अगर आप आज भी वही घिसी पिटी सेफ्टी और एवरेज लाइफ की पूंछ पकड़कर बैठे हैं तो बधाई हो आप अपनी बर्बादी का टिकट खुद काट रहे हैं। दुनिया बदल गई पर आपका वही पुराना ढर्रा आपको गड्ढे में ले जा रहा है और आप मजे से सो रहे हैं।
आज के इस डिजिटल दौर में फिट इन होना सबसे बड़ी बेवकूफी है। इस आर्टिकल में हम सेठ गोडिन की किताब के वो 3 लेसन देखेंगे जो आपको एवरेज रहने की बीमारी से हमेशा के लिए आजाद कर देंगे।
लेसन १ : सेफ खेलना ही अब सबसे डेंजरस रिस्क है
पुराने जमाने में हमारे पेरेंट्स और सोसाइटी हमें एक ही बात सिखाते थे कि बेटा बस सेफ खेलो। चुपचाप एक कोने में बैठकर अपनी जॉब करो और सिर मत उठाओ। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वो इकारस वाली कहानी अधूरी क्यों सुनाई गई। हमें सिर्फ यह बताया गया कि इकारस सूरज के बहुत पास उड़ गया था और उसके मोम के पंख पिघल गए जिससे वह गिरकर मर गया। लेकिन असली धोखा तो यह है कि उस कहानी में उसे यह भी चेतावनी दी गई थी कि बहुत नीचे मत उड़ना। क्योंकि समुद्र की नमी उसके पंखों को भारी कर देगी और वह तब भी डूब जाएगा। आज के दौर में हम वही गलती कर रहे हैं। हम इतना नीचे उड़ रहे हैं कि समुद्र की लहरें हमारे सपनों को भिगो रही हैं।
आज के इस कॉम्पिटिटिव वर्ल्ड में एवरेज बने रहना सुसाइड करने जैसा है। अगर आप सोचते हैं कि आप सिर्फ अपना काम ठीक से करके और ऑफिस में जी हजुरी करके अपनी लाइफ सिक्योर कर लेंगे तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। असल में यह सेफ खेलने की आदत ही आपको सबसे पहले रिप्लेस करवाएगी। सोचिए अगर आप एक ऐसे रोबोट की तरह काम कर रहे हैं जिसका कोई भी सब्स्टीट्यूट मिल सकता है तो कंपनी आपको क्यों रखेगी। लोग अक्सर कहते हैं कि मुझे रिस्क लेने से डर लगता है पर सच तो यह है कि रिस्क न लेना ही सबसे बड़ा रिस्क बन चुका है।
दुनिया इतनी तेज बदल रही है कि कल की सेफ्टी आज की बर्बादी बन चुकी है। आप अपनी उसी पुरानी स्किल्स को पकड़कर बैठे हैं जैसे कोई डूबता हुआ इंसान तिनके का सहारा लेता है। लेकिन वो तिनका आपको डूबने से नहीं बचाएगा। सेठ गोडिन कहते हैं कि इकारस का धोखा यही है कि हमें कम उड़ने के लिए मनाया गया। हमें सिखाया गया कि मिडिल क्लास बने रहो और ज्यादा शोर मत मचाओ। पर क्या आपको पता है कि सबसे ज्यादा भीड़ और धक्का मुक्की उसी मिडिल ग्राउंड पर है। वहां सब एक दूसरे का पैर खींच रहे हैं और कोई कहीं नहीं पहुंच रहा।
अगर आप आज भी उसी कम्फर्ट जोन में दुबककर बैठे हैं तो आप उस चूहे की तरह हैं जो पिंजरे के अंदर रखे पनीर को अपनी पूरी दुनिया मान चुका है। बाहर की बिल्ली से बचने के चक्कर में आपने खुद को कैद कर लिया है। असली मजे की बात यह है कि जिस सेफ्टी के पीछे आप भाग रहे हैं वो एक मृगतृष्णा के सिवा कुछ नहीं है। जब ले ऑफ आता है या मार्केट क्रैश होता है तो सबसे पहले वही लोग बाहर होते हैं जो एवरेज थे। इसलिए अगर आपको उड़ना है तो वो बीच का रास्ता छोड़ना होगा।
आपको अपनी लिमिट्स को पुश करना ही होगा। यह सोचना बंद कर दीजिए कि कोई फरिश्ता आएगा और आपका हाथ पकड़कर आपको टॉप पर ले जाएगा। आपको खुद अपने पंख फैलाने होंगे और थोड़ा ऊपर उठना होगा। हां ऊपर जाने में सूरज की गर्मी है और नीचे गिरने का डर भी है पर कम से कम वहां ताजी हवा तो मिलेगी। इस भीड़ का हिस्सा बनकर आप सिर्फ अपनी वैल्यू कम कर रहे हैं। याद रखिए जो इंसान भीड़ में चलता है वो अक्सर भीड़ में ही खो जाता है। इसलिए अपनी सेफ्टी की पुरानी चादर ओढ़ना छोड़िए और असली रिस्क लीजिए जो कि है खुद को एक्सप्रेस करना।
लेसन २ : अपने काम को एक आर्ट की तरह ट्रीट करना सीखे
अक्सर जब हम आर्टिस्ट शब्द सुनते हैं तो हमारे दिमाग में किसी पेंटर या म्यूजिशियन की फोटो आती है। लेकिन सेठ गोडिन कहते हैं कि आर्ट का मतलब सिर्फ पेंट ब्रश उठाना नहीं है। आर्ट का मतलब है कोई ऐसा काम करना जिसमें आपकी आत्मा झलकती हो और जो किसी दूसरे के लिए तोहफा बन जाए। अगर आप एक एक्सेल शीट भी बना रहे हैं और उसे इस तरह बनाते हैं कि देखने वाला दंग रह जाए तो आप एक आर्टिस्ट हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि हममें से ज्यादातर लोग सिर्फ एक मशीन के पुर्जे बनकर रह गए हैं। हम बस इंस्ट्रक्शंस फॉलो करते हैं जैसे कोई आज्ञाकारी नौकर करता है।
सोचिए अगर आपकी जगह कोई और भी वही काम बिलकुल वैसा ही कर सकता है तो आपकी वैल्यू क्या है। जीरो। आप बस एक रिप्लेसेबल आइटम हैं जैसे रिमोट का सेल खत्म होने पर बदल दिया जाता है। असली आर्टिस्ट वो होता है जिसका काम यूनिक होता है। वो काम जो दिल से किया गया हो और जिसमें रिस्क हो। रिस्क इस बात का कि शायद यह लोगों को पसंद न आए। रिस्क इस बात का कि लोग आपका मजाक उड़ाएं। लेकिन बिना इस डर के कोई भी महान काम नहीं हो सकता। अगर आप फेल होने से इतना डरते हैं कि कुछ नया ट्राई ही नहीं करते तो आप सिर्फ मजदूरी कर रहे हैं चाहे आपकी सैलरी लाखों में क्यों न हो।
समाज ने हमें सिखाया है कि चुपचाप लाइन में लगो और अपनी बारी का इंतजार करो। लेकिन आर्टिस्ट अपनी लाइन खुद बनाता है। वह परमिशन का इंतजार नहीं करता। आज के समय में आपको किसी बॉस या पब्लिशर की हरी झंडी नहीं चाहिए। आपके पास इंटरनेट है और अपनी बात कहने की पूरी आजादी है। फिर भी आप डर रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि आप अभी तैयार नहीं हैं। सच तो यह है कि कोई भी कभी तैयार नहीं होता। तैयारी एक बहाना है अपने डर को छुपाने का। आप बस एक और कोर्स करना चाहते हैं या एक और किताब पढ़ना चाहते हैं ताकि असल काम न करना पड़े।
आर्टिस्ट बनने का मतलब यह नहीं है कि आप कल से ही ऑफिस जाना छोड़ दें। इसका मतलब है कि आप जो भी कर रहे हैं उसमें अपना सिग्नेचर छोड़ें। जब आप किसी से बात करें या कोई प्रोजेक्ट हैंडल करें तो उसमें आपकी अपनी एक अलग छाप होनी चाहिए। लोग आपको आपके नाम से नहीं बल्कि आपके काम के उस खास तरीके से पहचानें। क्या आप जानते हैं कि सबसे ज्यादा बोरिंग चीज क्या है। वो है एक जैसा होना। अगर आप भी उसी घिसी पिटी भाषा में ईमेल लिखते हैं और वही बोरिंग प्रेजेंटेशन देते हैं तो आप बस शोर बढ़ा रहे हैं।
असली जादू तब होता है जब आप अपने काम को लेकर थोड़े जुनूनी हो जाते हैं। लोग आपको पागल कहेंगे और शायद आपका मजाक भी बनाएंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि दुनिया को वही लोग बदलते हैं जिन्हें पहले पागल समझा गया था। क्या आप उस भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं जो सिर्फ दूसरों की सफलता पर तालियां बजाती है या आप वो इंसान बनना चाहते हैं जिसके लिए तालियां बजती हैं। चॉइस आपकी है। लेकिन याद रखिए बिना आर्ट के आपकी लाइफ एक फीकी दाल जैसी है जिसमें नमक तक नहीं है। अपने अंदर के उस कलाकार को जगाइए जो सालों से डर के मारे सोया हुआ है।
लेसन ३ : फेलियर से डरे नहीं बल्कि उसे सीखने का जरिया बनाए
हमारा एजुकेशन सिस्टम हमें एक बहुत बड़ी झूठ के साथ बड़ा करता है और वो झूठ यह है कि फेल होना पाप है। बचपन में अगर एग्जाम में नंबर कम आए तो ऐसे देखा जाता था जैसे हमने कोई मर्डर कर दिया हो। यही डर हमारे खून में ऐसा घुल गया है कि अब हम कुछ भी नया करने से पहले दस बार सोचते हैं। लेकिन सेठ गोडिन कहते हैं कि अगर आप फेल नहीं हो रहे हैं तो इसका सीधा मतलब है कि आप कुछ खास कर ही नहीं रहे हैं। आप बस उसी पुरानी पटरी पर चल रहे हैं जहाँ एक्सीडेंट का खतरा कम है पर मंजिल भी बोरिंग है। फेलियर कोई अंत नहीं है बल्कि यह एक फीडबैक है जो आपको बताता है कि अगला कदम कैसे उठाना है।
जरा सोचिए जब एक छोटा बच्चा चलना सीखता है तो वह कितनी बार गिरता है। क्या कभी उसके मां बाप उसे यह कहते हैं कि तुम गिर गए अब तुम कभी नहीं चल पाओगे। नहीं न। तो फिर बड़े होकर हम खुद को यह सजा क्यों देते हैं। असल में हमारी ईगो हमें रोकती है। हमें डर लगता है कि लोग क्या कहेंगे। वो शर्मा जी का लड़का क्या सोचेगा या ऑफिस के कलीग्स पीठ पीछे क्या बातें करेंगे। मजे की बात तो यह है कि किसी के पास आपके बारे में सोचने का इतना टाइम ही नहीं है। सब अपनी अपनी लाइफ की खिचड़ी पकाने में बिजी हैं और आप दूसरों के ओपिनियन के चक्कर में अपने सपनों का गला घोंट रहे हैं।
आज के इस नए इकॉनमी में फेलियर एक सर्टिफिकेट है कि आपने कम से कम कोशिश तो की। जो इंसान गिरता है वही जानता है कि जमीन कैसी है और दोबारा कैसे खड़े होना है। अगर आप हमेशा सेफ जोन में रहे हैं तो आप एक नाजुक कांच के खिलौने की तरह हैं जो जरा सी मुश्किल आते ही बिखर जाएगा। लेकिन अगर आप फेलियर को गले लगाना सीख जाते हैं तो आप स्टील बन जाते हैं। हर चोट आपको और मजबूत बनाती है। असली आर्टिस्ट वही है जो अपना काम दुनिया के सामने रखता है और कहता है कि यह मेरा बेस्ट था अगर आपको पसंद नहीं आया तो मैं अगली बार और बेहतर करके आऊंगा।
लोग अक्सर परफेक्ट होने का इंतजार करते हैं। वो सोचते हैं कि जब सब कुछ सही होगा तब मैं अपना ब्लॉग शुरू करूंगा या अपना बिजनेस प्लान बताऊंगा। पर सच तो यह है कि परफेक्शन एक बीमारी है जो आपको पैरालाइज कर देती है। आप कभी परफेक्ट नहीं होंगे और आपका पहला काम हमेशा खराब ही होगा। और यह अच्छी बात है। क्योंकि वहीं से सुधार की गुंजाइश शुरू होती है। अगर आप फेल होने के डर से स्टेज पर ही नहीं चढ़ेंगे तो लोग आपकी आवाज कैसे सुनेंगे। मजाक बनने दीजिए क्योंकि जो लोग मजाक उड़ा रहे हैं उनकी खुद की लाइफ इतनी बोरिंग है कि उनके पास दूसरों को जज करने के अलावा कोई काम नहीं है।
तो अब चॉइस आपकी है। क्या आप उस किनारे पर बैठकर लहरों को गिनना चाहते हैं या समंदर में कूदकर तैरना सीखना चाहते हैं। याद रखिए लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती। फेलियर को अपना दुश्मन नहीं बल्कि अपना टीचर बनाइए। जितनी जल्दी आप फेल होंगे उतनी ही जल्दी आप सफलता के करीब पहुंचेंगे। अपनी गलतियों पर हंसना सीखिए और अगले दिन फिर से एक नई उमंग के साथ काम पर लग जाइए। यही वो रास्ता है जो आपको उस भीड़ से अलग करेगा जो सिर्फ किस्मत को कोसना जानती है।
द इकारस डिसेप्शन हमें याद दिलाती है कि हम सब एक कलाकार हैं और हमें बहुत नीचे उड़ने के लिए नहीं बनाया गया है। अब समय आ गया है कि आप उन पुरानी जंजीरों को तोड़ें और अपनी खुद की पहचान बनाएं। एवरेज लाइफ जीना छोड़िए और आज ही कुछ ऐसा शुरू कीजिए जिससे आपको डर लगता हो।
क्या आप आज से अपनी लाइफ को एक आर्ट की तरह जीने के लिए तैयार हैं। नीचे कमेंट्स में 'यस' लिखें और बताएं कि आप अपना पहला रिस्क क्या लेने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपनी बोरिंग जॉब से परेशान हैं। उठिए और उड़ना शुरू कीजिए।
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