Pre-Suasion (Hindi)


आप पूरी जिंदगी लोगों को कन्विंस करने में गधों की तरह मेहनत करते रहेंगे और अंत में हाथ खाली ही रहेगा। अगर आपको लगता है कि सिर्फ अच्छी बात बोलने से काम बन जाएगा तो मुबारक हो आप सबसे बड़े भ्रम में जी रहे हैं। बिना प्री सुएशन के आपकी हर कोशिश मिट्टी के मोल है।

आज हम रॉबर्ट सियालडिनी की मास्टरक्लास से वह सीक्रेट्स निकालेंगे जो आपको किसी भी बातचीत का बॉस बना देंगे। हम उन ३ लेसन पर बात करेंगे जो यह सिखाते हैं कि बोलने से पहले ही सामने वाले का दिमाग अपने हक में कैसे तैयार किया जाता है।


लेसन १ : प्रिविलेज्ड मोमेंट - बात शुरू होने से पहले ही गेम जीतना

मान लीजिए आप अपनी पसंद की लड़की को डेट पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। आप बहुत अच्छी शर्ट पहनते हैं और महंगे परफ्यूम छिड़कते हैं। लेकिन जैसे ही आप उससे बात शुरू करते हैं पीछे से किसी के चिल्लाने की आवाज आती है। आपकी पूरी मेहनत बेकार हो गई। क्यों। क्योंकि आपने उस 'प्रिविलेज्ड मोमेंट' को खो दिया। रॉबर्ट सियालडिनी कहते हैं कि इन्फ्लुएंस करने का असली खेल वह नहीं है जो आप कहते हैं बल्कि वह है जो आप 'कहने से पहले' करते हैं।

एक बार कुछ रिसर्चर्स ने लोगों से एक नया सॉफ्ट ड्रिंक टेस्ट करने को कहा। उन्होंने बस एक छोटा सा बदलाव किया। आधे लोगों से पूछने से पहले उनसे एक सवाल किया गया कि क्या आप खुद को एक एडवेंचरस इंसान मानते हैं। अब जिनको एडवेंचरस फील कराया गया उनमें से ९७% लोगों ने वह ड्रिंक ट्राई किया। दूसरी तरफ जिनसे कुछ नहीं पूछा गया था उनमें से बहुत कम लोग तैयार हुए। इसे कहते हैं दिमाग का दरवाजा खोलना। अगर आपने सामने वाले के दिमाग में एक खास 'फ्रेम' सेट कर दिया है तो वह आपकी बात सुनने के लिए मजबूर हो जाएगा।

आजकल के इन्फ्लुएंसर भी यही करते हैं। वे पहले आपको अपनी अमीरी दिखाएंगे और फिर अपना कोर्स बेचेंगे। आपको लगेगा कि अगर यह अमीर है तो इसका कोर्स भी अच्छा ही होगा। यह सरासर दिमाग के साथ मजाक है लेकिन यह काम करता है। अगर आप इंटरव्यू में जा रहे हैं और सीधे सैलरी की बात करते हैं तो आप हार जाएंगे। लेकिन अगर आप पहले कंपनी की बड़ी जीत के बारे में बात करें और फिर अपनी वैल्यू बताएं तो बॉस को लगेगा कि आप उनकी टीम के लिए भगवान का वरदान हैं।

आपका मैसेज क्या है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि रिसीवर उस वक्त क्या सोच रहा है। अगर आप किसी को डराकर इन्शुरन्स बेचना चाहते हैं तो पहले उन्हें किसी एक्सीडेंट की खबर सुनाइये। जब उनका दिमाग डर की लहरों पर तैर रहा होगा तब आपका इन्शुरन्स प्लान उन्हें लाइफबोट जैसा लगेगा। यह थोड़ा चालाकी भरा लग सकता है लेकिन दुनिया इसी तरह चलती है। अगर आप सही समय का इंतजार कर रहे हैं तो आप कभी नहीं जीतेंगे। आपको वह समय 'बनाना' पड़ेगा।


लेसन २ : चैनलिंग अटेंशन - जहाँ ध्यान जाएगा वहीं पैसा बरसेगा

क्या आपने कभी गौर किया है कि जब आप नया फोन खरीदने का सोचते हैं तो अचानक सड़क पर हर दूसरे इंसान के हाथ में वही फोन दिखने लगता है। क्या रातों रात पूरी दुनिया ने वही फोन खरीद लिया। बिलकुल नहीं। असल में आपका ध्यान उस पर टिक गया है। रॉबर्ट सियालडिनी कहते हैं कि जो चीज हमारे ध्यान के केंद्र में होती है हमारा दिमाग उसे ही सबसे ज्यादा जरूरी मान लेता है। यह एक दिमागी फ्रॉड है जिसे प्रोफेशनल लोग बखूबी इस्तेमाल करते हैं।

मान लीजिए आप एक ऑनलाइन स्टोर चला रहे हैं। अगर आपके बैकग्राउंड में बादलों वाली फोटो लगी है तो लोग आराम और कंफर्ट वाले फर्नीचर की तलाश करेंगे। वहीं अगर आपने बैकग्राउंड में पैसों के सिक्के लगा दिए तो लोग सबसे सस्ता सामान ढूंढने लगेंगे। सामने वाले को पता भी नहीं चलता कि उसके फैसले को कोई पीछे से रिमोट कंट्रोल की तरह चला रहा है। यह वैसा ही है जैसे दिवाली की सेल में आपको बड़ी बड़ी लाल पट्टियाँ दिखती हैं। आपका दिमाग कहता है कि भाई कुछ तो बड़ा हो रहा है चाहे अंदर कचरा ही क्यों न बिक रहा हो।

लोग अक्सर कहते हैं कि वे बहुत सोच समझकर फैसला लेते हैं पर असलियत में वे सिर्फ उसी चीज को चुनते हैं जो उनके सामने चमक रही होती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका क्लाइंट आपकी सर्विस खरीदे तो उसे अपनी खूबियों के बारे में मत बताइए। उसे उन समस्याओं के बारे में बताइए जो आपके बिना उसे झेलनी पड़ेंगी। जब उसका पूरा ध्यान उस दर्द पर होगा तब आपका सोल्यूशन उसे जन्नत जैसा लगेगा। याद रखिये जो दिखता है वही बिकता है और जो बार बार दिखता है वह तो प्रीमियम दाम पर बिकता है।


लेसन ३ : यूनिटी प्रिंसिपल - हम सब एक ही थाली के चट्टे बट्टे हैं

इंसान एक सामाजिक जानवर है और उसे अपनी बिरादरी से बहुत प्यार है। अगर आप किसी को यह महसूस करा दें कि "हम और आप एक ही हैं" तो वह आपके लिए अपनी जान भी दे सकता है और आपका सामान तो खरीदेगा ही। यह पर्सुएशन का सबसे ऊंचा लेवल है। यहाँ लॉजिक काम नहीं करता यहाँ सिर्फ जज्बात चलते हैं। सियालडिनी इसे 'यूनिटी' कहते हैं। यह सिर्फ समानता नहीं है बल्कि यह एक पहचान है।

एक बार एक सेल्समैन एक घर में गया और उसने देखा कि घर के मालिक के पास वही पुराना कैमरा है जो उसके पिता के पास हुआ करता था। उसने बस इतना कहा कि अरे यह कैमरा तो मेरे घर की याद दिलाता है। बस फिर क्या था। आधे घंटे तक कैमरों पर चर्चा हुई और अंत में मालिक ने बिना कोई सवाल किए एक महंगा वैक्यूम क्लीनर खरीद लिया। क्यों। क्योंकि अब वह सेल्समैन एक अजनबी नहीं था बल्कि वह 'अपना' आदमी बन गया था। यह सुनने में फिल्मी लगता है पर आपकी जेब काटने के लिए काफी है।

हम उन लोगों की बात कभी नहीं टालते जिन्हें हम अपने जैसा समझते हैं। अगर आप किसी इन्वेस्टर को पिच कर रहे हैं और आपको पता चले कि वह भी उसी शहर से है जहाँ से आप हैं तो समझिये आधा काम हो गया। बातचीत में "मैं" और "तुम" की जगह "हम" का इस्तेमाल करना शुरू कीजिये। जब आप किसी को यह एहसास दिलाते हैं कि आप उनके संघर्ष और उनकी खुशियों के साथी हैं तो उनके दिमाग के सारे सुरक्षा गार्ड सो जाते हैं। अंत में असली इन्फ्लुएंस वह है जहाँ सामने वाले को लगे कि वह आपके लिए नहीं बल्कि खुद के लिए काम कर रहा है।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी पुराने घिसे पिटे तरीके से लोगों को मनाने की कोशिश करेंगे या प्री सुएशन के इस जादू को अपनी लाइफ में उतारेंगे। याद रखिये दुनिया आपको तभी सुनेगी जब आप उनके सुनने का माहौल तैयार करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा बहस में हार जाता है और कमेंट में बताइये कि क्या आप कभी ऐसे किसी जाल में फंसे हैं।

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