आप हर महीने नई स्ट्रैटेजी बदल रहे हैं और फिर भी आपका बिजनेस वही खड़ा है जहाँ पिछले साल था। मुबारक हो। आप अपनी मेहनत और पैसा दोनों कचरे में डाल रहे हैं। जब तक आप एक रिपीटेबल मॉडल नहीं बनाएंगे तब तक आप सिर्फ चूहा दौड़ का हिस्सा बने रहेंगे।
आज हम क्रिस जूक की किताब रिपीटबिलिटी से वो सीक्रेट्स समझेंगे जो आपके बिजनेस को एक अंतहीन लूप में ले जाकर उसे हमेशा के लिए कामयाब बना सकते हैं। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं जो आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : ए ग्रेट रिपीटेबल मॉडल
सक्सेस का मतलब हर बार पहिया दोबारा बनाना नहीं है। असल में दुनिया के सबसे बड़े बिजनेस इसलिए कामयाब नहीं हैं कि वो हर रोज कुछ नया और तूफानी करते हैं। वो इसलिए बड़े हैं क्योंकि उन्होंने एक ऐसा फार्मूला ढूंढ लिया है जिसे वो बार बार दोहरा सकते हैं। इसे ही लेखक क्रिस जूक ए ग्रेट रिपीटेबल मॉडल कहते हैं। हम इंडियंस की सबसे बड़ी प्रॉब्लम पता है क्या है। हम बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं। जैसे ही कोई काम थोड़ा सा चलने लगता है हमारा मन कहता है कि चलो अब कुछ और ट्राई करते हैं। ये वही बात हो गई कि आपने एक कुआं खोदना शुरू किया और जैसे ही पानी आने वाला था आपने सोचा कि बगल वाली जमीन ज्यादा हरी दिख रही है चलो वहां खुदाई करते हैं। रिजल्ट क्या निकलता है। आपके पास दस अधूरे गड्ढे होते हैं लेकिन पीने के लिए एक बूंद पानी नहीं होता।
एक रिपीटेबल मॉडल का मतलब है कि आपके पास एक ऐसा कोर सिस्टम होना चाहिए जो बिना आपकी मौजूदगी के भी वैसा ही रिजल्ट दे। जरा उस पड़ोस वाले समोसे वाले के बारे में सोचिए जिसकी दुकान पर शाम को पैर रखने की जगह नहीं होती। क्या वो हर रोज अपनी रेसिपी बदलता है। क्या वो मंडे को समोसे में आलू की जगह पनीर डालता है और ट्यूजडे को नूडल्स। बिल्कुल नहीं। उसकी ताकत उसकी रिपीटबिलिटी है। आपको पता है कि वहां जाओगे तो वही क्रिस्पी कोटिंग और वही तीखा मसाला मिलेगा। लोग उस भरोसे के लिए पैसे देते हैं न कि आपके हर रोज के नए एक्सपेरिमेंट्स के लिए।
बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। जब आप एक ही चीज को बार बार करते हैं तो आप उसमें एक्सपर्ट बन जाते हैं। आपकी कॉस्ट कम होने लगती है और आपकी स्पीड बढ़ने लगती है। लेकिन आजकल के कूल स्टार्टअप फाउंडर्स को लगता है कि हर हफ्ते पिवट करना ही असली बिजनेस है। भाई अगर आप हर हफ्ते अपनी दिशा बदल रहे हैं तो आप कहीं पहुंच नहीं रहे हैं बस गोल गोल घूम रहे हैं। एप्पल जैसी कंपनी को देखिए। उनका डिजाइन और उनका यूजर एक्सपीरियंस सालों से एक रिपीटेबल मॉडल पर चल रहा है। वो बस उसे रिफाइन करते हैं उसे खत्म करके कुछ नया नहीं शुरू करते।
अगर आप अपना बिजनेस बड़ा करना चाहते हैं तो पहले वो एक चीज ढूंढिए जो सच में काम कर रही है। क्या वो आपकी सेल्स पिच है। क्या वो आपका प्रोडक्ट डिजाइन है। या फिर आपका डिलीवरी सिस्टम है। जब वो मिल जाए तो उसे तब तक रिपीट करिए जब तक वो आपकी कंपनी का डीएनए न बन जाए। कॉम्प्लेक्सिटी बिजनेस की दुश्मन है। जितना आप चीजों को उलझाएंगे उतना ही आपका कंट्रोल कम होगा। सादगी में ही असली पावर है। जो मॉडल रिपीट नहीं हो सकता वो स्केल भी नहीं हो सकता। और जो स्केल नहीं हो सकता वो बिजनेस नहीं बस एक महंगा शौक है।
रिपीटबिलिटी का मतलब बोरिंग होना नहीं है। इसका मतलब है अपनी ताकत को पहचान कर उस पर बार बार दांव लगाना। जैसे एक महान बैट्समैन अपनी स्ट्रेंथ पर खेलता है वैसे ही एक महान बिजनेस अपनी कोर रिपीटबिलिटी पर टिका होता है। अगर आप आज भी ये सोच रहे हैं कि कुछ नया करने से ही ग्रोथ आएगी तो रुकिए और अपने उस एक मॉडल को देखिए जो आपको अब तक यहाँ लेकर आया है। उसे ही परफेक्ट बनाइए और उसे ही बार बार दोहराइए।
लेसन २ : द नॉन नेगोशिएबल प्रिंसिपल्स
किसी भी बिजनेस की कामयाबी सिर्फ उसके प्रोडक्ट पर नहीं बल्कि उसके उन उसूलों पर टिकी होती है जिन्हें कंपनी किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ती। लेखक इन्हें द नॉन नेगोशिएबल प्रिंसिपल्स कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो ये आपकी कंपनी की वो लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करना मतलब बिजनेस का सुसाइड करना है। आजकल के दौर में जब मार्केट हर मिनट बदल रहा है लोग अपनी वैल्यूज को भी सेल पर लगा देते हैं। उन्हें लगता है कि थोड़ा सा कॉम्प्रोमाइज कर लेने से अगर ज्यादा प्रॉफिट मिल रहा है तो क्या बुराई है। लेकिन सच तो ये है कि जब आप अपने कोर प्रिंसिपल्स से समझौता करते हैं तो आप अपने कस्टमर का भरोसा भी बेच रहे होते हैं।
जरा सोचिए आप एक ऐसे रेस्टोरेंट में जाते हैं जो अपनी शुद्धता के लिए मशहूर है। अब अगर मालिक ये सोचे कि तेल के दाम बढ़ गए हैं तो चलो थोड़ा सस्ता और मिलावटी तेल इस्तेमाल कर लेते हैं किसी को क्या पता चलेगा। शायद एक दो दिन किसी को पता न चले लेकिन धीरे धीरे उस खाने का स्वाद और उस जगह की आत्मा मर जाएगी। यही वो मोमेंट होता है जब एक बड़ा ब्रांड एक मामूली दुकान बनकर रह जाता है। आपके बिजनेस में भी कुछ ऐसी चीजें होनी चाहिए जिनके लिए आप 'ना' कहना सीखें। अगर आपकी पहचान बेस्ट कस्टमर सर्विस है तो चाहे कितनी भी मंदी आ जाए आपको अपनी सर्विस की क्वालिटी नीचे नहीं गिरने देनी चाहिए।
ज्यादातर कंपनियां इसलिए फेल होती हैं क्योंकि वो हर चमकती चीज के पीछे भागने लगती हैं। इसे शाइनी ऑब्जेक्ट सिंड्रोम कहते हैं। जैसे ही मार्केट में कोई नया ट्रेंड आता है मालिक अपने पुराने उसूलों को ताक पर रखकर नई दिशा में दौड़ पड़ता है। ये वैसा ही है जैसे कोई इंसान अपनी शादी की सालगिरह पर अपनी पत्नी को भूलकर पड़ोस वाली पार्टी में चले जाए क्योंकि वहां म्यूजिक ज्यादा लाउड है। रिपीटेबल मॉडल्स उन्हीं कंपनियों में काम करते हैं जहाँ एम्प्लॉईज को पता होता है कि कंपनी किन बातों पर कभी समझौता नहीं करेगी। जब आपके प्रिंसिपल्स क्लियर होते हैं तो फैसले लेना आसान हो जाता है।
आपको हर कस्टमर को खुश करने की जरूरत नहीं है। आपको सिर्फ उन लोगों को खुश रखना है जो आपकी वैल्यूज की कद्र करते हैं। अगर आप सबको खुश करने निकलेंगे तो आप किसी के भी फेवरेट नहीं बन पाएंगे। एक कामयाब बिजनेस की पहचान उसकी फ्लेक्सिबिलिटी में नहीं बल्कि उसकी जिद में होती है। अपनी क्वालिटी को लेकर जिद अपनी सर्विस को लेकर जिद और अपने काम करने के तरीके को लेकर जिद। ये प्रिंसिपल्स आपकी कंपनी की रीढ़ की हड्डी हैं। अगर हड्डी ही कमजोर होगी तो बिजनेस कितना भी बड़ा क्यों न दिख रहा हो वो एक छोटे से झटके में ढेर हो जाएगा।
इसलिए आज ही बैठिए और अपने वो ३ या ४ नॉन नेगोशिएबल प्रिंसिपल्स लिखिए। क्या वो ईमानदारी है। क्या वो स्पीड है। या फिर वो सादगी है। एक बार जब ये तय हो जाए तो फिर दुनिया इधर की उधर हो जाए आपको पीछे नहीं हटना है। याद रखिए मार्केट में शोर बहुत होगा लोग आपको नीचा दिखाने की कोशिश करेंगे और आपको लगेगा कि आप पीछे छूट रहे हैं। लेकिन लंबे रेस के घोड़े वही होते हैं जो अपनी चाल नहीं बदलते। जब आप अपने उसूलों पर टिके रहते हैं तो मार्केट खुद चलकर आपके पास आता है क्योंकि उसे पता है कि आप भरोसेमंद हैं।
लेसन ३ : क्लोज्ड लूप लर्निंग
बिजनेस में सबसे बड़ा झूठ ये है कि प्लान एक बार बनता है और हमेशा चलता रहता है। हकीकत तो ये है कि मार्केट एक जिंदा भूत की तरह है जो हर पल अपना रूप बदलता है। लेखक क्रिस जूक कहते हैं कि एक महान रिपीटेबल मॉडल तभी टिका रह सकता है जब उसके पास क्लोज्ड लूप लर्निंग का सिस्टम हो। इसका मतलब है कि आप जो कर रहे हैं उसका फीडबैक सीधा ग्राउंड जीरो से आना चाहिए और उसे तुरंत अपने सिस्टम में वापस डालना चाहिए। हमारे यहाँ प्रॉब्लम ये है कि बॉस को लगता है कि उसे सब पता है। वो अपनी एलीट ऑफिस की कुर्सी पर बैठकर फैसले लेता है जबकि हकीकत बाहर की धूप और धूल में कुछ और ही होती है।
सोचिए आपने एक बहुत शानदार कार बनाई लेकिन ग्राहकों ने शिकायत की कि इसके गियर बहुत हार्ड हैं। अब एक ईगो वाला बिजनेसमैन कहेगा कि लोगों को गाड़ी चलानी ही नहीं आती। लेकिन एक स्मार्ट बिजनेसमैन उस फीडबैक को लेगा और अगले ही हफ्ते अपने मॉडल में सुधार करेगा। इसे ही क्लोज्ड लूप कहते हैं जहाँ कस्टमर की आवाज सिर्फ सुनाई नहीं देती बल्कि उस पर एक्शन भी लिया जाता है। अगर आप अपने फीडबैक लूप को खुला छोड़ देंगे तो आपका बिजनेस उस बाल्टी की तरह हो जाएगा जिसमें नीचे छेद है। आप चाहे जितना पानी भर लें वो कभी नहीं भरेगी।
ज्यादातर कंपनियां फीडबैक लेने के नाम पर सिर्फ फॉर्म भरवाती हैं जिन्हें कोई नहीं पढ़ता। ये वैसा ही है जैसे आप अपने दोस्त से पूछें कि मैं कैसा लग रहा हूँ और उसके जवाब देने से पहले ही आप शीशा तोड़ दें। आपको सच सुनने की हिम्मत रखनी होगी चाहे वो कड़वा ही क्यों न हो। जो बिजनेस अपने कस्टमर से बात करना बंद कर देता है मार्केट उसे लात मारकर बाहर कर देता है। आपको अपने फ्रंटलाइन एम्प्लॉईज की बात सुननी होगी क्योंकि वो कस्टमर के सबसे करीब होते हैं। उन्हें पता होता है कि असली दिक्कत कहाँ है। लेकिन नहीं हमें तो मीटिंग्स में बड़े बड़े ग्राफ्स और पीपीटी देखने का शौक है।
लर्निंग का मतलब सिर्फ गलती सुधारना नहीं है बल्कि नए मौकों को पहचानना भी है। जब आप बार बार अपने मॉडल को टेस्ट करते हैं और डेटा देखते हैं तो आपको समझ आता है कि लोग क्या चाह रहे हैं। ये एक लूप की तरह चलना चाहिए। काम करो डेटा देखो सीखो और फिर बेहतर तरीके से वही काम करो। ये प्रोसेस जितना तेज होगा आप अपने कॉम्पिटिटर से उतने ही आगे होंगे। जो कंपनियां आज टॉप पर हैं वो इसलिए नहीं हैं कि वो कभी फेल नहीं हुईं बल्कि इसलिए हैं क्योंकि वो फेल होने के बाद सबसे जल्दी सीखीं और वापस लाइन पर आ गईं।
रिपीटबिलिटी का मतलब पत्थर की लकीर नहीं है, इसका मतलब है एक मजबूत ढांचा जिसे आप लगातार बेहतर बना रहे हैं। आपका मॉडल सॉलिड होना चाहिए लेकिन आपकी आंखें और कान हमेशा खुले होने चाहिए। जब तक आप सीखना बंद नहीं करेंगे तब तक दुनिया की कोई ताकत आपको आउटडेटेड नहीं कर सकती। अपने अहंकार को बाजू में रखिए और अपने काम को एक लैबोरेट्री की तरह देखिए जहाँ हर फीडबैक एक नया एक्सपेरिमेंट है।
तो दोस्तों, रिपीटबिलिटी का असली जादू यही है। एक ऐसा मॉडल बनाना जिसे दोहराया जा सके अपने उसूलों पर अड़े रहना और लगातार सीखते रहना। ये कोई रॉकेट साइंस नहीं है लेकिन इसे फॉलो करना सबके बस की बात नहीं है। क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो हर हफ्ते अपना रास्ता बदलते हैं या फिर आप में वो दम है कि आप अपनी स्ट्रेंथ को पहचान कर उसे एक ब्रांड बना सकें।
अगर आप आज से अपने बिजनेस या काम में एक भी रिपीटेबल सिस्टम बनाना चाहते हैं तो कमेंट में रिपीट लिखकर हमें बताएं। अपनी टीम या उस दोस्त के साथ इस आर्टिकल को शेयर करें जो बहुत ज्यादा कंफ्यूज रहता है। याद रखिए कंसिस्टेंसी ही असली किंग है।
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