क्या आप भी अपनी सड़ी हुई ९ से ५ की नौकरी में गधे की तरह घिस रहे हैं और सोचते हैं कि रिटायरमेंट के बाद मजे करेंगे। बधाई हो आप अपनी जिंदगी का सबसे हसीन वक्त कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं क्योंकि टिम फेरिस की ये बातें न जानकर आप खुद को गरीबी और थकान के दलदल में धकेल रहे हैं।
अगर आपको लगता है कि अमीर बनने के लिए बुढ़ापे तक रगड़ना जरूरी है तो आप गलत दुनिया में जी रहे हैं। आज हम द ४ आवर वर्कवीक के उन ३ बड़े लेसन के बारे में जानेंगे जो आपकी लाइफ बदल देंगे।
लेसन १ : बिजी होने का ढोंग छोड़ो और प्रोडक्टिव बनो
क्या आपको भी लगता है कि ऑफिस में १० घंटे बैठकर कीबोर्ड तोड़ना ही असली मेहनत है। अगर हाँ तो समझ लीजिए कि आप एक बहुत बड़े भ्रम के शिकार हैं। हमारे देश में एक अजीब बीमारी है जिसे हम बिजी रहने का नशा कहते हैं। लोग सुबह से शाम तक ईमेल चेक करते हैं फालतू की मीटिंग्स में चाय पीते हैं और शाम को थककर घर आते हैं तो लगता है कि जैसे उन्होंने पहाड़ तोड़ दिया हो। पर सच तो ये है कि आपने सिर्फ अपना वक्त बर्बाद किया है। टिम फेरिस अपनी किताब में पैरेटो प्रिंसिपल यानी ८० २० रूल की बात करते हैं। इसका सीधा मतलब ये है कि आपके दिन भर के सिर्फ २० परसेंट काम ही आपको ८० परसेंट रिजल्ट देते हैं। बाकी का ८० परसेंट काम सिर्फ कचरा है जो आपको बिजी रखता है पर आपको अमीर नहीं बनाता।
जरा सोचिए आपके ऑफिस का वो शर्मा जी जो हर वक्त फाइलों के बीच दबा रहता है और बॉस के सामने हांफता रहता है। क्या वो सच में कंपनी चला रहा है। नहीं वो बस खुद को ये यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा है कि वो बहुत जरूरी इंसान है। असलियत में जो लोग स्मार्ट होते हैं वो सुबह उठकर अपने सबसे जरूरी काम निपटाते हैं और बाकी का दिन मजे करते हैं। अगर आप दिन भर में ५० ईमेल का जवाब दे रहे हैं तो आप काम नहीं कर रहे बल्कि आप दूसरों के एजेंडे पर नाच रहे हैं। हर वह काम जो आपको आपके बड़े गोल की तरफ नहीं ले जा रहा वह एक डिस्ट्रैक्शन है।
कुछ लोगों को तो नोटिफिकेशन देखने की ऐसी खुजली होती है जैसे कि अगर उन्होंने अभी रिप्लाई नहीं किया तो दुनिया का चक्का जाम हो जाएगा। ये जो डिजिटल मजदूरी आप कर रहे हैं इसे छोड़िए। टिम फेरिस कहते हैं कि इन्फॉर्मेशन डाइट पर जाओ। हर फालतू खबर और हर बेकार की मीटिंग से खुद को बचाओ। जब आप कम काम करेंगे और सिर्फ क्वालिटी काम करेंगे तभी आपके पास वह आजादी आएगी जिसका सपना आप हर सोमवार की सुबह देखते हैं। असल में आजादी का मतलब ये नहीं है कि आप कुछ न करें बल्कि आजादी का मतलब ये है कि आप सिर्फ वही करें जो जरूरी है।
अपनी लाइफ का ऑडिट कीजिए। देखिए कि कौन से ऐसे काम हैं जो आपका खून पी रहे हैं पर बदले में फूटी कौड़ी भी नहीं दे रहे। उन कामों को लात मारिए। बिजी होना एक आलस का रूप है क्योंकि आप सोचने की मेहनत नहीं करना चाहते कि असली जरूरी काम क्या है। जब आप इस २० परसेंट के जादू को समझ जाएंगे तो आपको समझ आएगा कि ९ से ५ की कैद सिर्फ दिमाग की उपज है। आप ४ घंटे में वह कर सकते हैं जो लोग ४० घंटे में नहीं कर पाते। बस शर्त ये है कि आपको शर्मा जी बनना छोड़ना होगा और अपने समय का असली मालिक बनना होगा।
लेसन २ : आउटसोर्सिंग का जादू और दूसरों से काम करवाना सीखो
जब आप पहले लेसन में फालतू के कामों को लात मार देते हैं तो आपके पास बचता है सिर्फ जरूरी काम। अब सवाल ये है कि क्या वो जरूरी काम भी आपको ही करना पड़ेगा। टिम फेरिस कहते हैं कि अगर आप अपनी लाइफ के सीईओ बनना चाहते हैं तो आपको छोटे कामों का मोह त्यागना होगा। हमारे यहाँ मिडिल क्लास लड़कों में एक बड़ी समस्या है कि हमें लगता है कि हमसे बेहतर ये काम कोई नहीं कर सकता। चाहे घर का बिजली का बिल भरना हो या ऑफिस की डेटा एंट्री करना हम अपनी टांग हर जगह फंसाते हैं। सच तो ये है कि आप अपना कीमती समय उन कामों में लगा रहे हैं जिनकी कीमत बाजार में शायद १०० रुपये घंटा भी नहीं है।
जरा सोचिए आप एक ऐसे इंसान हैं जो भविष्य में करोड़ों कमाना चाहता है लेकिन आप अभी भी दो घंटे लाइन में लगकर राशन कार्ड अपडेट करवा रहे हैं। क्या ये समझदारी है। नहीं ये बेवकूफी है। टिम फेरिस आउटसोर्सिंग और वर्चुअल असिस्टेंट की बात करते हैं। उनका कहना है कि अपनी लाइफ के उन सभी कामों की लिस्ट बनाओ जो कोई और भी कर सकता है और उन्हें दूसरों को सौंप दो। लोग अक्सर रोते हैं कि उनके पास टाइम नहीं है पर वही लोग सोशल मीडिया पर दूसरों की पोस्ट पर बहस करने के लिए घंटों निकाल लेते हैं।
अगर आप अपने काम को डेलीगेट नहीं कर रहे तो आप खुद के बिजनेस के मालिक नहीं बल्कि खुद की कंपनी के सबसे सस्ते नौकर हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भाई दूसरों को पैसे क्यों देने जब मैं खुद कर सकता हूँ। अरे भाई आप पैसे नहीं बचा रहे आप अपनी जिंदगी के वो कीमती पल गँवा रहे हैं जिनमें आप कुछ बड़ा सोच सकते थे या अपनी फैमिली के साथ क्वालिटी टाइम बिता सकते थे। अपनी ईगो को थोड़ा साइड में रखिए। ये मत सोचिए कि आपके बिना ऑफिस या घर जलकर राख हो जाएगा। ट्रस्ट मानिए दुनिया आपके बिना भी बहुत अच्छे से चल सकती है।
हम इंडियंस को हर चीज में हाथ आजमाने की आदत है। हम प्लंबर भी खुद बनना चाहते हैं और अकाउंटेंट भी। जबकि स्मार्ट तरीका ये है कि आप सिर्फ वही करें जिसमें आप बेस्ट हैं। बाकी सब कुछ आउटसोर्स कर दें। जब आप दूसरों को काम सौंपना शुरू करते हैं तो आप असल में अपनी आजादी खरीद रहे होते हैं। ४ घंटे का वर्कवीक तभी मुमकिन है जब आपके पास एक ऐसी टीम या सिस्टम हो जो आपके सोते वक्त भी आपके लिए काम करे। ये सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है पर अपनी लाइफ के छोटे मोटे सरदर्द दूसरों को बेच देना ही अमीरी की पहली सीढ़ी है।
लेसन ३ : ऑटोमेशन और लिबरेशन यानी अपनी कैद से आजादी
अब तक आपने फालतू काम छोड़ना और दूसरों से काम करवाना सीख लिया है। लेकिन असली मजा तब आता है जब आपको काम करने की जरूरत ही न पड़े और पैसा आपके बैंक अकाउंट में खुद ब खुद आता रहे। टिम फेरिस इसे ऑटोमेशन कहते हैं। हमारे समाज में सिखाया जाता है कि जब तक माथे पर पसीना न आए तब तक कमाई हलाल नहीं होती। लेकिन सच तो ये है कि कोल्हू का बैल भी दिन भर पसीना बहाता है पर शाम को उसे सिर्फ घास ही मिलती है। अगर आप भी उसी बैल की तरह सिर्फ मेहनत पर भरोसा कर रहे हैं तो आप कभी उस न्यू रिच कम्युनिटी का हिस्सा नहीं बन पाएंगे जो दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर मजे कर रहे हैं।
ऑटोमेशन का मतलब है एक ऐसा सिस्टम खड़ा करना जो इंसान की दखलंदाजी के बिना चले। आज के डिजिटल युग में ये बहुत आसान है। मान लीजिए आप कोई सर्विस बेच रहे हैं तो उसे ऐसे सेट कीजिए कि ऑर्डर लेने से लेकर डिलीवरी तक सब कुछ सॉफ्टवेयर या आपकी आउटसोर्स की हुई टीम संभाले। आप बस महीने में एक बार प्रॉफिट चेक करें। लोग कहते हैं कि बिजनेस संभालना बहुत स्ट्रेस का काम है। भाई स्ट्रेस तब होता है जब आप हर छोटी चीज में अपनी नाक घुसाते हैं। अगर आपका बिजनेस आपके बिना दो दिन भी नहीं चल सकता तो आप बिजनेस ओनर नहीं बल्कि एक दुकान के चौकीदार हैं।
लोग वेकेशन पर भी जाते हैं तो लैपटॉप साथ ले जाते हैं ताकि बीच किनारे बैठकर भी बॉस की गालियां सुन सकें। इसे वेकेशन नहीं बल्कि लोकेशन चेंज करके गुलामी करना कहते हैं। टिम फेरिस कहते हैं कि लिबरेशन यानी आजादी का मतलब सिर्फ पैसे होना नहीं है बल्कि यह चॉइस होना है कि आप कब कहाँ और किसके साथ अपना वक्त बिताते हैं। अगर आपके पास करोड़ों रुपये हैं पर उन्हें खर्च करने के लिए आपको बॉस से छुट्टी मांगनी पड़ रही है तो आपसे बड़ा गरीब कोई नहीं है।
अपनी लाइफ को डिजाइन कीजिए। अपनी इनकम को ऑटो पायलट पर डालिए और निकल पड़िए दुनिया देखने। जो लोग कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद घूमेंगे उन्हें बता दूँ कि ६० की उम्र में घुटनों के दर्द के साथ पहाड़ चढ़ना मुमकिन नहीं होगा। असली लाइफ अभी है। इस ४ घंटे के वर्कवीक का असली मकसद यही है कि आप काम के लिए न जिएं बल्कि जीने के लिए थोड़ा सा काम करें। जब आप ऑटोमेशन और डेलिगेशन को मास्टर कर लेते हैं तो आप उस पिंजरे का दरवाजा खोल देते हैं जिसमें आप सालों से बंद थे। याद रखिए समय ही असली दौलत है और इसे बचाना ही आपकी सबसे बड़ी कामयाबी है।
जिंदगी ९ से ५ की डेस्क पर बैठने के लिए बहुत छोटी है। क्या आप भी वही पुरानी घिसी पिटी जिंदगी जीना चाहते हैं या आज से ही अपनी आजादी का प्लान बनाना शुरू करेंगे। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो ऑफिस में बैठकर सिर्फ चाय और गपशप से अपना दिन काट रहे हैं। नीचे कमेंट में बताएं कि आपका वो कौन सा एक काम है जिसे आप आज ही आउटसोर्स करना चाहते हैं। चलिए साथ मिलकर न्यू रिच का हिस्सा बनते हैं।
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