अगर आपको लगता है कि आप अपनी लाइफ के सुपरहीरो हैं और बिना किसी सिस्टम के दुनिया जीत लेंगे तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का इंतजार कर रहे हैं। बिना प्रिंसिपल्स के जीना वैसा ही है जैसे बिना मैप के जंगल में सेल्फी लेना। आप बस भटक रहे हैं और टाइम वेस्ट कर रहे हैं।
रे डेलियो की बुक प्रिंसिपल्स हमें सिखाती है कि लाइफ और काम करने का सही तरीका क्या है। अगर आप भी तुक्के मारना बंद करके एक सॉलिड सिस्टम बनाना चाहते हैं तो ये ३ लेसन आपकी पूरी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : रेडिकल ट्रुथ और ट्रांसपेरेंसी - सच कड़वा है पर लाइफ सेट कर देता है
अगर आप उन लोगों में से हैं जो अपनी गलती होने पर सारा दोष ऊपर वाले की मर्जी या फिर खराब किस्मत पर डाल देते हैं तो रे डेलियो आपके लिए बड़े बुरे इंसान साबित हो सकते हैं। रे डेलियो का पहला और सबसे पावरफुल लेसन है रेडिकल ट्रुथ यानी कि ऐसा सच जो बिलकुल नंगा हो और जिसमें दिखावे की कोई जगह न हो। हम सब की आदत होती है कि हम अपनी कमियों को एक बहुत ही खूबसूरत गिफ्ट रैपर में लपेट कर दुनिया के सामने रखते हैं। पर भाई साहब सच तो ये है कि अगर आप खुद से और अपनी टीम से झूठ बोल रहे हैं तो आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसमें छेद है और आप पानी बाहर निकालने के बजाय गाना गा रहे हैं।
रेडिकल ट्रुथ का मतलब है कि आपके दिमाग में जो चल रहा है उसे टेबल पर रख दो। मान लीजिए आपका स्टार्टअप फेल हो रहा है या आपका प्रोजेक्ट टाइम पर पूरा नहीं हुआ। अब यहाँ दो रास्ते हैं। पहला रास्ता ये है कि आप बहाने बनाएँ कि क्लाइंट बहुत खडूस था या इंटरनेट नहीं चल रहा था। दूसरा रास्ता ये है कि आप रेडिकल ट्रुथ को अपनाएँ और सबके सामने कहें कि हाँ भाई मैंने आलस किया और मेरा मैनेजमेंट एकदम कचरा था। सुनने में ये बड़ा डरावना लगता है क्योंकि हमारी ईगो हमें ऐसा करने से रोकती है। हमारा प्यारा सा ईगो हमें कहता है कि भाई तू तो परफेक्ट है दुनिया ही खराब है। लेकिन जब तक आप अपनी गलती को एडमिट नहीं करेंगे आप उसे सुधारेंगे कैसे।
रे डेलियो कहते हैं कि ट्रांसपेरेंसी का मतलब ये नहीं कि आप हर किसी को अपनी पर्सनल लाइफ की बातें बताएँ बल्कि इसका मतलब ये है कि ऑफिस या काम के दौरान हर चीज शीशे की तरह साफ होनी चाहिए। सोचिए अगर आपके बॉस को आपकी कोई बात पसंद नहीं आई और वो आपके पीछे आपकी बुराई कर रहे हैं तो आपको कैसा लगेगा। बुरा लगेगा न। पर अगर वही बॉस आपके मुँह पर बोल दे कि भाई तूने ये काम बहुत ही घटिया किया है इसे फिर से कर तो शुरू में आपको गुस्सा आएगा पर अंत में आपका काम सुधर जाएगा। ये सार्काज्म नहीं बल्कि असलियत है कि हम कड़वी बातें सुनना पसंद नहीं करते इसीलिए हम एवरेज रह जाते हैं।
इंडियन सोसाइटी में तो वैसे भी हमें बचपन से सिखाया जाता है कि बड़ों के सामने जुबान मत लड़ाओ या कड़वी बात मत बोलो। लेकिन वर्क कल्चर में यही चीज जहर बन जाती है। रेडिकल ट्रांसपेरेंसी का फायदा ये है कि कोई भी पीठ पीछे छुरा नहीं घोंपता। सब कुछ सामने होता है। जब आप सच बोलते हैं तो आपको याद रखने की जरूरत नहीं पड़ती कि आपने किससे क्या झूठ बोला था। इससे आपका मेंटल प्रेशर कम होता है और आप अपनी एनर्जी काम को बेहतर बनाने में लगा सकते हैं।
तो अगली बार जब आपसे कोई गलती हो तो उसे अपनी छाती से लगा कर मत बैठिए। उसे दुनिया के सामने रखिए उसका पोस्टमॉर्टम कीजिए और उससे सीखकर आगे बढ़िए। सच बोलना एक सुपरपावर है जो सिर्फ उन लोगों के पास होती है जो वाकई में ग्रो करना चाहते हैं। अगर आप अभी भी सोच रहे हैं कि लोग क्या कहेंगे तो यकीन मानिए लोग वैसे भी आपके बारे में कुछ न कुछ कह ही रहे हैं। तो क्यों न सच बोलकर कम से कम अपना तो भला कर लिया जाए।
लेसन २ : ५ स्टेप प्रोसेस - लाइफ की खिचड़ी को बिरयानी बनाने का फॉर्मूला
अगर आपकी लाइफ में गोल्स का मतलब सिर्फ नए साल पर जिम की मेंबरशिप लेना और दो दिन बाद सोफे पर लेटकर चिप्स खाना है तो आपको रे डेलियो के इस सिस्टम की बहुत ज्यादा जरूरत है। रे डेलियो कहते हैं कि सक्सेस कोई जादू की छड़ी नहीं है बल्कि एक ५ स्टेप का लूप है जिसे आपको बार-बार दोहराना पड़ता है। लोग अक्सर अपनी लाइफ में कंफ्यूज रहते हैं क्योंकि वो सीधे पांचवें स्टेप पर कूदना चाहते हैं बिना पहले चार को समझे। ये वैसा ही है जैसे आप बिना ड्राइविंग सीखे सीधा फॉर्मूला वन की रेस जीतना चाहते हों। सार्काज्म की बात तो ये है कि हम सब को रिजल्ट्स तो अंबानी वाले चाहिए पर मेहनत हम संडे की छुट्टी की तरह करना चाहते हैं।
इस प्रोसेस का पहला स्टेप है - अपने गोल्स सेट करना। सुनने में ये बहुत बेसिक लगता है पर लोग यहीं सबसे बड़ी गलती करते हैं। वो एक साथ १० चीजें करना चाहते हैं। आपको लाइफ में सब कुछ नहीं मिल सकता पर आपको वो सब मिल सकता है जो आप वाकई में चाहते हैं। अगर आप एक ही समय पर बॉडी बिल्डर बनना चाहते हैं और हर रात पार्टी भी करना चाहते हैं तो भाई साहब आप सिर्फ थके हुए इंसान बनेंगे और कुछ नहीं। अपने गोल्स को क्लियर रखें और बाकी की फालतू चीजों को टाटा बाय-बाय बोल दें।
दूसरा स्टेप सबसे दर्दनाक है और वो है - अपनी प्रॉब्लम्स का सामना करना। जब हम अपने गोल की तरफ बढ़ते हैं तो रास्ते में बड़ी-बड़ी मुश्किलें आती हैं। ज्यादातर लोग इन प्रॉब्लम्स को देखकर अपना रास्ता बदल लेते हैं या फिर आँखें बंद कर लेते हैं जैसे कि बिल्ली को देखकर कबूतर करता है। रे डेलियो कहते हैं कि इन प्रॉब्लम्स को छुपाओ मत बल्कि इन्हें डायग्नोज करो। ये पता लगाओ कि असल में दिक्कत क्या है। क्या आपका नॉलेज कम है या फिर आपका आलस आपको रोक रहा है। जब तक आप बीमारी का सही पता नहीं लगाएँगे तब तक डॉक्टर चाहे कितना भी बड़ा हो इलाज नहीं कर पाएगा।
तीसरा और चौथा स्टेप है - रूट कॉज ढूँढना और एक प्लान बनाना। मान लीजिए आप बार-बार फेल हो रहे हैं। अब ये सोचना कि मेरी किस्मत खराब है ये तो सबसे आसान काम है। पर असली मर्दानगी इसमें है कि आप ये देखें कि आपकी स्ट्रेटजी में क्या छेद है। जब आपको अपनी कमजोरी पता चल जाए तो उसके लिए एक सॉलिड प्लान बनाइए। ये प्लान कागजों पर नहीं बल्कि आपके दिमाग और डेली रूटीन में होना चाहिए। अगर आपका प्लान ये है कि कल से जल्दी उठूँगा तो ये प्लान नहीं बल्कि एक ख्वाब है। प्लान ये होना चाहिए कि रात को फोन बाहर रखूँगा और सुबह ५ बजे का अलार्म बजेगा।
आखिरी और पांचवां स्टेप है - उसे पूरा करना यानी कि एक्जीक्यूशन। दुनिया के सबसे बेहतरीन प्लान भी कचरा हैं अगर आप उन पर काम नहीं करते। रे डेलियो के हिसाब से लाइफ एक मशीन की तरह है और आप उस मशीन के डिजाइनर और ऑपरेटर दोनों हैं। अगर मशीन खराब चल रही है तो उसे डिजाइन करने वाला भी आप ही हैं और उसे चलाने वाला भी आप ही। तो अपनी नाकामियों के लिए अपने पड़ोसी या सरकार को दोष देना बंद कीजिए। इस ५ स्टेप लूप को अपनी लाइफ का हिस्सा बनाइए और देखिए कैसे आपकी लाइफ की बिखरी हुई खिचड़ी एक टेस्टी बिरयानी में बदल जाती है। ये प्रोसेस बोरिंग हो सकता है पर जो इस बोरियत को झेल लेता है वही असली बाजीगर कहलाता है।
लेसन ३ : बीइंग ओपन माइंडेड - अपनी ईगो की दुकान बंद करो और दूसरों की सुनो
अगर आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे स्मार्ट इंसान हैं और बाकी सब बस यहाँ भीड़ बढ़ाने आए हैं, तो यकीन मानिए आप रे डेलियो की नजर में सबसे बड़े बेवकूफ हैं। हम इंसानों की सबसे बड़ी बीमारी ये है कि हमें लगता है कि हम जो सोच रहे हैं, वही परम सत्य है। इसे रे डेलियो 'इगो बैरियर' और 'ब्लाइंड स्पॉट' कहते हैं। ये वैसा ही है जैसे कोई इंसान अपनी आँखों पर काली पट्टी बांधकर कहे कि दुनिया में अंधेरा हो गया है। सार्काज्म तो देखिए, हम अक्सर उन लोगों की राय मांगते हैं जो हमारे सुर में सुर मिला सकें, क्योंकि हमें सच नहीं, बस अपनी तारीफ सुनने की भूख होती है।
ओपन माइंडेड होने का मतलब ये नहीं है कि आप सबकी बातें मान लें, बल्कि इसका मतलब ये है कि आप इस पॉसिबिलिटी को एक्सेप्ट करें कि आप गलत हो सकते हैं। रे डेलियो कहते हैं कि दो लोग जब किसी बात पर असहमत होते हैं, तो वहां लड़ने के बजाय एक दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करनी चाहिए। सोचिए, अगर आप किसी अंधेरे कमरे में फंसे हैं और आपके पास सिर्फ एक टॉर्च है, तो आप सिर्फ वही देख पाएंगे जहाँ उसकी रोशनी जाएगी। लेकिन अगर वहां चार और लोग अपनी टॉर्च के साथ आ जाएं, तो पूरा कमरा जगमगा उठेगा। पर नहीं, हमें तो अपनी ही टूटी हुई टॉर्च की रोशनी पर घमंड होता है।
अपनी ईगो को साइड में रखना कोई आसान काम नहीं है। जब कोई हमारी गलती निकालता है, तो हमारा दिमाग 'फाइट और फ्लाइट' मोड में चला जाता है। हमें लगता है कि सामने वाला हम पर हमला कर रहा है। लेकिन असल में वो आपकी उस कमजोरी को दिखा रहा है जिसे आप खुद नहीं देख पा रहे थे। इसे 'रेडिकल ओपन माइंडेडनेस' कहते हैं। अगर आप लाइफ में सच में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो आपको फीडबैक से प्यार करना होगा। आपको उन लोगों की तलाश करनी होगी जो आपसे ज्यादा स्मार्ट हों और जो आपके आइडियाज की धज्जियां उड़ा सकें। क्योंकि जब आपके कमजोर आइडियाज मरेंगे, तभी एक मजबूत और जीतने वाला आइडिया पैदा होगा।
इंडियन कॉन्टेक्स्ट में देखा जाए तो हम अक्सर डिस्कशन को पर्सनली ले लेते हैं। अगर ऑफिस में किसी ने आपके काम में कमी निकाली, तो हमें लगता है कि उसने हमारी खानदानी इज्जत पर हमला कर दिया। ये माइंडसेट प्रोग्रेस का सबसे बड़ा दुश्मन है। रे डेलियो समझाते हैं कि आपको खुद को एक मशीन की तरह देखना चाहिए और दूसरों को उसका मैकेनिक बनने का मौका देना चाहिए। अगर मशीन का कोई पुर्जा ढीला है, तो उसे कसने दीजिए, बुरा मत मानिए।
जब आप ओपन माइंडेड बनते हैं, तो आप दुनिया को वैसे देखते हैं जैसी वो सच में है, न कि वैसे जैसा आप उसे देखना चाहते हैं। ये एबिलिटी आपको ऐसे डिसीजन लेने में मदद करती है जो फैक्ट्स पर आधारित होते हैं, न कि आपकी इमोशनल ईगो पर। तो अगली बार जब कोई आपसे असहमत हो, तो चिल्लाने के बजाय मुस्कुराइए और पूछिए - 'भाई, तुझे ऐसा क्यों लगता है?' शायद उसकी बात में वो करोड़ों का आइडिया छुपा हो जिसे आपकी ईगो देख ही नहीं पा रही थी। ईगो की दुकान बढ़ा दीजिए और लर्निंग का शोरूम खोलिए, तभी आप असली लीडर बनेंगे।
लाइफ में प्रिंसिपल्स का होना आपको भीड़ से अलग बनाता है। अगर आप आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं, तो रुकिए और सोचिए कि आपके प्रिंसिपल्स क्या हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जिसे लगता है कि वो हमेशा सही होता है, और कमेंट में बताएं कि इन ३ लेसन्स में से कौन सा आपकी लाइफ बदल सकता है।
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