क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस में गधों की तरह मेहनत करके सोचते हैं कि एक दिन प्रमोशन मिलेगा। सच तो यह है कि आप उन पुराने घिसे पिटे कॉर्पोरेट झूठ के जाल में फंसे हैं जो आपकी ग्रोथ को दीमक की तरह खा रहे हैं। अगर आप अब भी अपनी कमियों को सुधारने में लगे हैं तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी खुद लिख रहे हैं।
इस आर्टिकल में हम मार्कस बकिंघम की किताब से उन ९ झूठों का पर्दाफाश करेंगे जो आपकी प्रोफेशनल लाइफ को नर्क बना रहे हैं। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपको एक आम एम्प्लॉई से एक फ्री थिंकिंग लीडर बना देंगे।
लेसन १ : लोग किस कंपनी में काम करते हैं इससे फर्क नहीं पड़ता बल्कि वो किस टीम में हैं यह सब कुछ है
हम अक्सर सोचते हैं कि गूगल या माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनी में जॉब मिल जाए तो लाइफ सेट है। लेकिन सच तो यह है कि कंपनी का ब्रांड नाम सिर्फ एक सुंदर रैपर की तरह है। असली स्वाद तो उस टीम के अंदर होता है जिसमें आप दिन के ८ से ९ घंटे बिताते हैं। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि पूरी दुनिया में कॉर्पोरेट कल्चर जैसा कुछ होता ही नहीं है। यह सिर्फ एक बड़ा झूठ है जिसे एचआर वाले सुंदर प्रेजेंटेशन में सजाकर आपको बेचते हैं। असलियत में आपका एक्सपीरियंस आपके मैनेजर और आपके साथ बैठने वाले दो-चार सहकर्मियों पर टिका होता है।
मान लीजिए आप दुनिया की सबसे कूल दिखने वाली कंपनी में काम करते हैं जहाँ ऑफिस में मुफ्त का खाना है और सोने के लिए पॉड्स बने हैं। लेकिन आपका जो बॉस है वो साक्षात कालनेमि मामा का अवतार है। जो हर १५ मिनट में आपके सिर पर आकर खड़ा हो जाता है और पूछता है कि काम कितना हुआ। क्या आप उस फ्री खाने का आनंद ले पाएंगे। बिल्कुल नहीं। वहीं दूसरी तरफ एक ऐसी साधारण सी कंपनी है जहाँ शायद एलीवेटर भी धीरे चलता हो लेकिन आपकी टीम में ऐसे लोग हैं जो आपकी बात समझते हैं और आपको सपोर्ट करते हैं। आप वहाँ ज्यादा खुश रहेंगे।
ज्यादातर लोग जॉब इंटरव्यू के समय कंपनी की वेबसाइट पर जाकर उसका विजन और मिशन पढ़ते हैं। "हम दुनिया बदलना चाहते हैं" या "हम एम्प्लॉई की खुशी को सर्वोपरि रखते हैं"। यह सब बातें सुनने में वैसी ही लगती हैं जैसे शादी के बायोडाटा में लिखा होता है कि लड़का बहुत शांत स्वभाव का है। हकीकत तो जॉइन करने के बाद पता चलती है। जब आप कंपनी जॉइन करते हैं तो आप कंपनी के साथ एग्रीमेंट साइन करते हैं लेकिन आप काम एक टीम के साथ करते हैं। अगर टीम में भरोसा नहीं है तो कंपनी कितनी भी बड़ी क्यों न हो आपको वहाँ घुटन ही होगी।
असली लीडरशिप यही है कि आप पूरी कंपनी को सुधारने का ठेका न लें बल्कि अपनी छोटी सी टीम में ऐसा माहौल बनाएँ जहाँ हर कोई सुरक्षित महसूस करे। लोग कंपनी छोड़कर नहीं भागते बल्कि वो उन मैनेजर्स से भागते हैं जो उनके काम की कद्र नहीं करते। इसलिए अगली बार जब आप अपनी जॉब से परेशान हों तो पूरी कंपनी को गाली देने के बजाय अपनी टीम के डायनामिक्स को देखें। क्या आपकी टीम में वो तालमेल है जो आपको आगे बढ़ा सके। अगर नहीं तो समझ लीजिए कि आप गलत जगह अपना पसीना बहा रहे हैं। याद रखिए ऑफिस की दीवारों पर लिखे मोटिवेशनल कोट्स आपकी सैलरी और मेंटल हेल्थ नहीं बढ़ाते बल्कि आपके टीम मेट्स का व्यवहार बढ़ाता है।
लेसन २ : फीडबैक एक बहुत बड़ा धोखा है और इसकी जगह आपको अटेंशन की जरूरत है
कॉर्पोरेट जगत में एक बड़ा ही अजीब रिवाज है जिसे हम परफॉरमेंस रिव्यु या फीडबैक कहते हैं। साल के अंत में आपका बॉस आपको एक केबिन में बुलाता है और फिर शुरू होती है आपकी बुराइयों की वो लिस्ट जिसे वो बहुत ही प्यार से कंस्ट्रक्टिव फीडबैक कहता है। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि यह सब एक दिखावा है। फीडबैक दरअसल सामने वाले की राय होती है जो अक्सर गलत ही होती है। इंसान दूसरे इंसान की काबिलियत को जज करने में बहुत ही बुरा होता है। जब कोई आपको बताता है कि आपको अपनी कम्युनिकेशन स्किल्स सुधारनी चाहिए तो असल में वो अपनी पसंद आपके ऊपर थोप रहा होता है।
जरा सोचिए अगर आप एक मछली को पेड़ पर चढ़ने का फीडबैक देंगे तो वो पूरी जिंदगी खुद को बेवकूफ ही समझेगी। ऑफिस में भी यही होता है। मैनेजर उन चीजों पर फोकस करते हैं जो आप गलत कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि आपकी कमियों को गिनाने से आप बेहतर हो जाएंगे। लेकिन रिसर्च कहती है कि जब हमें अपनी गलतियां पता चलती हैं तो हमारा दिमाग डिफेंसिव मोड में चला जाता है और हम सीखना बंद कर देते हैं। हमें फीडबैक नहीं बल्कि अटेंशन चाहिए। और वो भी पॉजिटिव अटेंशन।
मान लीजिए आपने एक बहुत ही शानदार प्रेजेंटेशन दी। आपका बॉस आता है और कहता है कि स्लाइड नंबर ५ का फॉन्ट थोड़ा छोटा था। अब आप अपनी पूरी मेहनत भूलकर उस छोटे से फॉन्ट के बारे में सोचकर परेशान रहेंगे। इसके बजाय अगर बॉस यह कहता कि जब तुमने उस डेटा को समझाया तो मुझे सच में मजा आया तो आपका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होता। जब कोई हमारे काम के अच्छे हिस्से पर ध्यान देता है तो हमारा दिमाग और बेहतर करने के लिए एक्टिव हो जाता है।
अटेंशन का मतलब यह नहीं है कि बस झूठी तारीफ की जाए। इसका मतलब है कि मैनेजर को यह पता होना चाहिए कि उसके लोग असल में क्या कर रहे हैं। अक्सर मैनेजर्स को पता ही नहीं होता कि उनकी टीम किन मुश्किलों से गुजर रही है और वो बस ऊपर से ऑर्डर झाड़ते रहते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई डॉक्टर बिना मरीज की नब्ज चेक किए उसे कड़वी दवाई दे दे और कहे कि इसे खा लो तुम ठीक हो जाओगे। अगर आप एक लीडर हैं तो लोगों को यह बताना बंद कीजिए कि उन्हें क्या करना है। बल्कि इस बात पर ध्यान दीजिए कि जब वो कुछ अच्छा करते हैं तो वो कैसे करते हैं। यही वो जादू है जो एक साधारण टीम को एक्स्ट्राऑर्डिनरी बना देता है।
लेसन ३ : बेस्ट लोग ऑल राउंडर नहीं होते, वो स्पाइकी होते हैं
हमारे समाज और ऑफिस कल्चर में एक बहुत बड़ी बीमारी है जिसे 'बैलेंस्ड' होने का नाम दिया गया है। बचपन से हमें सिखाया जाता है कि अगर मैथ में अच्छे हो तो साइंस में भी अच्छे बनो और अगर स्पोर्ट्स में तेज हो तो पढ़ाई में भी अव्वल आओ। कॉर्पोरेट दुनिया में भी यही होता है। कंपनियां चाहती हैं कि उनका एम्प्लॉई एक ऐसा रोबोट हो जिसे कोडिंग भी आती हो, जो सेल्स भी कर ले और जो शाम को पार्टी में एंकरिंग भी कर सके। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि यह 'परफेक्ट एम्प्लॉई' की तलाश सबसे बड़ा झूठ है। हकीकत में जो लोग दुनिया बदलते हैं, वो कभी भी बैलेंस नहीं होते। वो 'स्पाइकी' होते हैं।
स्पाइकी होने का मतलब है कि आपकी कुछ ताकतें यानी स्ट्रेंथ्स इतनी जबरदस्त होती हैं कि वो चार्ट से बाहर निकल जाती हैं, भले ही आप बाकी चीजों में औसत या उससे भी नीचे हों। जरा सोचिए अगर सचिन तेंदुलकर को उनके कोच ने कहा होता कि बेटा क्रिकेट तो ठीक है पर तुम्हारी फुटबॉल स्किल्स बहुत खराब हैं, चलो पहले उसे सुधारते हैं। क्या आज हम उस महान खिलाड़ी को जान पाते। बिल्कुल नहीं। लेकिन ऑफिस में हमारे साथ यही होता है। मैनेजर आपकी ताकतों को नजरअंदाज करके उन कमियों को पकड़ने बैठ जाते हैं जिनका आपके काम से शायद लेना देना भी न हो।
कंपनियां उन लोगों को प्रमोट करती हैं जिनमें 'कोई कमी नहीं होती'। नतीजा यह निकलता है कि टॉप पर ऐसे लोग बैठ जाते हैं जो हर चीज में बस ठीक ठाक होते हैं पर किसी भी चीज में मास्टर नहीं होते। यह वैसा ही है जैसे आप एक ऐसी सब्जी खा रहे हों जिसमें नमक, मिर्च, मसाला सब बराबर है पर स्वाद गायब है। असल में सक्सेस तब मिलती है जब आप अपनी उन खास ताकतों को पहचानते हैं जो आपको दूसरों से अलग बनाती हैं। अगर आप डेटा एनालिसिस में जीनियस हैं पर लोगों से बात करने में थोड़े नर्वस होते हैं, तो अपनी एनालिसिस को इतना खतरनाक बना दीजिए कि लोग आपकी नर्वसनेस को भूल जाएं।
एक फ्री थिंकिंग लीडर अपनी टीम को गधों की तरह एक ही लाइन में खड़ा नहीं करता। वो देखता है कि किसकी कौन सी 'स्पाइक' यानी ताकत सबसे ज्यादा नुकीली है। वो एक ऐसे व्यक्ति को जो बोलने में माहिर है, उसे क्लाइंट मीटिंग में भेजता है और जो सोचने में गहरा है, उसे प्लानिंग में लगाता है। जब आप अपनी कमजोरियों को ठीक करने के बजाय अपनी ताकतों पर दांव लगाते हैं, तब आप असल में ग्रो करते हैं। इसलिए ऑल राउंडर बनने की कोशिश छोड़िए। दुनिया को उन लोगों की जरूरत नहीं है जो सब कुछ थोड़ा थोड़ा जानते हैं, बल्कि उनकी जरूरत है जो एक चीज में बेमिसाल हों। अपनी उस एक ताकत को पकड़िए और उसमें इतने माहिर बन जाइए कि कंपनी को आपके बिना काम चलाना नामुमकिन लगे।
क्या आप भी अब तक उन ९ झूठों को सच मानकर अपनी मेहनत बर्बाद कर रहे थे। अब समय आ गया है कि आप अपनी काबिलियत को दूसरों के चश्मे से देखना बंद करें। अपनी उस एक अनोखी ताकत को पहचानें और उसे अपनी सबसे बड़ी पहचान बनाएं। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी प्रोफेशनल लाइफ में बदलाव लाना चाहते हैं, तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो ऑफिस की टेंशन में अपनी मुस्कान खो चुका है। नीचे कमेंट में बताएं कि आपकी वो एक 'स्पाइक' यानी ताकत क्या है। चलिए मिलकर इस कॉर्पोरेट सर्कस से बाहर निकलते हैं और अपनी असली पहचान बनाते हैं।
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