Profit First (Hindi)


क्या आप भी अपने बिज़नेस को एक भूखा राक्षस बनाकर बैठे हैं जो आपकी सारी मेहनत और पैसा डकार जाता है। बधाई हो आप खुद को अमीर बनाने के बजाय सिर्फ अपने बिल भर रहे हैं। बिना प्रॉफिट के बिज़नेस चलाना तो केवल एक महंगा शौक पालने जैसा ही है।

इस आर्टिकल में हम Profit First बुक के उन सीक्रेट्स को समझेंगे जो आपके डूबते हुए बिज़नेस को एक असली मनी मेकिंग मशीन बना सकते हैं। चलिए जानते हैं वे 3 जादुई लेसन जो आपकी तिजोरी भर देंगे।


लेसन १ : सेल्स माइनस प्रॉफिट इज इक्वल टू एक्सपेंस

ज़्यादातर इंडियन बिज़नेस ओनर्स की लाइफ एक ही ढर्रे पर चलती है। सुबह उठकर सेल्स के पीछे भागना और महीने के आखिर में माथा पकड़कर बैठ जाना। क्यों? क्योंकि बैंक बैलेंस तो जीरो है। हम सब ने बचपन से एक ही फार्मूला सीखा है कि सेल्स में से खर्चे निकालो और जो बचा वह आपका प्रॉफिट है। पर भाई साहब यह फार्मूला ही सबसे बड़ा धोखा है। जब आप पहले खर्चे पूरे करते हैं तो यकीन मानिए खर्चों की भूख कभी खत्म नहीं होती। खर्चे तो उस बिन बुलाए मेहमान की तरह हैं जो एक बार घर में घुस जाए तो सारा राशन पानी खत्म करके ही दम लेता है।

माइकल मिकलोविज़ कहते हैं कि अपनी मानसिकता बदलो। अब से नया फार्मूला होगा: सेल्स माइनस प्रॉफिट इज इक्वल टू एक्सपेंस। इसका मतलब है कि जैसे ही आपके गल्ले में पैसा आए तो सबसे पहले अपना हिस्सा यानी अपना प्रॉफिट निकालकर एक अलग तिजोरी या अकाउंट में डाल दें। जो बच जाए उसमें अपना बिज़नेस चलाएं। यह सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है पर यही असली सच है। मान लीजिए आपने एक बड़ी पार्टी दी और खाना बहुत सारा था। तो लोग दबाकर खाएंगे और खाना बर्बाद भी करेंगे। लेकिन अगर खाना कम है तो हर कोई संभलकर खाएगा। बिज़नेस का पैसा भी बिलकुल वैसा ही है।

जब हमारे पास बैंक अकाउंट में बहुत सारा पैसा दिखता है तो हमें लगता है कि हम राजा हैं। फिर हम फालतू की मार्केटिंग और बढ़िया ऑफिस के फर्नीचर पर पैसा उड़ाने लगते हैं। हमें लगता है कि यह तो बिज़नेस में इन्वेस्टमेंट है पर असल में वह पैसा पानी में जा रहा होता है। इंडियन दुकानदारों की भाषा में कहें तो पहले अपनी कमाई अलग करो और फिर धंधे का खर्चा देखो। अगर आप पहले खुद को पे नहीं करेंगे तो आप अपने ही बिज़नेस के नौकर बनकर रह जाएंगे।

सोचिए अगर आप एक रेस्टोरेंट चला रहे हैं और महीने के अंत में पता चलता है कि आपने लाखों की बिरयानी बेची पर जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं बची। तो क्या फायदा ऐसी मेहनत का? इससे अच्छा तो कहीं नौकरी कर लेते। प्रॉफिट को पहले निकालने का मतलब है कि आप अपने बिज़नेस को एक डाइट पर रख रहे हैं। जब पैसा कम होगा तो आपका दिमाग अपने आप नए और सस्ते तरीके ढूढेगा। आप उन वेंडर्स से मोलभाव करेंगे जिनसे आप पहले कतराते थे। आप अपनी बिजली का बिल बचाने की सोचेंगे और उन सब्सक्रिप्शन को बंद करेंगे जिनका आप कभी इस्तेमाल नहीं करते।

यह लेसन आपको डिसिप्लिन सिखाता है। यह आपको बताता है कि बिज़नेस आपकी सेवा करने के लिए है न कि आप बिज़नेस की गुलामी करने के लिए। जब आप हर महीने अपनी आंखों के सामने प्रॉफिट का ढेर लगते हुए देखेंगे तो आपका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होगा। फिर आप डर में नहीं बल्कि खुशी में काम करेंगे। और यकीन मानिए जब मालिक खुश होता है तो धंधा अपने आप दोगुना रफ्तार से दौड़ता है। पर क्या सिर्फ प्रॉफिट अलग करना काफी है? बिलकुल नहीं। असल खेल तो तब शुरू होता है जब आप इस पैसे को मैनेज करना सीखते हैं जिसे हम अगले लेसन में समझेंगे।


लेसन २ : छोटे बर्तनों का जादू और पांच अकाउंट्स का सिस्टम

इंसानी दिमाग बहुत ही टेढ़ा है। अगर इसे एक बड़ा पतीला भरकर हलवा दे दिया जाए तो यह तब तक नहीं रुकेगा जब तक पतीला साफ न हो जाए। हमारे बैंक अकाउंट का भी यही हाल है। जब हम एक ही अकाउंट में सारा पैसा रखते हैं तो हमें लगता है कि हम बहुत रईस हैं। फिर हम बिना सोचे समझे खर्चा करते हैं। माइकल कहते हैं कि इस आदत को बदलने के लिए हमें स्माल प्लेट्स इफेक्ट यानी छोटे बर्तनों के सिद्धांत का इस्तेमाल करना चाहिए। जैसे वजन घटाने के लिए लोग छोटी प्लेट में खाना शुरू करते हैं वैसे ही बिज़नेस को हेल्दी बनाने के लिए आपको अपने पैसों को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटना होगा।

इसके लिए आपको अपने बैंक में पांच अलग अलग अकाउंट खोलने होंगे। अब आप कहेंगे कि भाई साहब एक अकाउंट तो संभलता नहीं आप पांच की बात कर रहे हैं। पर यकीन मानिए यही वह तरीका है जो दुनिया के बड़े बड़े अमीर लोग अपनाते हैं। पहला अकाउंट होगा इनकम अकाउंट जिसमें सारा पैसा आएगा। दूसरा होगा प्रॉफिट अकाउंट जिसमें से आपको कभी पैसा नहीं निकालना है। तीसरा होगा ओनर्स पे यानी आपकी खुद की सैलरी। चौथा होगा टैक्स अकाउंट क्योंकि सरकार अपना हिस्सा तो लेकर ही रहेगी। और पांचवा होगा ऑपरेटिंग एक्सपेंस यानी बिज़नेस चलाने का खर्चा।

जरा सोचिए आप एक मिडिल क्लास फैमिली के लड़के हैं जिसकी नई नई नौकरी लगी है। अगर सारा पैसा एक ही जेब में होगा तो महीने के दस तारीख तक आप दोस्तों को पार्टी देंगे और पंद्रह तारीख के बाद पार्ले जी के बिस्कुट खाकर गुजारा करेंगे। लेकिन अगर आप पैसे आते ही रेंट का पैसा बिजली का बिल और अपनी सेविंग अलग कर लें तो आप कभी मुसीबत में नहीं फसेंगे। बिज़नेस में भी यही अनुशासन चाहिए। जब आप ऑपरेटिंग एक्सपेंस वाले अकाउंट में कम पैसा देखेंगे तो आपका दिमाग अपने आप फालतू के खर्चों पर ब्रेक लगा देगा।

ज्यादातर लोग अपने टैक्स के पैसे से भी धंधा करने की कोशिश करते हैं। फिर जब साल के आखिर में इनकम टैक्स वाला दरवाजा खटखटाता है तो उनकी हालत खराब हो जाती है। वे इधर उधर से लोन लेते हैं और कर्ज के जाल में फस जाते हैं। प्रॉफिट फर्स्ट सिस्टम आपको इस गड्ढे में गिरने से बचाता है। जब आपके पास हर चीज के लिए अलग डिब्बा होगा तो आपको पता रहेगा कि आपकी औकात क्या है। आपको पता होगा कि क्या आप वाकई वह नया आईफोन या महंगी गाड़ी अफोर्ड कर सकते हैं या आप सिर्फ अपनी कंपनी का गला घोंट रहे हैं।

यह सिस्टम आपको एक क्लैरिटी देता है। आपको बैलेंस शीट देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप बस अपना बैंक बैलेंस चेक करेंगे और आपको पता चल जाएगा कि बिज़नेस कैसा चल रहा है। अगर ऑपरेटिंग अकाउंट में पैसा कम है तो इसका मतलब है कि आपके खर्चे आपकी औकात से बाहर जा रहे हैं। फिर आप यह नहीं कह सकते कि धंधा मंदा है बल्कि आपको यह मानना पड़ेगा कि आप मैनेजमेंट में फेल हो रहे हैं। यह कड़वा सच ही आपको एक असली बिजनेसमैन बनाएगा। और जब आप अपने खर्चों को काबू में करना सीख जाएंगे तो आप अगले और सबसे महत्वपूर्ण स्टेप के लिए तैयार होंगे।


लेसन ३ : खर्चों की छंटनी और कैश ईटिंग मॉन्स्टर का अंत

बिज़नेस चलाना किसी छोटे बच्चे को पालने जैसा है। शुरू में यह बहुत प्यारा लगता है पर अगर आप इसे सही संस्कार न दें तो यह बड़ा होकर आपकी नाक में दम कर देता है। हमारा बिज़नेस भी अक्सर एक ऐसा राक्षस बन जाता है जिसे जितना भी पैसा खिलाओ उसका पेट कभी नहीं भरता। हम सोचते हैं कि सेल्स बढ़ेगी तो सब ठीक हो जाएगा पर असलियत यह है कि जैसे जैसे सेल्स बढ़ती है खर्चे भी उतनी ही तेजी से छलांग मारते हैं। माइकल कहते हैं कि अपने बिज़नेस को इस राक्षस के चंगुल से छुड़ाने का एक ही रास्ता है और वह है बेरहमी से खर्चों की छंटनी करना।

इमेजिन कीजिए कि आप एक ऐसी नाव में बैठे हैं जिसमें छेद है। अब आप चाहे कितनी भी तेजी से चप्पू चला लें अगर आपने वह छेद बंद नहीं किया तो नाव डूबेगी ही डूबेगी। आपके फालतू खर्चे भी वही छेद हैं। हम अक्सर उन सॉफ्टवेयर के पैसे भर रहे होते हैं जिन्हें हमने सालों से ओपन भी नहीं किया। हम उन वेंडर्स को एक्स्ट्रा पैसे दे रहे होते हैं जो हमें घटिया सर्विस देते हैं। और सबसे बड़ी गलती हम यह करते हैं कि हम 'स्टेटस' दिखाने के चक्कर में महंगा ऑफिस रेंट पर ले लेते हैं जबकि काम घर से भी चल सकता था।

आपको अपने हर एक खर्चे का ऑडिट करना होगा। एक लिस्ट बनाइये और खुद से पूछिए कि क्या यह खर्चा मेरे प्रॉफिट में एक रुपया भी जोड़ रहा है। अगर जवाब ना है तो उस खर्चे को उसी वक्त टाटा बाय बाय बोल दीजिए। यह थोड़ा दर्दनाक हो सकता है क्योंकि हमें अपनी सुख सुविधाओं की आदत पड़ जाती है। पर याद रखिए भूखा शेर ज्यादा तेज दौड़ता है। जब आपके पास रिसोर्सेज कम होंगे तो आप ज्यादा क्रिएटिव बनेंगे। आप जुगाड़ करेंगे जो कि हर इंडियन के खून में होता है।

जब आप अपने खर्चों को कम करते हैं और प्रॉफिट को पहले रखते हैं तो आपका बिज़नेस एक फिट एथलीट की तरह बन जाता है। वह हल्का होता है और बहुत तेज भागता है। फिर चाहे मार्केट में मंदी आए या कोई और मुसीबत आपका बिज़नेस कभी नहीं डगमगाएगा क्योंकि उसकी जड़ें प्रॉफिट पर टिकी हैं न कि उधार के पैसों पर। यह सिस्टम आपको एक ऐसी आज़ादी देता है जिसका सपना हर एंटरप्रेन्योर देखता है।


तो दोस्तों, क्या आप तैयार हैं अपने बिज़नेस को एक नया जीवन देने के लिए। आज ही अपने पुराने और घिसे पिटे तरीकों को कूड़ेदान में डालिए। प्रॉफिट को कोई बची खुची चीज समझना बंद करें और इसे अपनी पहली प्राथमिकता बनाएं। याद रखिए अगर आप अपने पैसे की इज्जत नहीं करेंगे तो पैसा भी आपकी इज्जत नहीं करेगा। नीचे कमेंट्स में लिखकर बताएं कि आप आज कौन सा एक फालतू खर्चा बंद करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो दिन रात मेहनत तो करते हैं पर महीने के आखिर में खाली हाथ रह जाते हैं। चलिए साथ मिलकर इंडिया के हर छोटे बिज़नेस को एक प्रॉफिटेबल साम्राज्य बनाते हैं।

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