क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो गधों की तरह मेहनत करके बिजनेस बड़ा करने का सपना देख रहे हैं। बहुत बढ़िया। बस ऐसे ही अंधे होकर भागते रहिये और एक दिन अपनी जमा पूंजी और सुकून दोनों को आग लगा दीजिये। आपको क्या लगा था कि सीधा रास्ता ही हमेशा सही होता है। अगर आपको 'स्टार्ट एट द एंड' का असली मतलब नहीं पता तो आप बस अपनी बर्बादी का इंतजार कर रहे हैं।
आज हम डेव लैविन्स्की की इस मास्टरक्लास बुक से सीखेंगे कि कैसे दुनिया की बड़ी कंपनियां अपनी प्लानिंग को उल्टा चलाकर सबको पीछे छोड़ देती हैं। इस आर्टिकल में हम उन ३ पावरफुल लेसन की गहराई में उतरेंगे जो आपके बिजनेस करने के पुराने और थके हुए तरीके को पूरी तरह से बदल देंगे।
लेसन १ : अंत से शुरुआत करना ही असली समझदारी है
जरा सोचिये आप एक टैक्सी में बैठते हैं और ड्राइवर आपसे पूछता है कि कहाँ जाना है। आप बड़े ही स्वैग के साथ कहते हैं कि भाई बस गाड़ी चलाते रहो जहाँ रास्ता ले जाए वहीं अपनी मंजिल होगी। ड्राइवर आपको पागल समझकर नीचे उतार देगा या फिर आपको शहर के ऐसे कोनों में घुमाएगा जहाँ आपका बटुआ और कीमती समय दोनों लुट जाएंगे। बिजनेस में भी ९० परसेंट लोग यही गलती करते हैं। वे बस काम शुरू कर देते हैं और सोचते हैं कि मेहनत करेंगे तो कहीं न कहीं तो पहुँच ही जाएंगे। डेव लैविन्स्की कहते हैं कि यह तरीका बिल्कुल वैसा ही है जैसे बिना नक्शे के जंगल में शेर का शिकार करने निकलना। अंत में आप शेर का शिकार नहीं करते बल्कि खुद उसका डिनर बन जाते हैं।
असली खेल तब शुरू होता है जब आप अपना 'एंड गोल' यानी अपनी अंतिम मंजिल पहले तय कर लेते हैं। मान लीजिये आप चाहते हैं कि ५ साल बाद आपकी कंपनी १०० करोड़ का टर्नओवर करे। अब यहाँ से पीछे की तरफ मुड़कर देखिये। अगर ५ साल में १०० करोड़ चाहिए तो ४ साल में कहाँ होना होगा। शायद ५० करोड़ पर। तो ३ साल में २५ करोड़ पर। ऐसे पीछे आते आते आप आज के दिन पर पहुँच जाएंगे। तब आपको समझ आएगा कि आज सुबह उठकर आपको कौन सा पहला फोन घुमाना है। लोग अक्सर भविष्य की प्लानिंग में इतने खो जाते हैं कि आज क्या करना है यह भूल जाते हैं। लेकिन रिवर्स प्लानिंग आपको जमीन पर रखती है।
मान लीजिये हमारे शर्मा जी को एक बहुत बड़ी मिठाई की दुकान खोलनी है। शर्मा जी जोश में आकर पहले दिन ही १० हलवाई रख लेते हैं और ५०० किलो दूध मंगा लेते हैं। उन्हें लगता है कि बस काम शुरू कर दो तो पैसा तो बरसेगा ही। नतीजा क्या हुआ। शाम तक आधी मिठाइयां खराब हो गईं और हलवाई अपनी पगार मांगकर गायब हो गए। अब अगर शर्मा जी 'स्टार्ट एट द एंड' वाला दिमाग लगाते तो वे पहले यह सोचते कि मुझे शहर का सबसे बड़ा हलवाई बनना है जिसके पास हर दिन १००० कस्टमर आएं। उस १००० कस्टमर तक पहुँचने के लिए उन्हें पहले एक छोटा सा काउंटर डालना था और अपने स्वाद का जादू चलाना था। जब कस्टमर बढ़ने लगते तब हलवाई बढ़ाने थे।
लोग अक्सर ईगो के चक्कर में पहले ही इतना तामझाम फैला लेते हैं कि बाद में उसे समेटना मुश्किल हो जाता है। आप अपनी जीत का जश्न पहले ही मन में मना लीजिये लेकिन रास्ता पीछे से बनाइये। जब आप अंत से शुरू करते हैं तो आपको पता होता है कि कौन सी चीज फालतू है और किस पर ध्यान देना है। इससे आपकी एनर्जी फालतू के कामों में बर्बाद नहीं होती। आप उन लोगों की तरह नहीं भटकते जो हर चमकती चीज के पीछे भागते हैं। याद रखिये अगर आपको पता ही नहीं है कि जीतना कैसा दिखता है तो आप कभी जीत ही नहीं पाएंगे। बिजनेस कोई तुक्का नहीं है जिसे आप अंधेरे में तीर मारकर सही बैठा लेंगे। यह एक सोची समझी चाल है जहाँ आपको अपनी आखिरी चाल पहले से पता होनी चाहिए।
लेसन २ : बड़ी कंपनी बनने का नाटक नहीं बल्कि ढांचा पहले तैयार करें
अक्सर लोग सोचते हैं कि जब मेरा बिजनेस बड़ा हो जाएगा तब मैं अच्छे सॉफ्टवेयर खरीदूँगा तब मैं एक शानदार टीम बनाऊँगा और तब मैं अपने ऑफिस को प्रोफेशनल लुक दूँगा। बधाई हो। आपकी यही सोच आपको कभी बड़ा बनने ही नहीं देगी। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई इंसान कहे कि जब मेरी बॉडी बन जाएगी तब मैं जिम जाना शुरू करूँगा और प्रोटीन डाइट लूँगा। भाई साहब अगर आप जिम नहीं जाएंगे तो बॉडी अपने आप आसमान से नहीं टपकने वाली। डेव लैविन्स्की इस बुक में बड़ी कड़वी लेकिन सच्ची बात कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी को एक बड़ी कॉर्पोरेट की तरह नहीं चलाएंगे तो वह कभी कॉर्पोरेट बनेगी ही नहीं।
ज्यादातर स्टार्टअप और छोटे बिजनेस ओनर खुद को 'सुपरमैन' समझते हैं। उन्हें लगता है कि माल भी वही बेचेंगे हिसाब भी वही करेंगे और ऑफिस की झाड़ू भी वही मारेंगे। उन्हें लगता है कि वे पैसे बचा रहे हैं लेकिन असल में वे अपना सबसे कीमती एसेट यानी 'समय' बर्बाद कर रहे हैं। अगर आप ५ साल बाद अपनी कंपनी को एक ऑटोमेशन मोड पर देखना चाहते हैं जहाँ आपके बिना भी काम चलता रहे तो उसकी नींव आज ही रखनी होगी। आपको वो सिस्टम और वो वर्क कल्चर आज ही लाना होगा जो एक १००० करोड़ की कंपनी में होता है। अगर आपका सिस्टम आज ही कमजोर है तो जब ग्राहक बढ़ेंगे तो आपका बिजनेस ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगा।
हमारे एक दोस्त हैं पप्पू भाई। पप्पू भाई ने एक ऑनलाइन टी-शर्ट का बिजनेस शुरू किया। उन्होंने सोचा कि अभी तो दिन के २ आर्डर आते हैं तो खुद ही पैक करके कूरियर कर दूँगा। धीरे-धीरे मार्केटिंग काम कर गई और एक दिन अचानक ५०० आर्डर आ गए। पप्पू भाई की खुशी का ठिकाना नहीं था। लेकिन समस्या यह थी कि उनके पास न तो पैकिंग के लिए लोग थे और न ही कोई ट्रैकिंग सिस्टम। वे पागलों की तरह खुद टेप चिपकाने लगे। नतीजा क्या हुआ। आधे लोगों को गलत साइज चला गया और आधे लोगों का पार्सल फटा हुआ मिला। कस्टमर ने सोशल मीडिया पर पप्पू भाई की क्लास लगा दी। पप्पू भाई का बिजनेस बड़ा होने से पहले ही फुस्स हो गया।
अगर पप्पू भाई ने पहले ही दिन से एक छोटा सा लेकिन मजबूत इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाया होता तो यह नौबत नहीं आती। वे अपनी औकात से एक कदम आगे की तैयारी नहीं कर रहे थे। बिजनेस में अगर आप सिर्फ आज की बारिश से बचने की सोच रहे हैं तो आप कभी समंदर पार नहीं कर पाएंगे। आपको बड़े जहाजों वाले सिस्टम की जरूरत होगी। इसका मतलब यह नहीं है कि आप पहले दिन ही लाखों रुपये फूँक दें। इसका मतलब यह है कि आपकी प्रोसेस ऐसी होनी चाहिए कि अगर कल को काम १० गुना बढ़ जाए तो आपको हार्ट अटैक न आए। अपनी टीम को जिम्मेदारी देना सीखिए। अगर आप हर छोटी चीज में अपनी टांग अड़ाएंगे तो आप अपनी कंपनी के सबसे बड़े दुश्मन बन जाएंगे। एक असली लीडर वही है जो खुद को रिप्लेस करना जानता हो ताकि वह बिजनेस को चलाने के बजाय उसे बढ़ा सके।
लेसन ३ : उन पत्थरों को पहले ही हटा दीजिये जिनसे आप टकराने वाले हैं
ज़्यादातर लोग जब बिजनेस शुरू करते हैं तो वे सिर्फ गुलाबी सपने देखते हैं। वे सोचते हैं कि वे एक नई दुकान खोलेंगे और अगले ही दिन बाहर लंबी लाइन लग जाएगी। लेकिन हकीकत में लाइन कस्टमर की नहीं बल्कि परेशानियों की लगती है। डेव लैविन्स्की कहते हैं कि एक स्मार्ट बिजनेसमैन वह नहीं है जो समस्या आने पर उसका समाधान ढूँढे बल्कि वह है जो समस्या आने से पहले ही उसे पहचान ले। इसे 'प्री-मॉर्टम' कहते हैं। यानी अपनी हार का कारण पहले ही जान लेना ताकि आप उस रास्ते पर चलें ही नहीं। अगर आप यह नहीं सोच रहे कि आपका बिजनेस फेल क्यों हो सकता है तो यकीन मानिये आप उसे फेल होने के लिए ही छोड़ रहे हैं।
लोग अक्सर अपनी कमजोरियों को छुपाने की कोशिश करते हैं जैसे कि वे कोई बहुत बड़े तीस मार खान हों। लेकिन बिजनेस में अपनी कमजोरी को नजरअंदाज करना वैसा ही है जैसे अपनी नाव के छेद पर कागज चिपका देना। समंदर की पहली लहर ही आपको आपकी असली औकात दिखा देगी। आपको यह देखना होगा कि आपके और आपकी मंजिल के बीच में कौन से पहाड़ खड़े हैं। क्या आपके पास कैश की कमी होने वाली है। क्या आपका प्रोडक्ट मार्केट की डिमांड के हिसाब से पुराना पड़ चुका है। या फिर आपका कॉम्पिटिटर आपको कच्चा चबाने के लिए तैयार बैठा है। इन सब रुकावटों की लिस्ट बनाइये और उन्हें एक-एक करके खत्म करिये।
चलिए इसे एक कड़वे लेकिन मजेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये गप्पू ने एक बहुत ही हाई-टेक जिम खोला। गप्पू को लगा कि उसने इतनी महंगी मशीनें लगाई हैं तो लोग दौड़े चले आएंगे। लेकिन गप्पू ने एक छोटी सी बात पर ध्यान नहीं दिया कि उस जिम के ठीक सामने एक बहुत बड़ा और पुराना अखाड़ा था जहाँ लोग सिर्फ ५० रुपये में कसरत करते थे। गप्पू का प्रीमियम जिम खाली पड़ा रहा क्योंकि उसने अपनी 'बाधा' यानी उस अखाड़े और वहाँ के लोगों की मानसिकता को पहले समझा ही नहीं। गप्पू ने सोचा था कि वह सीधा अंत पर पहुँचेगा लेकिन रास्ते के पत्थरों ने उसकी चप्पलें घिस दीं।
अगर आप वाकई में बड़ा और तेज बढ़ना चाहते हैं तो आपको अपनी स्ट्रेटेजी में उन रुकावटों के लिए जगह बनानी होगी। आपको पता होना चाहिए कि अगर प्लान ए काम नहीं किया तो प्लान बी क्या होगा। बिना बैकअप के बिजनेस करना मतलब बिना पैराशूट के प्लेन से कूदना है। मजा तो बहुत आएगा लेकिन सिर्फ तब तक जब तक आप जमीन से नहीं टकराते। अपनी ग्रोथ की स्पीड बढ़ाने का सबसे आसान तरीका यही है कि आप रुकना बंद कर दें। और आप तब तक नहीं रुकेंगे जब तक आप उन बाधाओं को पहले ही साफ कर देंगे जो आपको रोकने वाली थीं।
तो दोस्तों 'स्टार्ट एट द एंड' सिर्फ एक किताब नहीं है बल्कि यह बिजनेस करने का एक नया चश्मा है। अगर आप आज भी वही पुराने घिसे-पिटे तरीके अपना रहे हैं तो आप सिर्फ भीड़ का हिस्सा बने रहेंगे। अंत को सामने रखिये ढांचा पहले तैयार कीजिये और बाधाओं को जड़ से उखाड़ दीजिये। तभी आप उस लेवल पर पहुँच पाएंगे जहाँ दुनिया आपको फॉलो करेगी। याद रखिये बिजनेस में वही राजा बनता है जो अपनी चालें पीछे से चलना जानता है। अब उठिये और अपनी जीत की कहानी का आखिरी पन्ना आज ही लिख दीजिये।
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