When (Hindi)


आप अपनी लाइफ में फेल नहीं हो रहे बल्कि आप गलत टाइम पर सही काम कर रहे हैं। दोपहर में जो आप गधों की तरह मेहनत करते हैं वही आपकी बर्बादी का सबसे बड़ा कारण है। अगर आपको लगता है कि सिर्फ हार्ड वर्क से सक्सेस मिलती है तो मुबारक हो आप अपनी एनर्जी और करियर दोनों कचरे में डाल रहे हैं।

आज हम डैनियल पिंक की बुक से टाइमिंग के उन साइंटिफिक राज को खोलेंगे जो दुनिया के टॉप 1 परसेंट लोग छुपाकर रखते हैं। तैयार हो जाइए क्योंकि ये 3 लेसन आपकी प्रोडक्टिविटी को पूरी तरह से बदल देंगे।


लेसन १ : द हिडन पैटर्न ऑफ द डे (दिन का गुप्त पैटर्न)

अगर आप सुबह उठकर सबसे पहले सोशल मीडिया पर मीम्स देखते हैं और दोपहर में जब दिमाग दही हो चुका होता है तब ऑफिस का सबसे मुश्किल काम उठाते हैं तो आपसे बड़ा साइंटिस्ट कोई नहीं है। डैनियल पिंक कहते हैं कि हर इंसान के दिन का एक पैटर्न होता है। इसे हम पीक, ट्रफ और रिकवरी कहते हैं। पीक वो समय है जब आपका दिमाग सुपर कंप्यूटर की तरह काम करता है। ट्रफ वो समय है जब आपका दिमाग कचरा बन जाता है और रिकवरी वो समय है जब आप थोड़े होश में वापस आते हैं।

ज्यादातर लोगों के लिए सुबह का समय पीक होता है। इस वक्त आपका लॉजिक और फोकस आसमान पर होता है। लेकिन आप क्या करते हैं? आप उस वक्त ईमेल चेक करते हैं या ये देखते हैं कि शर्मा जी के लड़के ने इंस्टाग्राम पर क्या डाला है। ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप अपनी फरारी गाड़ी से सब्जी लेने जा रहे हों। जब आपका दिमाग सबसे तेज है तब आप उसे फालतू कामों में थका देते हैं।

फिर आती है दोपहर। इसे हम ट्रफ कहते हैं। दोपहर के 2 से 4 बजे के बीच इंसान की अकल घास चरने चली जाती है। रिसर्च बताती है कि इस वक्त डॉक्टर्स से सबसे ज्यादा गलतियां होती हैं और जज सबसे ज्यादा सख्त फैसले सुनते हैं। आप इस वक्त मीटिंग्स रखते हैं या कोई बहुत बड़ा फैसला लेने की कोशिश करते हैं। फिर जब काम बिगड़ जाता है तो आप अपनी किस्मत को गाली देते हैं। सच तो ये है कि आपकी किस्मत खराब नहीं है बस आपका टाइमिंग का सेंस एकदम जीरो है।

रिकवरी का समय शाम को आता है। इस वक्त आप थोड़े क्रिएटिव हो जाते हैं। अगर आपको कोई नया आईडिया सोचना है तो ये बेस्ट टाइम है। लेकिन आप इस वक्त ऑफिस से थक कर घर आते हैं और टीवी के सामने सो जाते हैं। आप अपनी लाइफ की पूरी रिदम के खिलाफ चल रहे हैं। अगर आप अपनी सक्सेस को लेकर सीरियस हैं तो अपने मुश्किल काम सुबह के लिए बचा कर रखें। दोपहर में वो काम करें जिसमें दिमाग कम और हाथ ज्यादा चलता हो जैसे कि फाइलिंग करना या डेस्क साफ करना।

असली सक्सेस हार्ड वर्क से नहीं बल्कि ये समझने से आती है कि कब क्या करना है। अगर आप दिन के इस पैटर्न को समझ लें तो आप कम मेहनत में दूसरों से चार गुना आगे निकल सकते हैं। लेकिन अगर आप अपनी मनमर्जी से चलते रहेंगे तो यकीन मानिए आप सिर्फ अपनी लाइफ के कीमती साल बर्बाद कर रहे हैं।


लेसन २ : द पावर ऑफ ब्रेक्स (ब्रेक की ताकत)

अगर आपको लगता है कि बिना रुके 8 घंटे कुर्सी से चिपके रहना महानता की निशानी है तो सच तो यह है कि आप अपनी प्रोडक्टिविटी का गला घोंट रहे हैं। लोग अक्सर लंच ब्रेक को भी ऐसे देखते हैं जैसे कोई गुनाह कर रहे हों। डेस्क पर ही खाना खाना और साथ में काम करते रहना कोई डेडिकेशन नहीं बल्कि बेवकूफी है। डैनियल पिंक बताते हैं कि ब्रेक्स लेना कोई टाइम वेस्ट नहीं बल्कि एक परफॉरमेंस इनहांसर है।

हमारा दिमाग कोई लोहे की मशीन नहीं है जो एक ही रफ्तार पर चलती रहे। यह एक बैटरी की तरह है जो धीरे-धीरे डिस्चार्ज होती है। अगर आप इसे चार्ज नहीं करेंगे तो यह हैंग होने लगेगा। साइंटिफिक रिसर्च कहती है कि सबसे अच्छे ब्रेक वो होते हैं जो सोशल होते हैं और जिनमें आप हिलते-डुलते हैं। मतलब वो 5 मिनट का ब्रेक जिसमें आप अपने दोस्त से बकवास करते हैं या ऑफिस के कॉरिडोर में टहलते हैं वह आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है।

अब जरा अपनी लाइफ देखिए। आप ब्रेक के नाम पर क्या करते हैं? आप काम छोड़कर फोन उठाते हैं और दोबारा से अपनी आँखों और दिमाग को स्क्रीन पर थका देते हैं। इसे ब्रेक नहीं बल्कि दिमाग पर एक और बोझ कहते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप थके हुए पैर के साथ भागने की कोशिश कर रहे हों और कहें कि मैं जूते बदलकर आराम कर रहा हूँ। असली ब्रेक वो है जहाँ आप पूरी तरह से काम से कट जाएं।

यहाँ डैनियल पिंक नैपोचिनो का आईडिया देते हैं। यह क्या है? एक कप कॉफी पिएं और तुरंत 20 मिनट के लिए सो जाएं। कॉफी का असर होने में 20 मिनट लगते हैं और जब आप सोकर उठेंगे तो कैफीन आपके खून में दौड़ रहा होगा। आप एकदम तरोताजा महसूस करेंगे। लेकिन आप क्या करते हैं? आप दोपहर की नींद को आलस समझते हैं और शाम तक अपनी झपकी रोकते-रोकते आधे मरे हुए इंसान की तरह काम करते हैं।

याद रखिए एक छोटा सा ब्रेक आपकी बड़ी से बड़ी गलती को रोक सकता है। जो लोग ब्रेक्स नहीं लेते उनके काम में क्वालिटी धीरे-धीरे गिरने लगती है। आप भले ही ज्यादा घंटे काम कर रहे हों लेकिन आपका आउटपुट कचरा होता जा रहा है। अगर आप चाहते हैं कि आपका दिमाग हमेशा शार्प रहे तो हर एक घंटे बाद खुद को 5 मिनट का ब्रेक दें। यह ब्रेक आपको आलसी नहीं बल्कि एक स्मार्ट वर्कर बनाएगा।

जब आप दोबारा काम पर लौटेंगे तो आपका फोकस पहले से ज्यादा होगा। जो काम आप एक घंटे में रो-रोकर कर रहे थे उसे अब आप 20 मिनट में खत्म कर देंगे। टाइमिंग का असली खेल यही है। जो लोग वक्त के साथ खुद को रिचार्ज करना जानते हैं वही लंबी रेस के घोड़े बनते हैं। बाकी सब तो बस रेस में भीड़ बढ़ाने का काम कर रहे हैं।


लेसन ३ : द इम्पोर्टेंस ऑफ एंडिंग्स (अंत का महत्व)

अगर आपको लगता है कि किसी काम की शुरुआत ही सब कुछ होती है, तो आप बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं। हमारी याददाश्त और मोटिवेशन का रिमोट कंट्रोल हमेशा उस बात पर होता है कि कोई चीज खत्म कैसे हुई। डैनियल पिंक कहते हैं कि 'एंडिंग्स' यानी अंत हमारे दिमाग पर एक बहुत गहरा असर छोड़ते हैं। आप पूरे साल ऑफिस में जी-तोड़ मेहनत करें, लेकिन अगर आखिरी महीने में आपने कोई गड़बड़ कर दी, तो आपके बॉस को सिर्फ वही गड़बड़ याद रहेगी। यह सुनने में कड़वा है, लेकिन यही हकीकत है।

अंत हमें मोटिवेट भी करते हैं और इमोशनल भी बनाते हैं। आपने देखा होगा कि जब कोई डेडलाइन करीब आती है, तो हमारी स्पीड अचानक बढ़ जाती है। जो काम हम महीनों से टाल रहे थे, उसे हम आखिरी दो दिनों में खत्म कर देते हैं। इसे 'एंड इफेक्ट' कहते हैं। लेकिन इसका एक काला सच भी है। जब हमें दिखता है कि अंत करीब है, तो हम कभी-कभी हार भी मान लेते हैं। जैसे फुटबॉल के मैच में आखिरी मिनटों में या तो टीम पागलों की तरह गोल करती है या फिर एकदम ढीली पड़ जाती है। आप अपनी लाइफ के प्रोजेक्ट्स के साथ क्या करते हैं?

अक्सर लोग किसी भी काम को आधे-अधूरे मन से खत्म करते हैं। वह सोचते हैं कि चलो काम तो हो गया, अब बस फॉर्मेलिटी पूरी कर देते हैं। लेकिन डैनियल पिंक बताते हैं कि एक अच्छी एंडिंग आपको अगले काम के लिए एनर्जी देती है। अगर आप अपने दिन का अंत अपनी टू-डू लिस्ट को चेक करके और अगले दिन की प्लानिंग करके करते हैं, तो आपका दिमाग शांत रहता है। लेकिन आप क्या करते हैं? आप काम के बोझ के बीच में ही लैपटॉप बंद करते हैं और घर भाग जाते हैं। फिर पूरी रात आपके दिमाग में ऑफिस की टेंशन चलती रहती है।

रिश्तों में भी यही नियम लागू होता है। लोग सालों की दोस्ती को एक गंदी लड़ाई के साथ खत्म कर देते हैं। फिर उन्हें वो साल याद नहीं रहते जो उन्होंने साथ बिताए थे, बल्कि सिर्फ वो आखिरी झगड़ा याद रहता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई बेहतरीन फिल्म देखने के बाद उसका क्लाइमैक्स बकवास निकल जाए। आप पूरी फिल्म को ही फ्लॉप घोषित कर देते हैं। टाइमिंग का मतलब सिर्फ शुरुआत करना नहीं, बल्कि सलीके से खत्म करना भी है।

अगर आप चाहते हैं कि लोग आपको याद रखें और आपकी वैल्यू करें, तो अपने काम के अंत पर उतना ही ध्यान दें जितना आपने उसकी शुरुआत पर दिया था। एक पॉजिटिव और पावरफुल एंडिंग आपके पूरे प्रोसेस की थकान को मिटा देती है। जब आप जानते हैं कि खत्म कैसे करना है, तो आप बीच के रास्तों से नहीं डरते। तो अगली बार जब कोई प्रोजेक्ट या दिन खत्म हो, तो उसे बस छोड़ें नहीं, बल्कि उसे एक अच्छे नोट पर खत्म करें।

याद रखिए, दुनिया आपके संघर्ष को नहीं देखती, वो सिर्फ आपके रिजल्ट और आपके द्वारा छोड़े गए आखिरी प्रभाव को देखती है। अगर अंत सही है, तो सब सही है। वरना आपकी सारी मेहनत सिर्फ एक अधूरा सपना बनकर रह जाएगी।


वक्त हाथ से रेत की तरह फिसल रहा है। क्या आप अभी भी गलत समय पर सही काम करने की गलती करेंगे? नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपका सबसे ज्यादा प्रोडक्टिव समय कौन सा है और आज से आप अपने 'ट्रफ' यानी लो-एनर्जी वाले समय में क्या बदलाव करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा 'टाइम नहीं है' का रोना रोता रहता है।

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