No Excuses (Hindi)


क्या आप भी अपनी लाइफ की बर्बादी का क्रेडिट अपनी किस्मत और पड़ोसियों को देने में बिजी हैं। कांग्रेचुलेशंस। आप बहानों की यूनिवर्सिटी के टॉपर हैं। अगर आपको लगता है कि बिना मेहनत किए सिर्फ रील देख कर आप करोड़पति बन जाएंगे तो यह आर्टिकल पढ़ कर अपना कीमती वक्त बिलकुल खराब मत करना।

लेकिन अगर आप थक चुके हैं उन खोखले वादों से जो आप हर मंडे खुद से करते हैं तो यह आपके लिए है। ब्रायन ट्रेसी की किताब नो एक्सक्यूजेस हमें बताती है कि कैसे सेल्फ डिसिप्लिन आपकी सोई हुई किस्मत को लात मार कर जगा सकता है। आइए जानते हैं वो 3 लेसन्स जो आपको बहानेबाज से एक विनर बना देंगे।


लेसन १ : अपनी लाइफ की स्टेयरिंग खुद थामिए और बहानों का टायर पंचर करिए

क्या आपको भी ऐसा लगता है कि आपकी लाइफ की फिल्म का डायरेक्टर कोई और ही है। कभी बॉस विलेन बन जाता है तो कभी ट्रैफिक पुलिस वाला। और सबसे बड़ा विलेन तो वो अलार्म क्लॉक है जो सुबह 6 बजे बजने की हिम्मत करती है। हम इंडियंस के पास हर फेलियर के लिए एक वर्ल्ड क्लास बहाना तैयार रहता है। 'यार पापा ने सपोर्ट नहीं किया' या 'किस्मत ही खराब थी'। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि जब तक आप अपनी लाइफ के हर रिजल्ट के लिए दूसरों को ब्लेम करते रहेंगे तब तक आप एक विक्टिम रहेंगे विनर नहीं।

सोचिए आप एक कार चला रहे हैं लेकिन स्टेयरिंग व्हील आपके हाथ में नहीं बल्कि उस दोस्त के हाथ में है जो खुद रास्ता भूल चुका है। डर लगेगा न। बस यही आप अपनी लाइफ के साथ कर रहे हैं। जिस दिन आप यह मान लेते हैं कि 'मैं जहाँ भी हूँ अपनी वजह से हूँ' उसी दिन आपके अंदर की सुपरपावर जागती है। सेल्फ डिसिप्लिन का मतलब यह नहीं है कि आप खुद को सजा दें। इसका असली मतलब है अपनी जिम्मेदारी को एक्सेप्ट करना। लोग कहते हैं कि उनके पास टाइम नहीं है। भाई साहब आपके पास टाइम तो बहुत है बस वो इंस्टाग्राम की स्क्रॉलिंग में और शर्मा जी के लड़के की बुराई करने में निकल जाता है।

मान लीजिए आपको जिम जाना है। आप सुबह उठते हैं और बाहर हल्की सी बारिश देख कर कहते हैं 'वाह कितना रोमांटिक मौसम है आज तो पकोड़े होने चाहिए जिम कल देख लेंगे'। यहाँ आपने अपनी बॉडी की जिम्मेदारी मौसम को दे दी। अब क्या मौसम आपके एब्स बना कर देगा। बिलकुल नहीं। सक्सेसफुल लोग मौसम नहीं अपना डिसिप्लिन देखते हैं। वो पकोड़ों को इग्नोर करते हैं और पसीने को गले लगाते हैं।

बहाने बनाना एक नशा है। जितना ज्यादा बनाएंगे उतना ही सुकून मिलेगा लेकिन अंदर ही अंदर आपकी ग्रोथ खोखली होती जाएगी। अगर आप अपनी सैलरी से खुश नहीं हैं तो बॉस को गाली देने से सैलरी नहीं बढ़ेगी। आपको डिसिप्लिन के साथ अपनी स्किल्स पर काम करना होगा। ब्रायन ट्रेसी की यह किताब चीख चीख कर कहती है कि एक्सक्यूजेस वो ईंटें हैं जिनसे फेलियर की दीवार खड़ी होती है। अगर आपको कामयाबी का महल बनाना है तो इन ईंटों को फेंकना शुरू करिए।

खुद से पूछिए कि वो कौन सा एक बहाना है जिसे आप पिछले 2 साल से चिपकाए बैठे हैं। क्या वो ये है कि 'अभी सही टाइम नहीं है'। सच तो ये है कि सही टाइम कभी नहीं आता उसे लाना पड़ता है। जब आप जिम्मेदारी लेते हैं तो आप बहाने बनाना बंद कर देते हैं और जब बहाने बंद होते हैं तो एक्शन शुरू होता है। यही वो पहला कदम है जो एक आम इंसान को खास बनाता है।


लेसन २ : गोल सेटिंग का चश्मा पहनिए और हर दिन छोटे एक्शन का डोस लीजिए

ज्यादातर लोग लाइफ में इसलिए फेल नहीं होते कि उनके सपने बहुत बड़े हैं बल्कि इसलिए फेल होते हैं क्योंकि उनके पास उन सपनों तक पहुँचने का कोई मैप नहीं है। हम सब चाहते हैं कि हमारे पास एक शानदार बंगला हो और बैंक बैलेंस सात अंकों में हो। लेकिन जब बात आती है ये डिसाइड करने की कि आज क्या करना है तो हमारा दिमाग 'एरर 404' दिखाने लगता है। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि बिना डिसिप्लिन के गोल सेट करना सिर्फ एक विश है जिसका पूरा होना चमत्कार पर टिका है। और भाई साहब चमत्कार सिर्फ फिल्मों में होते हैं असली दुनिया में तो पसीना बहाना पड़ता है।

सोचिए आप एक अंधेरी सड़क पर गाड़ी चला रहे हैं। आपको पता है कि आपको मुंबई जाना है लेकिन गाड़ी की हेडलाइट्स खराब हैं। क्या आप कभी पहुँच पाएंगे। शायद नहीं। गोल सेटिंग आपकी लाइफ की वो हेडलाइट है जो आपको रास्ता दिखाती है। लेकिन यहाँ एक ट्विस्ट है। सिर्फ गोल सेट करना काफी नहीं है। असली जादू तब होता है जब आप उस बड़े गोल को छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ देते हैं। इसे ऐसे समझिए जैसे आपको 5 किलो बिरयानी खानी है। क्या आप एक बार में पूरा पतीला मुंह में डाल लेंगे। नहीं न। आप एक एक निवाला खाएंगे। बस यही डिसिप्लिन आपको अपने करियर और हेल्थ के लिए दिखाना है।

मान लीजिए आपने डिसाइड किया कि आप अगले महीने से एक नई स्किल सीखेंगे। पहले दिन आप बहुत जोश में होते हैं। आप नया कोर्स खरीदते हैं और 5 घंटे लगातार पढ़ते हैं। दूसरे दिन आप थोड़े ढीले पड़ते हैं। तीसरे दिन आपके दोस्त का फोन आता है कि 'भाई नई मूवी लगी है चलते हैं क्या'। और बस वहीं आपका डिसिप्लिन दम तोड़ देता है। आप खुद को तसल्ली देते हैं कि 'कल डबल पढ़ाई कर लूँगा'। वो 'कल' कभी नहीं आता। सक्सेसफुल इंसान वो नहीं है जो एक दिन में 10 घंटे काम करे बल्कि वो है जो हर दिन चाहे कुछ भी हो जाए सिर्फ 1 घंटा काम जरूर करे।

ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि आपको हर दिन की प्लानिंग एक रात पहले करनी चाहिए। अगर आप सुबह उठकर ये सोच रहे हैं कि 'आज क्या करूँ' तो समझ लीजिए आधा दिन तो आपने कन्फ्यूजन में ही गंवा दिया। डिसिप्लिन का मतलब है कि जब आपका मन कहे कि 'सो जा भाई' तब आप कहें कि 'नहीं अभी मेरा ये काम बाकी है'। यह लड़ाई आपके दिमाग और आपकी इच्छाशक्ति के बीच की है। अगर आप अपने दिमाग के गुलाम बने रहेंगे तो आप हमेशा वहीं रहेंगे जहाँ आप आज हैं।

याद रखिए छोटे एक्शन लेना पहाड़ चढ़ने जैसा है। हर कदम छोटा होता है लेकिन अंत में आप टॉप पर होते हैं। अगर आप रोज सिर्फ 1 परसेंट भी खुद को बेहतर बनाते हैं तो साल के आखिर में आप 37 गुना ज्यादा पावरफुल हो जाएंगे। लेकिन ये 1 परसेंट का सुधार तभी होगा जब आप बहानों की चादर ओढ़कर सोना बंद करेंगे। अपने गोल्स को लिखिए और हर दिन उन्हें देखिए। जो इंसान अपने गोल्स को लेकर डिसिप्लिन्ड है उसे दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।


लेसन ३ : मेंढक को सबसे पहले निगल जाइए और फालतू के रायते को समेटिए

क्या आपको पता है कि सबसे बड़ी बीमारी क्या है। वो कैंसर या डायबिटीज नहीं है बल्कि वो है 'प्रोक्रैस्टिनेशन' यानी काम को टालने की आदत। हम सब के पास दिन में 24 घंटे ही होते हैं। फिर ऐसा क्यों होता है कि अंबानी साहब उसी टाइम में साम्राज्य खड़ा कर लेते हैं और हम उसी टाइम में ये डिसाइड नहीं कर पाते कि नेटफ्लिक्स पर कौन सी सीरीज देखनी है। ब्रायन ट्रेसी का एक बहुत ही फेमस कॉन्सेप्ट है 'ईट दैट फ्रॉग'। इसका मतलब है कि अगर आपको दिन भर में एक जिंदा मेंढक खाना है तो उसे सबसे पहले सुबह सुबह खा लीजिए। क्योंकि उसके बाद पूरे दिन उससे बुरा आपके साथ कुछ नहीं होगा।

यहाँ 'मेंढक' का मतलब है वो सबसे मुश्किल और जरूरी काम जिसे देखकर आपकी रूह कांपती है। हम इंडियंस की आदत है कि हम आसान काम पहले निबटाते हैं जैसे ईमेल्स चेक करना या डेस्क साफ़ करना। हमें लगता है कि हम बहुत बिजी हैं लेकिन असल में हम सिर्फ काम को टाल रहे होते हैं। मुश्किल काम को आखिर के लिए छोड़ देना वैसा ही है जैसे कड़वी दवाई को हाथ में पकड़ कर बैठना। जितना देर करेंगे उतना ही डर लगेगा। डिसिप्लिन वाला इंसान अपनी लिस्ट बनाता है और सबसे बड़े और डरावने मेंढक पर सबसे पहले हमला करता है।

मान लीजिए आपको एक बहुत ही जरूरी प्रेजेंटेशन बनानी है जिससे आपका प्रमोशन जुड़ा है। लेकिन आपका मन कह रहा है कि पहले जरा सोशल मीडिया पर देख लूँ कि किसकी शादी में कौन सा पनीर बना था। आप 2 घंटे फालतू की पोस्ट देखते हैं। जब आप काम शुरू करते हैं तो आप थके हुए होते हैं और आपकी क्रिएटिविटी का दही हो चुका होता है। रिजल्ट क्या निकलता है। एक बेकार प्रेजेंटेशन और बॉस की डांट। अगर आपने वही 2 घंटे सबसे पहले उस काम को दिए होते तो आपका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होता।

टाइम मैनेजमेंट असल में टाइम को मैनेज करना नहीं है बल्कि खुद को मैनेज करना है। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि हर वो काम जो आपको आपके गोल के करीब नहीं ले जा रहा है वो वक्त की बर्बादी है। आज के जमाने में 'डिस्ट्रैक्शन' सबसे बड़ा दुश्मन है। आपके फोन का वो एक नोटिफिकेशन आपके करियर का विलेन बन सकता है। डिसिप्लिन का मतलब है उस फोन को उल्टा करके रखना जब आप काम कर रहे हों। यह सुनना कड़वा लग सकता है लेकिन अगर आप हर 5 मिनट में अपना फोन चेक कर रहे हैं तो आप काम नहीं कर रहे हैं बस टाइम पास कर रहे हैं।

सेल्फ डिसिप्लिन वो चाबी है जो कामयाबी के सारे ताले खोल सकती है। बिना इसके टैलेंट भी बेकार है। क्या आपने ऐसे टैलेंटेड लोग देखे हैं जो लाइफ में कुछ नहीं कर पाए। उनके पास टैलेंट तो था पर अनुशासन नहीं था। अपनी लाइफ की बागडोर अपने हाथ में लीजिए। आज से ही बहानों को गुडबाय कहिए और एक्शन की दुनिया में कदम रखिए। क्योंकि याद रखिए दुनिया सिर्फ उन्हीं को सलाम करती है जो नतीजे दिखाते हैं बहाने नहीं।


तो दोस्तों, क्या आप आज से अपने अंदर के उस बहानेबाज इंसान को विदा करने के लिए तैयार हैं। कमेंट में हमें बताएं कि वो कौन सा एक काम है जिसे आप कल पर टाल रहे थे और आज उसे पूरा करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा कहता है कि 'भाई मंडे से पक्का शुरू करूँगा'। चलिए साथ मिलकर डिसिप्लिन की इस जर्नी को शुरू करते हैं।

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