ एक किताब नहीं है। यह एक लाइफस्टाइल है। फोकस करना। अलाइनमेंट बनाना और प्रोग्रेस को ट्रैक करना। यही वो ३ पिलर्स हैं जो आपको साधारण से असाधारण बना सकते हैं। आज ही अपनी डायरी निकालिए और अपने ३ सबसे जरूरी ओकेआर लिखिए। याद रखिए। समय रेत की तरह फिसल रहा है। अगर आज आपने अपने गोल्स मेजर नहीं किए। तो कल आप अपनी नाकामयाबी को भी मेजर नहीं कर पाएंगे। नीचे कमेंट्स में अपना सबसे बड़ा गोल लिखिए और आज से ही उसे ट्रैक करना शुरू कीजिए।

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