Scaling Up Excellence (Hindi)


अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक अच्छी टीम बनाकर आपका बिजनेस आसमान छू लेगा, तो मुबारक हो, आप खुद को बर्बाद करने की राह पर हैं। लोग अपनी छोटी सी दुकान नहीं संभाल पा रहे और आप दुनिया जीतने चले हैं। अगर आपने स्केलिंग की ये चालाकियां नहीं सीखी, तो बस दूसरों की तरक्की देखकर जलते रहिये और अपनी नाकामी का ढोल पीटते रहिये।

लेकिन फिक्र मत कीजिये। आज हम रॉबर्ट सटन और हग्गी राव की जबरदस्त किताब स्केलिंग अप एक्सीलेंस से वो ३ सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके काम करने के तरीके को पूरी तरह बदल देंगे। चलिए इन लेसन्स को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : कैथोलिक बनाम प्रोटेस्टेंट - नकल करनी है या अकल लगानी है

जब कोई बिजनेस या आइडिया छोटा होता है, तब सब कुछ आपके कंट्रोल में होता है। आप जानते हैं कि कौन चाय में कितनी चीनी लेता है और कौन काम के बीच में सोता है। लेकिन जैसे ही आप इसे स्केल करने यानी बड़ा करने की सोचते हैं, असली सर्कस शुरू होता है। रॉबर्ट सटन और हग्गी राव कहते हैं कि बड़े होने के दो ही रास्ते हैं। एक है कैथोलिक अप्रोच और दूसरा है प्रोटेस्टेंट अप्रोच।

कैथोलिक अप्रोच का मतलब है कि आप एक नियम बनाएंगे और वो कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर ऑफिस में पत्थर की लकीर होगा। जैसे मैकडोनाल्ड्स वाले करते हैं। आप चाहे मुंबई में बर्गर खाएं या दिल्ली में, उसका टेस्ट और उसको बनाने का तरीका बिल्कुल एक जैसा होता है। इसे हम रेप्लिका यानी हुबहू नकल कहते हैं। यह उन लोगों के लिए बेस्ट है जो चाहते हैं कि उनकी टीम का हर बंदा एक रोबोट की तरह काम करे और कोई भी अपना फालतू दिमाग न चलाए। अगर आप चाहते हैं कि आपका काम हर जगह एक ही स्टैंडर्ड पर चले, तो आपको अपनी कंपनी में कैथोलिक शक्ति लानी होगी।

अब बात करते हैं प्रोटेस्टेंट अप्रोच की। यह उन लोगों के लिए है जो थोड़े खुले मिजाज के हैं। यहाँ आप अपनी टीम को बेसिक रूल्स तो बताते हैं, लेकिन उन्हें अपने हिसाब से बदलाव करने की आजादी भी देते हैं। मान लीजिए आपने एक कोचिंग सेंटर खोला। अब दिल्ली के बच्चों को समझाने का तरीका और बिहार के बच्चों को मोटिवेट करने का अंदाज अलग हो सकता है। अगर आप यहाँ भी जिद करेंगे कि नहीं, सब एक ही स्क्रिप्ट पढ़ेंगे, तो लोग आपको भाव नहीं देंगे। यहाँ आपको प्रोटेस्टेंट बनना होगा। यानी जड़ें एक हों लेकिन टहनियां अपनी मर्जी से हवा में झूम सकें।

अक्सर लोग गलती यह करते हैं कि वो बीच का रास्ता पकड़ने की कोशिश करते हैं और वहीं रायता फैल जाता है। वो चाहते हैं कि काम भी परफेक्ट हो और लोग अपनी मर्जी भी चलाएं। भाई साहब, यह तो वही बात हो गई कि आपको वजन भी कम करना है और रोज रात को गुलाब जामुन भी ठूसने हैं। अगर आप स्केल करना चाहते हैं, तो पहले यह तय कीजिये कि आपको क्लोन बनाने हैं या आपको लीडर्स तैयार करने हैं। बिना सोचे समझे नकल करना आपको गधे की कैटेगरी में खड़ा कर देगा और जरूरत से ज्यादा आजादी देना आपके बिजनेस को एक ऐसी बारात बना देगा जिसका कोई दूल्हा ही नहीं है।

जब आप बड़ा होने की सोच रहे हैं, तो यह समझ लीजिये कि जो तरीका आपके बेडरूम से शुरू हुए स्टार्टअप के लिए काम कर रहा था, वो आपके १०० लोगों के ऑफिस के लिए कचरा साबित हो सकता है। आपको अपनी जिद छोड़नी होगी। अगर आप हर छोटी चीज में टांग अड़ाएंगे, तो आपकी टीम का विकास रुक जाएगा। एक तरफ कुआं है और दूसरी तरफ खाई, अब आपको तय करना है कि आप किस तरफ गिरना पसंद करेंगे। स्केल करने का असली मजा तभी है जब आप यह जान लें कि कहाँ हाथ छोड़ना है और कहाँ लगाम कसनी है।


लेसन २ : कॉग्निटिव लोड - दिमाग का दही होने से बचाएं

जैसे जैसे कोई कंपनी या टीम बड़ी होती है, वैसे वैसे वहां काम करने वालों का दिमाग चकराने लगता है। छोटे लेवल पर सब कुछ आसान लगता है, लेकिन जैसे ही आप दस से सौ और सौ से हजार लोगों तक पहुँचते हैं, असली मुसीबत शुरू होती है। रॉबर्ट सटन और हग्गी राव इसे कॉग्निटिव लोड यानी दिमाग पर पड़ने वाला बोझ कहते हैं। आसान भाषा में कहें तो यह वो स्थिति है जब इंसान काम कम करता है और फालतू की मीटिंग्स, ईमेल्स और कागजी कार्यवाही में ज्यादा उलझा रहता है।

अक्सर बड़े बिजनेस में लोग यह सोचने में ज्यादा वक्त बर्बाद करते हैं कि उन्हें परमिशन किससे लेनी है, बजाय इसके कि वो काम खत्म करें। अगर आपके ऑफिस में एक पेन खरीदने के लिए भी पांच मैनेजर के साइन लगते हैं, तो समझ लीजिये कि आपने अपनी टीम के दिमाग का दही कर दिया है। यह वैसा ही है जैसे आप एक फरारी कार को ट्रैफिक जाम में चला रहे हों। कार में ताकत तो बहुत है, लेकिन सिस्टम उसे आगे बढ़ने ही नहीं दे रहा। स्केल करने का मतलब यह नहीं है कि आप और ज्यादा नियम बना दें, बल्कि इसका मतलब है कि आप उन रुकावटों को हटा दें जो लोगों को काम करने से रोक रही हैं।

ज्यादातर बॉस को लगता है कि जितने ज्यादा नियम होंगे, काम उतना ही बढ़िया होगा। लेकिन असलियत में ज्यादा नियम मतलब ज्यादा कन्फ्यूजन होता है। जब एक कर्मचारी को यह नहीं पता होता कि उसका असली काम क्या है, तो वो बस कीबोर्ड पर उंगलियां चलाकर बिजी दिखने का नाटक करता है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम एक्सीलेंस हासिल करे, तो आपको उनके रास्ते से कंकड़ हटाने होंगे। उन्हें फालतू की प्रेजेंटेशन और उन मीटिंग्स से आजादी दीजिये जिनका कोई अंत नहीं होता।

इंसानी दिमाग की एक लिमिट होती है। अगर आप उस पर हजार तरह की जानकारियां और प्रोसेस थोप देंगे, तो वो शार्ट सर्किट हो जाएगा। अच्छी स्केलिंग वो है जहाँ चीजें बड़ी होने के बावजूद सिंपल बनी रहें। अगर आपका प्रोसेस इतना उलझा हुआ है कि उसे समझने के लिए किसी को डिक्री चाहिए, तो समझ लीजिये कि आपका पतन शुरू हो चुका है। स्मार्ट लीडर्स हमेशा चीजों को घटाने पर ध्यान देते हैं, जोड़ने पर नहीं। वो जानते हैं कि कम बोझ के साथ ही ऊंची चढ़ाई चढ़ी जा सकती है।

असली लीडर वही है जो अपनी टीम को यह कहे कि जाओ और काम करो, मैं पीछे खड़ा होकर तुम्हारी रुकावटें साफ कर रहा हूँ। अगर आप खुद ही अपनी टीम के लिए सबसे बड़ी रुकावट बन गए हैं, तो फिर भगवान ही आपका मालिक है। स्केलिंग का असली मंत्र है - सरलता। जो काम सीधे हाथ से हो सकता है, उसके लिए पूरी बॉडी को ट्विस्ट करने की जरूरत नहीं है। अपनी टीम को सांस लेने की जगह दीजिये, वरना वो काम नहीं करेंगे, बस काम करने का ढोंग करेंगे।


लेसन ३ : बैड इज स्ट्रॉन्गर दैन गुड - गंदगी को साफ करना सीखें

हमारे समाज में एक बड़ी गलतफहमी है कि अगर हम बहुत सारे अच्छे लोगों को एक साथ खड़ा कर देंगे, तो सब कुछ बढ़िया हो जाएगा। लेकिन रॉबर्ट सटन और हग्गी राव एक कड़वा सच बताते हैं। एक सड़ा हुआ आम पूरी टोकरी को खराब करने की ताकत रखता है। इसे कहते हैं 'नेगेटिविटी का पावर'। एक नेगेटिव इंसान या एक खराब आदत आपकी टीम की सालों की मेहनत पर पांच मिनट में पानी फेर सकती है। स्केलिंग का मतलब सिर्फ अच्छे लोगों को जोड़ना नहीं है, बल्कि उन लोगों और आदतों को लात मारकर बाहर निकालना है जो आपके वर्क कल्चर को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

अक्सर कंपनियां बड़े होने के चक्कर में किसी भी ऐरे गैरे को नौकरी पर रख लेती हैं। उन्हें लगता है कि बस हाथ पैर होने चाहिए, काम तो सिखा ही देंगे। लेकिन भाई साहब, आप किसी को काम सिखा सकते हैं, उसकी नियत और बदतमीजी नहीं बदल सकते। अगर आपकी टीम में एक भी ऐसा बंदा है जो दूसरों की टांग खींचता है या हमेशा रोता रहता है, तो वो बाकी नौ मेहनती लोगों का उत्साह भी खत्म कर देगा। यह वैसा ही है जैसे आप दूध के पतीले में एक बूंद नींबू डाल दें। चाहे दूध कितना भी शुद्ध क्यों न हो, फटना तो उसे तय है।

स्केलिंग अप एक्सीलेंस का सबसे बड़ा लेसन यही है कि आपको गंदगी के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' रखनी होगी। अगर कोई मैनेजर बहुत टैलेंटेड है लेकिन उसका व्यवहार घटिया है, तो उसे तुरंत विदा कर दीजिये। क्योंकि अगर आपने उसे झेल लिया, तो आपकी बाकी अच्छी टीम को लगेगा कि यहाँ बदतमीजी चलती है। धीरे धीरे आपका पूरा ऑफिस एक जंग का मैदान बन जाएगा जहाँ काम कम और पॉलिटिक्स ज्यादा होगी। याद रखिये, अच्छी आदतें फैलने में वक्त लेती हैं, लेकिन बुराई जंगल की आग की तरह फैलती है।

ज्यादातर लीडर्स डरते हैं कि अगर उन्होंने किसी 'स्टार परफॉर्मर' को निकाल दिया तो काम रुक जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि उस जहरीले इंसान के जाते ही बाकी टीम चैन की सांस लेती है और उनकी प्रोडक्टिविटी डबल हो जाती है। आपको अपनी कंपनी के बगीचे से खरपतवार को उखाड़ना ही होगा, वरना आपके लगाए हुए सुंदर फूल कभी खिल नहीं पाएंगे। एक्सीलेंस कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप एक दिन में हासिल कर लें, यह एक रोज की सफाई है। जैसे आप रोज नहाते हैं, वैसे ही आपको अपने बिजनेस के कल्चर को रोज साफ करना होगा।

अगर आप चाहते हैं कि आपका स्टार्टअप या बिजनेस बुलंदियों को छुए, तो खुद से एक सवाल पूछिए। क्या मैं उन लोगों के साथ काम कर रहा हूँ जो मुझे ऊपर ले जा रहे हैं, या उनके साथ जो मेरे पैरों में बेड़ियाँ बांध रहे हैं। याद रखिये, छोटा और साफ घर उस बड़े महल से बेहतर है जिसमें हर कोने में कचरा भरा हो। अपनी टीम को एक ऐसी जगह बनाइये जहाँ सिर्फ टैलेंट ही नहीं, बल्कि इज्जत और पॉजिटिविटी भी स्केल करे। तभी आप सही मायनों में एक महान कंपनी खड़ी कर पाएंगे।


दोस्तों, बड़ा होना हर किसी का सपना होता है, लेकिन सही तरीके से बड़ा होना एक कला है। आज ही अपनी टीम और अपने काम करने के तरीके को गौर से देखिये। क्या आप कैथोलिक हैं या प्रोटेस्टेंट। क्या आप अपनी टीम का बोझ बढ़ा रहे हैं या कम कर रहे हैं। और सबसे जरूरी, क्या आपने उस 'सड़े हुए आम' को अभी तक टीम से बाहर निकाला है। कमेंट में बताइये कि आप आज से अपने काम में क्या एक बड़ा बदलाव करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो एक बड़ी टीम हैंडल कर रहा है। चलिए, साथ मिलकर एक्सीलेंस की तरफ बढ़ते हैं।

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