Taking Smart Risks (Hindi)


क्या आप अभी भी वही घिसी पिटी लाइफ जी रहे हैं जहाँ रिस्क के नाम पर आप सिर्फ अपनी चाय में बिस्किट डुबाने का ही दम रखते हैं। बधाई हो। आप बहुत जल्द एक ऐसे फेलियर बनने वाले हैं जिसका जिक्र कोई नहीं करेगा क्योंकि आपने कभी कुछ अलग करने की हिम्मत ही नहीं की। स्मार्ट रिस्क न लेना ही वह गड्ढा है जिसमें आप खुशी खुशी गिर रहे हैं।

लेकिन रुकिए। अभी भी देर नहीं हुई है। डग सनहाइम की यह किताब आपको वह सीक्रेट सिखाएगी जिससे आप डर को अपना नौकर बना लेंगे। चलिए जानते हैं वह ३ लेसन जो आपकी सोच और लाइफ दोनों को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : रिस्क न लेना ही सबसे बड़ा खतरा है

अगर आप यह सोचकर खुश हैं कि आप बहुत सेफ खेल रहे हैं तो यकीन मानिए आप उस टाइटैनिक जहाज पर बैठे हैं जो डूबेगा तो जरूर पर आपको भागने का मौका भी नहीं देगा। असल में दुनिया में सबसे बड़ा रिस्क वह है जो आप कभी लेते ही नहीं। हमारी इंडियन मिडिल क्लास लाइफ में हमें सिखाया जाता है कि बेटा संभल कर चलो। पैर उतने ही पसारो जितनी लंबी चादर हो। लेकिन डग सनहाइम कहते हैं कि अगर चादर छोटी है तो पैर सिकोड़कर बैठने से अच्छा है कि नई चादर बुनने का रिस्क लिया जाए।

जरा सोचिए। आप एक ऐसी नौकरी में फंसे हैं जहाँ आपका बॉस आपको हर रोज एक पुरानी रिकॉर्डिंग की तरह वही बातें सुनाता है। आप अंदर से मर रहे हैं पर बाहर से स्माइल दे रहे हैं क्योंकि आपको लगता है कि नौकरी छोड़ना रिस्क है। भाई साहब। असली रिस्क तो वह है जो आप अपनी ग्रोथ और मेंटल पीस को दांव पर लगाकर ले रहे हैं। आप उस पंखे की तरह बन गए हैं जो घूम तो बहुत जोर से रहा है लेकिन अपनी जगह से एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पा रहा।

मान लीजिए आपका एक दोस्त है चिंटू। चिंटू ने अपनी पूरी जवानी एफडी (FD) कराने में निकाल दी क्योंकि उसे शेयर मार्केट से डर लगता था। उसे लगा वह बहुत स्मार्ट है। दस साल बाद पता चला कि महंगाई ने उसकी एफडी की वैल्यू उतनी ही छोड़ दी है जितनी आज के दौर में एक समोसे की होती है। वहीं दूसरी तरफ राहुल था जिसने थोडा स्मार्ट रिस्क लिया। उसने सीखा। समझा और फिर इन्वेस्ट किया। आज राहुल अपनी लाइफ एन्जॉय कर रहा है और चिंटू अभी भी कैलकुलेटर लेकर बैठा है कि पैसे गए तो गए कहाँ।

स्मार्ट रिस्क का मतलब यह नहीं कि आप बिना सोचे समझे छत से कूद जाएं और उम्मीद करें कि पंख निकल आएंगे। इसका मतलब है कि आप खतरे को पहचानें और उससे निपटने का इंतजाम पहले ही कर लें। आपको सेफ्टी और डेंजर के बीच का वह छोटा सा रास्ता ढूंढना होगा जहाँ दुनिया की सारी तरक्की छिपी है। अगर आप आज कुछ नया ट्राई करने से डर रहे हैं तो आप कल की सफलता को अभी से टाटा बाय बाय कह दीजिए। रिस्क लीजिए पर दिमाग लगाकर। क्योंकि किस्मत भी उन्हीं का साथ देती है जिनके पास जिगरा और दिमाग दोनों का कॉम्बिनेशन होता है।


लेसन २ : अकेले उड़ान मत भरिए अपनी टीम को साथ जोड़िए

अक्सर लोग सोचते हैं कि लीडर बनने का मतलब है कि कंधे पर सारा बोझ अकेले उठा लेना और सुपरमैन की तरह उड़ना। लेकिन हकीकत यह है कि अगर आप अकेले उड़ रहे हैं और नीचे कोई आपको पकड़ने वाला नहीं है तो आपकी लैंडिंग बहुत दर्दनाक होने वाली है। डग सनहाइम हमें समझाते हैं कि स्मार्ट रिस्क वही होता है जिसमें आप अपनी टीम को अंधेरे में नहीं रखते। अगर आप कोई बड़ा कदम उठा रहे हैं और आपकी टीम को पता ही नहीं कि क्या होने वाला है तो आप लीडर नहीं बल्कि एक ऐसे बस ड्राइवर हैं जो अपनी सवारी को बिना बताए पहाड़ी से नीचे उतार रहा है।

सोचिए आप एक प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं। आप जानते हैं कि रास्ता मुश्किल है। अब यहाँ दो तरह के लोग होते हैं। पहले वह जो सोचते हैं कि मैं सबको बोल दूंगा कि सब ठीक है और आखिरी वक्त पर बम फोड़ूंगा। दूसरे वह जो अपनी टीम को पास बुलाते हैं और कहते हैं कि भाई देखो सामने खाई है और हमारे पास सिर्फ एक रस्सी है। जब आप सच बोलते हैं तो आपकी टीम आपके लिए जान लगाने को तैयार हो जाती है। लेकिन अगर आप झूठ बोलकर उन्हें रिस्क में धकेलेंगे तो वह सबसे पहले आपको ही उस खाई में धक्का देंगे।

मान लीजिए आप अपनी शादी की तैयारी कर रहे हैं। आपने रिस्क लिया और बिना किसी को बताए एक ऐसा हलवाई बुक कर लिया जो सिर्फ चाइनीज खाना बनाता है। शादी के दिन जब आपके फूफा और ताऊ पनीर टिक्का ढूंढ रहे होंगे और उन्हें सिर्फ मंचूरियन मिलेगा तो जो हंगामा होगा उसकी जिम्मेदारी सिर्फ आपकी होगी। अगर आपने पहले ही सबको बता दिया होता कि यह एक एक्सपेरिमेंट है तो शायद कोई आपको बचा लेता या कम से कम वह अपने घर से पराठे खाकर आते।

स्मार्ट लीडरशिप का मतलब है ट्रांसपेरेंसी। जब आप रिस्क लेते हैं तो उस रिस्क के पीछे की वजह और उससे होने वाले नुकसान को सबके साथ शेयर करें। इससे न सिर्फ लोगों का आप पर भरोसा बढ़ता है बल्कि आपको नए आइडिया भी मिलते हैं। हो सकता है जिस गड्ढे को आप देख न पा रहे हों उसे आपकी टीम का कोई जूनियर देख ले। अपनी टीम को कॉन्फिडेंस में लेना कोई कमजोरी नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी पावर है। अगर आप चाहते हैं कि रिस्क लेने के बाद जीत आपकी हो तो अपनी टीम को उस जीत का हिस्सेदार पहले ही बना लीजिए।


लेसन ३ : फेलियर को अपना पर्सनल ट्रेनर बना लीजिए

ज्यादातर लोग रिस्क लेने से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वह फेल हो गए तो दुनिया उन पर हंसेगी। लोग कहेंगे कि देखो बड़ा आया था स्मार्ट रिस्क लेने वाला। लेकिन सच तो यह है कि अगर आप कभी फेल नहीं हुए तो इसका मतलब है कि आपने कभी अपनी लिमिट्स को धक्का ही नहीं दिया। डग सनहाइम कहते हैं कि एक स्मार्ट रिस्क लेने वाला इंसान हार को एक अंत नहीं बल्कि एक कीमती फीडबैक की तरह देखता है। फेल होना कोई पाप नहीं है। पाप तो यह है कि आप उस फेलियर से कुछ सीखें बिना ही बैठ जाएं या वही गलती दोबारा कर दें।

कल्पना कीजिए कि आप पहली बार साइकिल चलाना सीख रहे हैं। आप गिरते हैं और आपके घुटने छिल जाते हैं। अब यहाँ आपके पास दो ऑप्शन हैं। या तो आप साइकिल को लात मारें और कहें कि यह मेरे बस की बात नहीं है। या फिर आप यह देखें कि आप गिरे क्यों। शायद आपका बैलेंस बिगड़ा था या आपने ब्रेक गलत टाइम पर मारा था। लाइफ के रिस्क भी बिल्कुल ऐसे ही होते हैं। जब आप गिरते हैं तो जमीन आपको यह नहीं बता रही होती कि आप बेकार हैं। वह आपको यह बता रही होती है कि अगली बार आपको पैर कहाँ और कैसे रखना है।

हमारे मोहल्ले के शर्मा जी को ही ले लीजिए। उन्होंने जोश में आकर एक जिम खोला। लेकिन उन्होंने लोकेशन ऐसी चुनी जहाँ सामने ही छोले भटूरे की मशहूर दुकान थी। तीन महीने में जिम बंद हो गया क्योंकि लोग वर्कआउट करने के बजाय भटूरे खाने चले जाते थे। अब शर्मा जी चाहते तो जिमिंग को ही कोस सकते थे। पर उन्होंने स्मार्ट रिस्क लिया। उन्होंने उस जगह को एक डाइट क्लिनिक में बदल दिया और छोले भटूरे वालों को ही अपना क्लाइंट बना लिया। यह होता है फेलियर को इस्तेमाल करना।

अगर आपका कोई प्लान फ्लॉप हो जाता है तो उदास होकर रजाई ओढ़कर मत सो जाइए। उस प्लान का पोस्टमार्टम कीजिए। यह देखिए कि कहाँ चूक हुई। क्या आपका अंदाजा गलत था या आपकी तैयारी अधूरी थी। जब आप अपनी हार का विश्लेषण करते हैं तो आप असल में अगले रिस्क के लिए खुद को तैयार कर रहे होते हैं। एक शार्प लीडर कभी यह नहीं कहता कि मुझे हार से डर लगता है। वह कहता है कि मुझे बिना सीखे हारने से डर लगता है। रिस्क लीजिए। फेल होइए। और फिर पहले से ज्यादा स्मार्ट बनकर वापस आइए।


तो दोस्तों, अब चॉइस आपकी है। क्या आप पूरी जिंदगी किनारे पर बैठकर दूसरों की कामयाबी की लहरें देखना चाहते हैं। या फिर आप लहरों से टकराकर अपनी मंजिल खुद बनाना चाहते हैं। याद रखिए। स्मार्ट रिस्क लेना कोई इत्तेफाक नहीं बल्कि एक कला है जिसे आपको सीखना ही होगा। अगर आप आज अपनी लाइफ में एक छोटा सा भी रिस्क लेने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं तो आप अपनी आने वाली बड़ी जीत को खुद ही रिजेक्ट कर रहे हैं।

उठिए। डर का सामना कीजिए और कम से कम एक ऐसा कदम आज ही उठाइए जो आपको आपके कंफर्ट जोन से बाहर निकाले। कमेंट में हमें बताइए कि वह कौन सा रिस्क है जिसे लेने से आप आज तक डरते रहे हैं। क्या पता आपका एक कमेंट किसी और को भी हिम्मत दे जाए। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर जरूर करें जो बहुत ज्यादा सोचते हैं पर करते कुछ नहीं। चलिए साथ मिलकर रिस्क लेते हैं और जीतते हैं।

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