क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो बिना मैप के रेगिस्तान में गाड़ी चला रहे हैं। अगर आपके पास कोई ठोस स्ट्रैटजी नहीं है तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि बस वक्त बर्बाद कर रहे हैं। बिना प्लानिंग के जीत की उम्मीद करना खुद को धोखा देने जैसा है और यकीन मानिए आपका कॉम्पिटिटर आपकी इस बेवकूफी पर हंस रहा है।
स्ट्रैटजी का असली मतलब सिर्फ मीटिंग्स करना नहीं बल्कि कड़े फैसले लेना है। आज हम प्लेइंग टू विन बुक से वो 3 लेसन सीखेंगे जो आपके बिजनेस और लाइफ को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल देंगे और आपको एक असली विनर बनाएंगे।
लेसन १ : सिर्फ पार्टिसिपेट मत करो, जीतने के लिए खेलो
ज्यादातर लोग लाइफ और बिजनेस में बस इसलिए मैदान में उतरते हैं ताकि वो भीड़ का हिस्सा बने रहें। उन्हें लगता है कि अगर वो दुकान खोलकर बैठ गए हैं या ऑफिस में आठ घंटे बिता रहे हैं, तो वो बिजनेस कर रहे हैं। भाई, इसे स्ट्रैटजी नहीं, इसे बस 'हाजिरी लगाना' कहते हैं। एजी लाफले कहते हैं कि अगर आपका मकसद सिर्फ मार्केट में बने रहना है, तो आप असल में हारने की तैयारी कर रहे हैं। स्ट्रैटजी का पहला और सबसे बुनियादी उसूल है कि आपकी नीयत सिर्फ खेलने की नहीं, बल्कि जीतने की होनी चाहिए। अब आप कहेंगे कि जीतना तो सबको पसंद है, इसमें नया क्या है। फर्क नीयत और एक्शन का है।
मान लीजिए आपने अपने मोहल्ले में एक नई जिम खोली। अब अगर आप सोचते हैं कि बस मशीनें लगा दीं और लोग आ जाएंगे क्योंकि बगल वाली जिम पुरानी हो गई है, तो आप सिर्फ पार्टिसिपेट कर रहे हैं। आप बस ये उम्मीद कर रहे हैं कि किस्मत अच्छी हुई तो दाल-रोटी चल जाएगी। लेकिन एक विनर वाली स्ट्रैटजी क्या होगी। वो ये देखेगा कि मोहल्ले के लोग फिटनेस के नाम पर क्या मिस कर रहे हैं। क्या वहां कोई प्रोफेशनल डाइट प्लान देने वाला नहीं है। क्या वहां की मशीनें जंग खा रही हैं। जब आप तय करते हैं कि आपको शहर की सबसे बेहतरीन सर्विस देनी है और हर कस्टमर की लाइफ बदलनी है, तब आप जीतने के लिए खेलते हैं।
अक्सर देखा गया है कि लोग कॉम्पिटिशन से इतना डर जाते हैं कि वो बस अपना बचाव करने में लग जाते हैं। वो सोचते हैं कि अगर पड़ोसी दुकानदार ने रेट कम किए, तो मैं भी कम कर दूंगा। ये तो वही बात हुई कि सामने वाला कुएं में कूदा तो आपने भी छलांग लगा दी। स्ट्रैटजी का मतलब दूसरों की नकल करना नहीं, बल्कि अपना एक ऐसा स्टैंडर्ड सेट करना है कि दूसरे आपकी धूल चाटते रह जाएं। बिना एक क्लियर 'विंनिंग एस्पिरेशन' के आप उस फुटबॉल प्लेयर की तरह हैं जो मैदान में दौड़ तो रहा है, लेकिन उसे ये नहीं पता कि गोल पोस्ट किस तरफ है। ऐसे में आप थकेंगे भी और हारेंगे भी।
प्रोफेशनल लाइफ में भी यही हाल है। बहुत से लोग अपनी जॉब में सिर्फ इसलिए जाते हैं ताकि महीने के आखिर में सैलरी आ जाए। वो सोचते हैं कि बस बॉस की नजरों में न आएं और काम चलता रहे। ये सर्वाइवल माइंडसेट है। जब तक आप ये तय नहीं करेंगे कि आपको अपनी फील्ड का सबसे एक्सपर्ट इंसान बनना है, तब तक आप बस एक एवरेज एम्प्लॉई बने रहेंगे। याद रखिए, दुनिया सिर्फ उन्हीं को याद रखती है जो ट्रॉफी उठाते हैं, उन्हें नहीं जो सिर्फ तालियां बजाने के लिए स्टेडियम में मौजूद थे। जीत का जुनून ही आपको वो मुश्किल फैसले लेने की ताकत देता है जो एक आम इंसान कभी नहीं ले पाता।
इसलिए आज ही खुद से पूछिए कि क्या आप बस भीड़ का हिस्सा हैं या आप लीड करने आए हैं। अगर आपका गोल नंबर 1 बनना नहीं है, तो बेहतर है कि आप मैदान छोड़ दें और किसी विनर के लिए काम करना शुरू कर दें। क्योंकि मिडिल क्लास स्ट्रैटजी से कभी वर्ल्ड क्लास रिजल्ट नहीं मिलते। ये कड़वा है पर सच है। जब आप ये तय कर लेते हैं कि जीतना ही एकमात्र ऑप्शन है, तभी आप अगले कदम की ओर बढ़ पाते हैं जिसे हम 'कहां खेलना है' कहते हैं।
लेसन २ : सही मैदान चुनना ही आधी जीत है
जब आपने तय कर लिया कि आपको जीतना है, तो अगला सवाल आता है कि आखिर लड़ाई लड़नी कहाँ है। अक्सर लोग जोश में आकर हर जगह हाथ पैर मारने लगते हैं। उन्हें लगता है कि अगर वो हर किसी को अपना सामान बेचेंगे, तो वो जल्दी अमीर बन जाएंगे। लेकिन सच तो ये है कि अगर आप सबके लिए कुछ बनना चाहते हैं, तो आप किसी के लिए भी कुछ नहीं बन पाते। स्ट्रैटजी का मतलब ये नहीं है कि आपको क्या करना है, बल्कि इसका असली मतलब ये है कि आपको क्या 'नहीं' करना है। सही मैदान या 'वेयर टू प्ले' चुनना ही एक स्मार्ट बिजनेसमैन की असली पहचान है।
मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं। अब अगर आप मेनू में इटालियन, चाइनीज, साउथ इंडियन और चाट-पकोड़े सब रख लेंगे, तो लोग कन्फ्यूज हो जाएंगे। आप हलवाई की दुकान खोल रहे हैं या फाइव स्टार होटल। अगर आप हर गली के नुक्कड़ पर अपना आउटलेट खोलेंगे तो शायद आप क्वालिटी मेंटेन न कर पाएं। लेकिन अगर आप तय करते हैं कि आपको सिर्फ और सिर्फ 'प्रीमियम कॉफी' बेचनी है और वो भी सिर्फ उन ऑफिस जाने वाले लोगों को जो क्वालिटी के लिए पैसे दे सकते हैं, तो आपने अपना मैदान चुन लिया है। अब आपका कॉम्पिटिशन हर चाय की टपरी से नहीं है, बल्कि सिर्फ उन चुनिंदा ब्रांड्स से है जो उस लेवल पर काम कर रहे हैं।
लोग अक्सर गलती ये करते हैं कि वो वहां चले जाते हैं जहां पहले से ही बहुत भीड़ होती है। उन्हें लगता है कि अगर सब लोग कपड़े बेच रहे हैं, तो मैं भी कपड़े ही बेचूंगा। भाई, अगर समंदर में पहले से ही बहुत सारी शार्क मछली मौजूद हैं, तो आपको वहां सिर्फ खून और लड़ाई मिलेगी। इसे 'रेड ओशन' कहते हैं। अकलमंदी इसमें है कि आप वो नीला समंदर ढूंढें जहां कोई और न हो। आपको ये चुनना होगा कि आपका कस्टमर कौन है, उसकी उम्र क्या है, वो कहाँ रहता है और उसकी जेब में कितने पैसे हैं। अगर आप इन सवालों के जवाब नहीं जानते, तो आप बस अंधेरे में तीर चला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि निशाना लग जाए।
कई बार तो बड़ी कंपनियां भी ये गलती कर बैठती हैं। वो एक ही ब्रांड के नाम से साबुन, तेल और बिस्किट सब बेचने लगती हैं। नतीजा ये होता है कि कस्टमर का भरोसा उठ जाता है। आपको ये समझना होगा कि आपकी ताकत क्या है। अगर आप कम दाम में अच्छी चीज दे सकते हैं, तो मास मार्केट में जाइए। लेकिन अगर आप लग्जरी और एक्सपीरियंस देना चाहते हैं, तो फिर डिस्काउंट मांगने वाले ग्राहकों को टाटा-बाय-बाय कह दीजिए। हर किसी को खुश करने की कोशिश करेंगे तो आखिर में आप खुद दुखी हो जाएंगे और आपका बैंक बैलेंस भी।
बिजनेस में 'ना' कहना सीखना बहुत मुश्किल है लेकिन बहुत जरूरी है। जब आप गलत कस्टमर या गलत मार्केट को मना करते हैं, तब आप असल में अपने सही कस्टमर के लिए जगह बना रहे होते हैं। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी पार्टी में जाते हैं और वहां मौजूद हर इंसान से दोस्ती करने की कोशिश करते हैं। अंत में आपको किसी का नाम भी याद नहीं रहता। लेकिन अगर आप सिर्फ दो ऐसे लोगों से बात करें जिनसे आपके विचार मिलते हैं, तो वो रिश्ता लंबा चलता है। स्ट्रैटजी भी रिश्तों की तरह है, गहरा होना जरूरी है, फैला हुआ नहीं।
इसलिए अपने रिसोर्सेज को बर्बाद मत कीजिए। अपनी एनर्जी वहां लगाइए जहां आपके जीतने के चांस सबसे ज्यादा हों। अगर आप एक छोटी मछली हैं, तो बड़े समंदर में जाने के बजाय एक छोटे तालाब के राजा बनिए। जब आप अपना मैदान चुन लेते हैं, तब बारी आती है ये तय करने की कि उस मैदान में आप दूसरों को धूल कैसे चटाएंगे।
लेसन ३ : अपनी खास ताकत को पहचानो और उसे हथियार बनाओ
मैदान चुन लिया और जीतने की कसम भी खा ली, लेकिन अगर आपके पास सही हथियार नहीं हैं तो आप बस एक इमोशनल लूजर बनकर रह जाएंगे। स्ट्रैटजी की दुनिया में इसे 'हाउ टू विन' और 'कोर कैपेबिलिटीज' कहते हैं। इसका मतलब है कि आपके पास ऐसा क्या खास है जो आपके कॉम्पिटिटर के पास नहीं है। अगर आप भी वही कर रहे हैं जो बाकी सब कर रहे हैं, तो कस्टमर आपके पास क्यों आएगा। क्या आप अपनी शक्ल दिखाने के पैसे लेंगे। बिल्कुल नहीं। आपको अपनी एक ऐसी खास ताकत या सिस्टम बनाना होगा जिसे कॉपी करना नामुमकिन हो।
आपने अपने शहर के उस मशहूर चाट वाले को तो देखा ही होगा जिसके पास हमेशा भीड़ रहती है। जबकि उसके बगल वाला खाली बैठा मक्खियां मारता है। क्या फर्क है दोनों में। क्या उसके पास कोई जादुई मसाला है। शायद हां, लेकिन असल में उसकी 'कोर कैपेबिलिटी' उसकी कंसिस्टेंसी और वो खास स्वाद है जो उसने सालों की मेहनत से बनाया है। वो जानता है कि उसका 'हाउ टू विन' उसका सीक्रेट मसाला और बिजली की रफ्तार से सर्विस देना है। वो सिर्फ आलू टिक्की नहीं बेच रहा, वो एक ऐसा एक्सपीरियंस दे रहा है जिसे लोग लाइन में लगकर भी लेना चाहते हैं।
बिजनेस में जीत के दो ही रास्ते होते हैं। या तो आप सबसे सस्ते हो जाओ या फिर आप इतने अलग बन जाओ कि कीमत मायने ही न रखे। अगर आप अपनी ताकत नहीं जानते, तो आप बीच में फंस जाएंगे। और यकीन मानिए, बीच में फंसने वालों को मार्केट कुचलकर आगे निकल जाता है। आपको अपनी कंपनी के अंदर वो सिस्टम बनाना होगा जो आपकी जीत को मुमकिन बनाए। अगर आपका वादा सबसे तेज डिलीवरी का है, तो आपका लॉजिस्टिक्स सिस्टम दुनिया में सबसे बेस्ट होना चाहिए। सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करने से सेल्स नहीं बढ़ती, बैकएंड पर मजबूत काबिलियत होनी चाहिए।
अक्सर लोग सोचते हैं कि नई टेक्नोलॉजी खरीद लेने से वो जीत जाएंगे। भाई, लैपटॉप खरीदने से कोई राइटर नहीं बन जाता। वैसे ही सॉफ्टवेयर डालने से बिजनेस महान नहीं बनता। महानता आती है उन लोगों और उस प्रोसेस से जो उस टेक्नोलॉजी को चलाते हैं। आपकी असली ताकत आपकी टीम की स्किल, आपका डेटा और आपके काम करने का खास तरीका है। जब एजी लाफले पी एंड जी (P&G) के हेड थे, तो उन्होंने इनोवेशन को अपनी कोर कैपेबिलिटी बनाया। उन्होंने तय किया कि हर प्रोडक्ट पहले वाले से बेहतर होगा। उन्होंने सिर्फ मार्केटिंग पर पैसा नहीं फूंका, बल्कि रिसर्च और डेवलपमेंट को अपना हथियार बनाया।
आखिर में याद रखिए कि एक अच्छी स्ट्रैटजी कभी भी पत्थर की लकीर नहीं होती। आपको लगातार अपनी क्षमताओं को निखारना पड़ता है। अगर आप आज रुक गए, तो कल कोई और आपसे बेहतर सिस्टम लेकर आ जाएगा और आपको मार्केट से बाहर कर देगा। जीतना एक बार का काम नहीं है, ये एक आदत है। अपनी ताकत को पहचानिए, उसे तराशिए और फिर उस ताकत के दम पर अपने चुने हुए मैदान में राज कीजिए। स्ट्रैटजी कोई रॉकेट साइंस नहीं है, ये बस होश में रहकर लिए गए सही फैसलों का एक कलेक्शन है।
तो दोस्तों, स्ट्रैटजी का मतलब सिर्फ पेपर पर डायग्राम बनाना नहीं है, बल्कि मैदान में उतरकर अपने हिस्से की जीत छीनना है। क्या आप आज भी बिना किसी प्लानिंग के बस वक्त काट रहे हैं या आपने अपना 'विंनिंग फॉर्मूला' तैयार कर लिया है। याद रखिए, जो खुद अपनी तकदीर नहीं लिखते, उनकी तकदीर फिर उनके दुश्मन लिखते हैं। अभी नीचे कमेंट में बताइए कि आपके बिजनेस या करियर का वो कौन सा एक 'मैदान' है जहां आप नंबर 1 बनना चाहते हैं। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो बस मेहनत कर रहे हैं पर उन्हें नतीजे नहीं मिल रहे। चलिए, अब जीतने की बारी आपकी है।
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