क्या आप अभी भी ९ से ५ की घिसी पिटी लाइफ में खुश हैं। मुबारक हो। आप अपनी लाइफ के सबसे बड़े मौकों को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। सिलिकॉन वैली के ये सीक्रेट्स न जानकर आप खुद को पीछे धकेल रहे हैं। शायद आपको एवरेज बने रहने में ज्यादा मजा आता है।
लेकिन अगर आपके अंदर थोड़ी भी आग बाकी है। तो आज का ये आर्टिकल आपके दिमाग के सारे बंद दरवाजे खोल देगा। चलिए जानते हैं डेबराह पेरी पिसिओन की किताब से वो ३ पावरफुल लेसन जो आपको जीरो से हीरो बना सकते हैं।
लेसन १ : फेलियर का जश्न मनाना और उसे मेडल की तरह पहनना
हमारे यहाँ अगर कोई लड़का स्टार्टअप शुरू करे और वो फेल हो जाए, तो मोहल्ले के ताऊ जी सबसे पहले पहुँच जाते हैं। उनका पहला डायलॉग होता है, बेटा हमने तो पहले ही कहा था कि चुपचाप बैंक की तैयारी कर लो। इंडिया में फेलियर का मतलब है सामाजिक मौत। लेकिन सिलिकॉन वैली की कहानी एकदम अलग है। वहाँ अगर आप फेल नहीं हुए, तो लोग आपको शक की नजर से देखते हैं। उन्हें लगता है कि शायद आपने लाइफ में कभी कुछ बड़ा ट्राई ही नहीं किया।
डेबराह पेरी पिसिओन अपनी किताब में बताती हैं कि सिलिकॉन वैली में फेलियर को एक एंड नहीं बल्कि एक प्रोसेस माना जाता है। वहाँ लोग अपनी नाकामियों को छुपाते नहीं हैं, बल्कि बड़े गर्व से बताते हैं। जैसे कोई फौजी अपने सीने पर गोली के निशान दिखाता है। वहाँ के कल्चर में फेलियर को एक्सपीरियंस का नाम दिया गया है। सोचिए, एक ऐसा शहर जहाँ लोग अपनी कंपनी डूबने पर मातम नहीं मनाते, बल्कि एक 'फेलियर पार्टी' रखते हैं।
मान लीजिए आपने एक ऐप बनाया जो कुत्तों के लिए ऑनलाइन रिश्ता ढूंढता है। अब ये आइडिया सुनने में जितना अजीब है, उतना ही रिस्की भी है। इंडिया में अगर ये फेल हुआ तो घरवाले आपको डोग्गी के साथ ही बाहर निकाल देंगे। लेकिन सिलिकॉन वैली में इनवेस्टर आपसे कहेगा, चलो अच्छा है तुम्हें पता चल गया कि कुत्ते सिंगल रहना पसंद करते हैं। अब बताओ अगला बड़ा प्लान क्या है।
वहाँ फेलियर का मतलब है कि आपने एक रास्ता ढूंढ लिया जो काम नहीं करता। थॉमस एडिसन ने भी तो यही कहा था न। लेकिन हम लोग तो एक बार गिरते ही चादर ओढ़कर सो जाते हैं। सिलिकॉन वैली के लोग जानते हैं कि इनोवेशन का रास्ता गलतियों के ढेर से होकर गुजरता है। अगर आप गिरेंगे नहीं, तो आप कभी दौड़ना नहीं सीखेंगे। यहाँ का इकोसिस्टम आपको गिरने पर लात नहीं मारता, बल्कि हाथ पकड़कर खड़ा करता है।
यही वजह है कि वहाँ के लोग बड़े दांव खेलने से डरते नहीं हैं। उन्हें पता है कि अगर वो हार भी गए, तो समाज उन्हें नकारा नहीं कहेगा। बल्कि अगली बार उन्हें ज्यादा तजुर्बेकार माना जाएगा। अगर आपको भी लाइफ में कुछ बड़ा उखाड़ना है, तो सबसे पहले फेलियर का डर अपने दिमाग से निकाल दीजिए। जब तक आप गलतियाँ करने की परमिशन खुद को नहीं देंगे, तब तक आप कुछ नया क्रिएट नहीं कर पाएंगे। अपनी नाकामियों को बोझ मत बनाइए, उन्हें अपनी सीढ़ी बनाइए। क्योंकि जो हारकर भी हार नहीं मानता, असल में वही गेम का असली खिलाड़ी होता है।
लेसन २ : आइडियाज की तिजोरी छोड़ो और खुले दिल से हाथ मिलाओ
हमारे देश में अगर किसी के पास कोई अच्छा बिजनेस आइडिया आ जाए, तो वो उसे ऐसे छुपा कर रखता है जैसे किसी पुरानी हवेली का गड़ा हुआ खजाना हो। उसे डर रहता है कि कहीं बगल वाला शर्मा जी का लड़का उसका आइडिया चुराकर करोड़पति न बन जाए। लोग अपने प्लान्स पर ताला लगाकर रखते हैं। लेकिन सिलिकॉन वैली का फंडा एकदम उल्टा है। वहाँ लोग अपने आइडियाज को छुपाते नहीं, बल्कि कॉफी की दुकानों पर बैठकर अनजान लोगों के साथ डिस्कस करते हैं।
डेबराह अपनी किताब में समझाती हैं कि सिलिकॉन वैली की असली ताकत उसका कोलैबोरेशन है। वहाँ की हवा में ही ये बात है कि अगर मैं तुम्हारे आइडिया में मदद करूँगा, तो कल तुम मेरे काम आओगे। इसे वो 'पे इट फॉरवर्ड' कल्चर कहते हैं। इंडिया में तो लोग रास्ता पूछने पर भी गलत दिशा बता देते हैं ताकि आप उनसे आगे न निकल जाएं। पर सिलिकॉन वैली में लोग अपनी रिसर्च और अपने कॉन्टैक्ट्स एक दूसरे के साथ खुलेआम शेयर करते हैं।
सोचिए, आप एक रेस्टोरेंट खोलना चाहते हैं। अब आप अकेले बैठ कर रेसिपी सोच रहे हैं, फर्नीचर देख रहे हैं और मार्केटिंग का प्लान बना रहे हैं। इसमें आपको साल भर लग जाएगा। लेकिन अगर आप सिलिकॉन वैली के माइंडसेट से चलें, तो आप चार और रेस्टोरेंट मालिकों से मिलेंगे। वो आपको बताएंगे कि कौन सा सब्जी वाला सस्ता है और कौन सा शेफ नखरे दिखाता है। वो आपको अपना कॉम्पिटिटर नहीं, बल्कि अपने इकोसिस्टम का हिस्सा मानेंगे।
हैरानी की बात ये है कि वहाँ की बड़ी बड़ी कंपनियां भी एक दूसरे के टैलेंट और आइडियाज का सम्मान करती हैं। वहाँ लोग जॉब नहीं बदलते, वो तो बस एक बिल्डिंग से दूसरी बिल्डिंग में चले जाते हैं। इसका फायदा ये होता है कि नॉलेज एक जगह जाम नहीं होती। वो पानी की तरह बहती रहती है। जब नॉलेज बहती है, तभी नए और बेहतर इनोवेशन जन्म लेते हैं। अगर आप अपने आइडिया को मुट्ठी में बंद रखेंगे, तो वो कभी बड़ा नहीं होगा। उसे बाहर की ताजी हवा और दूसरे लोगों के फीडबैक की जरूरत होती है।
सिलिकॉन वैली में ये माना जाता है कि आइडिया की अपनी कोई वैल्यू नहीं है। असली वैल्यू तो उसे एक्जीक्यूट करने में है। इसलिए वहाँ लोग इस बात से नहीं डरते कि कोई उनका प्लान चुरा लेगा। उन्हें अपनी मेहनत और टीम पर भरोसा होता है। वो जानते हैं कि मिल जुलकर काम करने से जो तरक्की मिलेगी, वो अकेले कमरे में बैठ कर कभी नहीं मिल सकती। तो अगर आप भी अपनी लाइफ या बिजनेस में अटके हुए हैं, तो अपनी तिजोरी खोलिए। लोगों से मिलिए, अपने प्लान्स शेयर कीजिए और देखिए कैसे दूसरों की राय आपके साधारण से आइडिया को एक ब्रांड बना देती है।
लेसन ३ : रिस्क लेने की भूख और बड़ा दांव खेलने का जिगरा
क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे यहाँ लोग फिक्स्ड डिपॉजिट और सरकारी नौकरी के पीछे हाथ धोकर क्यों पड़े रहते हैं। क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि बेटा जितना बड़ा चादर हो उतने ही पैर फैलाओ। लेकिन सिलिकॉन वैली के लोग चादर की फिक्र नहीं करते। वो तो सीधा नया थान खरीदने का रिस्क लेते हैं। यहाँ रिस्क लेना कोई मजबूरी नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल है। डेबराह अपनी किताब में साफ़ कहती हैं कि अगर आप सेफ खेल रहे हैं, तो आप असल में सबसे बड़ा रिस्क ले रहे हैं। वो रिस्क है पीछे छूट जाने का।
सिलिकॉन वैली का पूरा ढांचा इसी बात पर खड़ा है कि आप कितना बड़ा और कितना अलग सोच सकते हैं। वहां लोग १०% ग्रोथ की बात नहीं करते, वो १० गुना यानी १०X इम्पैक्ट की बात करते हैं। हम लोग अक्सर सोचते हैं कि अगर पैसे डूब गए तो क्या होगा। वहां लोग सोचते हैं कि अगर मैंने ये रिस्क नहीं लिया और दुनिया बदल गई, तो मेरा क्या होगा। ये जो 'फोमो' यानी कुछ बड़ा मिस कर देने का डर है, यही वहां के लोगों से पागलों की तरह काम करवाता है।
मान लीजिए आपको एक नई कार खरीदनी है। आप सालों तक पैसे बचाएंगे, माइलेज चेक करेंगे और फिर जाकर एक ऐसी कार लेंगे जो पड़ोसी को भी पसंद आए। लेकिन सिलिकॉन वैली का माइंडसेट वाला बंदा अपनी सारी जमा पूंजी लगाकर एक ऐसी टेक्नोलॉजी बनाएगा जो कार को हवा में उड़ा सके। लोग उसे पागल कहेंगे, हंसेंगे, और शायद वो फेल भी हो जाए। लेकिन अगर वो कामयाब हो गया, तो वो सिर्फ एक कार नहीं खरीदेगा, वो पूरी इंडस्ट्री का मालिक बन जाएगा।
यही वो जिगरा है जो एक आम इंसान को एलन मस्क या स्टीव जॉब्स बनाता है। वहां के इनवेस्टर्स भी ऐसे ही लोगों पर पैसा लगाते हैं जिनकी आंखों में दुनिया बदलने का जुनून हो, न कि सिर्फ बैंक बैलेंस बढ़ाने का। रिस्क लेने का मतलब ये नहीं कि आप बिना सोचे समझे कुएं में कूद जाएं। इसका मतलब है कि आप अपनी काबिलियत पर इतना भरोसा रखें कि मुश्किल वक्त में भी रास्ता निकाल लें।
जब आप बड़ा रिस्क लेते हैं, तो आपका दिमाग भी उसी लेवल पर काम करना शुरू कर देता है। आपकी मेहनत का लेवल बढ़ जाता है और आपकी नेटवर्किंग भी वैसे ही लोगों के साथ होने लगती है। सिलिकॉन वैली हमें यही सिखाती है कि कंफर्ट जोन वो खूबसूरत जगह है जहाँ कुछ भी नया पैदा नहीं होता। अगर आपको दुनिया के नक्शे पर अपनी पहचान बनानी है, तो आपको अपनी सुरक्षा की दीवारें तोड़कर बाहर निकलना होगा। बड़ा सोचिए, बड़ा दांव खेलिए और याद रखिए कि समंदर के किनारे बैठने वालों को सिर्फ सीपियां मिलती हैं, मोती तो वही लाते हैं जो गहराई में उतरने का रिस्क लेते हैं।
तो दोस्तों, क्या आप तैयार हैं अपनी लाइफ का वो बड़ा रिस्क लेने के लिए। क्या आप अपनी पुरानी सोच की बेड़ियाँ तोड़कर उस उड़ान के लिए तैयार हैं जो आपको कामयाबी के आसमान तक ले जाएगी। याद रखिए, मौका हर किसी के पास आता है, पर उसे पकड़ते वही हैं जिनके पास उसे संभालने का जिगरा होता है। आज ही अपने अंदर के उस इनोवेशन को जगाइए और बन जाइए अपनी लाइफ के सिलिकॉन वैली के बादशाह।
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