Six Disciplines Execution Revolution (Hindi)


अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर ऑफिस में गधों की तरह मेहनत करते हैं पर शाम को रिजल्ट जीरो मिलता है तो मुबारक हो आप बर्बादी की सही राह पर हैं। बिना एक्जीक्यूशन के बड़े प्लान बनाना वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल की फरारी में बैठ कर चांद पर जाने के सपने देखना।

आज हम गैरी हर्पस्ट की किताब सिक्स डिसिप्लिन एक्जीक्यूशन रेवोल्यूशन से वो सीक्रेट्स समझेंगे जो आपके बिजनेस की सुस्ती को खत्म कर देंगे। तैयार हो जाइए क्योंकि ये ३ लेसन आपकी लाइफ और बिजनेस करने का तरीका पूरी तरह बदलने वाले हैं।


लेसन १ : प्लानिंग के महल बनाना छोड़ो और काम करना शुरू करो

सच तो ये है कि हम सब को बड़े बड़े सपने देखना और पेपर पर स्ट्रेटजी बनाना बहुत पसंद है। हम इंडियंस वैसे भी राय देने और प्लान बनाने में वर्ल्ड चैंपियन हैं। ऑफिस की मीटिंग्स में जब लोग सूट पहन कर वाइटबोर्ड पर ग्राफ बनाते हैं तो लगता है कि अगले हफ्ते तक हम एलन मस्क को पीछे छोड़ देंगे। लेकिन मंडे आते ही वही पुरानी कहानी शुरू हो जाती है। काम वही का वही पड़ा रहता है। गैरी हर्पस्ट अपनी किताब में साफ कहते हैं कि दुनिया में आइडियाज की कमी नहीं है बल्कि उन पर काम करने वालों की कमी है। अगर प्लान बनाने से ही अमीर बनते तो आज हर दूसरा शख्स करोड़पति होता। असली दिक्कत ये है कि हम 'स्ट्रेटजी' और 'एक्जीक्यूशन' के बीच के फर्क को समझ ही नहीं पाते।

सोचिए आपने अपनी फिटनेस का एक तगड़ा प्लान बनाया। आपने सबसे महंगा जिम जॉइन किया और बढ़िया जूते भी खरीद लिए। आपने डाइट चार्ट भी दीवार पर चिपका दिया। ये सब क्या है। ये है आपकी स्ट्रेटजी। लेकिन सुबह जब अलार्म बजता है और आप उसे थप्पड़ मार कर सो जाते हैं तो समझ लीजिए कि आपका एक्जीक्यूशन फेल हो गया है। बिजनेस में भी यही होता है। कंपनियां सालो साल मीटिंग्स करती हैं पर एंड रिजल्ट कुछ नहीं निकलता। एक आम दुकानदार भी अगर अपनी दुकान के आगे रोज झाड़ू मार कर सही समय पर शटर खोलता है तो वो उस एमबीए डिग्री होल्डर से बेहतर है जो सिर्फ प्रेजेंटेशन बना रहा है।

सक्सेस का मतलब ये नहीं है कि आपके पास सबसे बढ़िया दिमाग है। इसका मतलब ये है कि आपके पास वो अनुशासन है जिससे आप रोज छोटे छोटे काम पूरे कर सकें। अक्सर लोग सोचते हैं कि जब उनके पास बहुत सारा पैसा और बड़ी टीम होगी तब वो बड़े बदलाव करेंगे। ये वैसी ही बात हुई कि आप कहें कि जब मेरे पास छः पैक एब्स होंगे तभी मैं जिम जाऊँगा। भाई पहले पसीना बहाना पड़ता है तब जाकर रिजल्ट दिखता है। बिजनेस में एक्जीक्यूशन का मतलब है उन बोरिंग कामों को भी उतनी ही शिद्दत से करना जो आपके बिजनेस को आगे बढ़ाते हैं।

ज्यादातर स्टार्टअप्स और छोटे बिजनेस इसलिए डूब जाते हैं क्योंकि वो 'परफेक्शन' के पीछे भागते हैं। उन्हें लगता है कि जब तक सब कुछ एकदम परफेक्ट नहीं होगा तब तक वो मार्केट में नहीं उतरेंगे। यकीन मानिए मार्केट को आपके परफेक्शन से कोई लेना देना नहीं है। मार्केट को मतलब है सॉल्यूशन से। अगर आप एक छोटा सा भी काम ढंग से पूरा कर लेते हैं तो आप उन ९० परसेंट लोगों से आगे निकल जाते हैं जो सिर्फ ख्याली पुलाव पका रहे हैं।

अगला कदम उठाने का मतलब ये नहीं है कि आप अंधेरे में छलांग लगा दें। इसका मतलब है कि आप अपनी स्ट्रेटजी को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटें। जब आप छोटे लक्ष्य सेट करते हैं और उन्हें पूरा करते हैं तो आपकी टीम का कॉन्फिडेंस बढ़ता है। बिना जीत के कोई भी टीम ज्यादा दिन तक मोटिवेटेड नहीं रह सकती। अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस सच में एक रेवोल्यूशन लाए तो पहले अपने ऑफिस की उन फालतू मीटिंग्स को बंद कीजिए जहाँ सिर्फ चाय पी जाती है और काम की बात कम होती है। काम शुरू करना ही काम खत्म करने का पहला स्टेप है।

याद रखिए एक्जीक्यूशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो आप एक बार कर के भूल जाएं। ये एक आदत है। जैसे ब्रश करना या नहाना एक मजबूरी नहीं बल्कि जरूरत है वैसे ही बिजनेस में रोज के टास्क पूरे करना आपकी सांसों की तरह होना चाहिए। अगर आप आज का काम कल पर टाल रहे हैं तो आप सिर्फ अपना वक्त बर्बाद नहीं कर रहे बल्कि अपनी सफलता का गला घोंट रहे हैं।


लेसन २ : सिस्टम और प्रोसेस की असली ताकत

अगर आपको लगता है कि आपका बिजनेस आपके बिना एक पत्ता भी नहीं हिला सकता तो बधाई हो आपने बिजनेस नहीं बल्कि अपने लिए एक और नौकरी ढूंढ ली है। ज्यादातर इंडियन बिजनेस ओनर्स के साथ यही दिक्कत है। उन्हें लगता है कि जब तक वो खुद गल्ले पर नहीं बैठेंगे या जब तक वो हर छोटी फाइल पर साइन नहीं करेंगे तब तक काम सही नहीं होगा। गैरी हर्पस्ट कहते हैं कि ये बिजनेस चलाने का सबसे घटिया तरीका है। असली लीडर वो नहीं है जो सारा काम खुद करे बल्कि वो है जो एक ऐसा सिस्टम बनाए जो उसके सोने के बाद भी काम करता रहे।

आपने अपने मोहल्ले के शर्मा जी की हलवाई की दुकान तो देखी ही होगी। शर्मा जी खुद समोसे तलते हैं खुद ही पैसे काटते हैं और खुद ही टोकन देते हैं। जिस दिन शर्मा जी की तबियत खराब हुई या वो किसी शादी में गए उस दिन दुकान बंद। ये है 'सेल्फ एम्प्लॉयमेंट' का जाल। अब दूसरी तरफ मैकडोनाल्ड्स को देखिए। वहां कोई मालिक काउंटर पर नहीं खड़ा होता। वहां १८ साल के लड़के लड़कियां वही काम पूरी दुनिया में एक ही तरीके से कर रहे हैं। क्यों। क्योंकि वहां 'शर्मा जी' नहीं बल्कि 'सिस्टम' काम कर रहा है। वहां समोसा कितने तापमान पर तलेगा और बर्गर में कितनी सॉस डलेगी ये सब पहले से तय है।

बिजनेस में सिस्टम का मतलब है कि आपके पास हर काम को करने का एक मैन्युअल होना चाहिए। अगर आपके ऑफिस में बिजली का बिल भरना है या किसी नए क्लाइंट को कॉल करना है तो उसका एक सेट तरीका होना चाहिए। जब आप प्रोसेस बना देते हैं तो आपको 'सुपर टैलेंटेड' लोगों की जरूरत कम पड़ती है। आप साधारण लोगों के साथ भी असाधारण रिजल्ट्स पा सकते हैं। लेकिन हम इंडियंस को तो जुगाड़ की आदत है। हम सोचते हैं कि यार सिस्टम बनाने में कौन टाइम वेस्ट करे अभी तो जैसे तैसे काम चल ही रहा है। यही सोच आपके बिजनेस को एक बड़े ब्रैंड बनने से रोकती है।

सोचिए कि आप एक फुटबॉल मैच खेल रहे हैं और गोल पोस्ट ही गायब है। आप बस भाग रहे हैं पसीना बहा रहे हैं पर स्कोर क्या है ये किसी को नहीं पता। बिना सिस्टम के बिजनेस करना बिल्कुल ऐसा ही है। आपको पता ही नहीं चलता कि कौन सी टीम सही काम कर रही है और कहाँ पैसा बर्बाद हो रहा है। सिस्टम बनाने का मतलब ये नहीं है कि आप बहुत सारे कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर खरीद लें। इसका मतलब है कि आप अपने काम करने के तरीके को डिसिप्लिन में लाएं।

अक्सर बॉस लोग शिकायत करते हैं कि यार मेरी टीम तो सुनती ही नहीं। भाई वो इसलिए नहीं सुनते क्योंकि उन्हें पता ही नहीं है कि उन्हें करना क्या है। जब प्रोसेस क्लियर होता है तो कंफ्यूजन की कोई जगह नहीं बचती। अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस सच में एक रेवोल्यूशन बने तो आपको अपने ईगो को साइड में रखना होगा। ये सोचना बंद कर दीजिए कि 'मेरे जैसा काम कोई नहीं कर सकता'। हकीकत तो ये है कि अगर आप मर भी गए तो दुनिया चलती रहेगी और आपका बिजनेस भी चलना चाहिए।

सिस्टम बनाने का असली मजा तब आता है जब आप वेकेशन पर गोवा में चिल कर रहे हों और आपके फोन पर मैसेज आए कि आज का सेल्स टारगेट पूरा हो गया है। वो सुकून करोड़ों रुपयों से ज्यादा कीमती है। अगर आप आज सिस्टम नहीं बनाएंगे तो आप जिंदगी भर अपने ही बिजनेस के गुलाम बने रहेंगे। तो फैसला आपका है। आपको शर्मा जी बनना है या फिर एक ऐसा एम्पायर खड़ा करना है जो सदियों तक चले।


लेसन ३ : टीम अलाइनमेंट और जवाबदेही की असली जंग

बिजनेस चलाना कोई सोलो ट्रिप नहीं है बल्कि ये एक पूरी बारात की तरह है जहाँ अगर ढोल वाला सही धुन न बजाए तो दूल्हे की इज्जत का कचरा हो जाता है। गैरी हर्पस्ट हमें समझाते हैं कि आपके पास दुनिया का सबसे अच्छा सिस्टम हो सकता है लेकिन अगर आपकी टीम को ये ही नहीं पता कि उन्हें जाना कहाँ है तो आपकी नैया डूबना तय है। अलाइनमेंट का मतलब है कि आपकी कंपनी का हर इंसान एक ही दिशा में धक्का लगा रहा हो। वरना होता ये है कि मार्केटिंग वाली टीम अलग भाग रही है और सेल्स वाली टीम अलग और मालिक बीच में खड़ा होकर बस सिर खुजला रहा है।

मान लीजिए आप एक क्रिकेट मैच खेल रहे हैं। बॉलर चाहता है कि वो यॉर्कर डाले पर कीपर को लगता है कि बाउंसर आने वाली है। नतीजा क्या होगा। साढ़े चार रन और बहुत सारी गालियां। बिजनेस में भी यही ड्रामा रोज होता है। एम्प्लॉई को लगता है कि वो बहुत मेहनत कर रहा है और बॉस को लगता है कि सब के सब मुफ्त की सैलरी तोड़ रहे हैं। ये गैप इसलिए है क्योंकि वहां 'अकाउंटेबिलिटी' यानी जवाबदेही का नामोनिशान नहीं है। जब तक आप किसी को ये नहीं बताएंगे कि उसकी जीत किसमें है तब तक वो सिर्फ अपना टाइम पास करेगा।

जवाबदेही का मतलब ये नहीं है कि आप हाथ में डंडा लेकर सबके सिर पर खड़े हो जाएं। ये तो स्कूल के प्रिंसिपल वाला काम हो गया। असली लीडरशिप वो है जहाँ एम्प्लॉई को खुद शर्म आए अगर वो अपना टारगेट पूरा न कर पाए। आपको हर रोल के लिए 'स्कोरकार्ड' बनाना होगा। जैसे एक मैच में स्कोरबोर्ड देख कर पता चल जाता है कि कौन कितने पानी में है वैसे ही आपके बिजनेस में हर बंदे का अपना एक स्कोरबोर्ड होना चाहिए। जब आंकड़े सामने होते हैं तो फिर कोई बहाना काम नहीं आता। वरना तो हमारे यहाँ 'सर ट्रैफिक बहुत था' या 'इंटरनेट नहीं चल रहा था' जैसे बहाने तो नेशनल एंथम की तरह रोज गाए जाते हैं।

लेकिन याद रखिए कि टीम को अलाइन करने के लिए आपको उन्हें सिर्फ काम नहीं बल्कि 'मकसद' देना होगा। अगर आप अपनी टीम से कहेंगे कि 'जाओ ईंटें ढोओ' तो वो थक जाएंगे। लेकिन अगर आप उनसे कहेंगे कि 'हम इस शहर का सबसे बड़ा मंदिर बना रहे हैं' तो वही लोग खुशी खुशी दोगुनी मेहनत करेंगे। इंसान को पैसे के साथ साथ सम्मान और ये महसूस होना भी जरूरी है कि वो किसी बड़ी चीज का हिस्सा है। अगर आप उन्हें सिर्फ एक मशीन की तरह ट्रीट करेंगे तो वो भी आपके बिजनेस को सिर्फ एक एटीएम मशीन की तरह ही देखेंगे।

सारा खेल भरोसे का है, लेकिन भरोसा अंधा नहीं होना चाहिए। गैरी हर्पस्ट का मानना है कि आप अपनी टीम पर भरोसा करें पर उसे समय समय पर चेक भी करते रहें। जब लोगों को पता होता है कि उनके काम की गिनती हो रही है और अच्छे काम पर उन्हें शाबाशी मिलेगी तो उनकी परफॉरमेंस अपने आप सुधर जाती है। अगर आप चाहते हैं कि आपका बिजनेस सच में एक रेवोल्यूशन बने तो आज ही अपने ऑफिस के 'पॉलिटिक्स' को खत्म कीजिए और 'परफॉरमेंस' का कल्चर लाइए।

तो अब वक्त आ गया है कि आप अपने ख्याली पुलाव से बाहर निकलें और हकीकत की जमीन पर कदम रखें। ये तीन लेसन सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं हैं बल्कि इन्हें आज से ही लागू करना शुरू करें। क्या आप अपने बिजनेस को एक नई पहचान देने के लिए तैयार हैं। या फिर आप वही पुरानी घिसी पिटी जिंदगी जीना चाहते हैं। फैसला आपका है क्योंकि ये आपका बिजनेस है और ये आपकी लाइफ है। चलिए कुछ बड़ा करते हैं।

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