क्या आपको लगता है कि आप बहुत स्मार्ट हैं। असल में आप अपनी हर डील में पैसा और इज्जत दोनों गँवा रहे हैं क्योंकि आपको नेगोशिएशन का न भी नहीं पता। जब सामने वाला आपको चूना लगाकर निकल जाता है और आप बस मुस्कुराते रह जाते हैं तब समझ आता है कि आपकी स्किल्स कितनी खोखली हैं।
आज की भागदौड़ वाली दुनिया में अगर आप माइकल व्हीलर की दी हुई तरकीबें नहीं जानते तो आप बस दूसरों के हाथों की कठपुतली बनकर रह जाएंगे। चलिए इस किताब के तीन सबसे बड़े लेसन से समझते हैं कि आखिर एक हारी हुई बाजी को अपनी जीत में कैसे बदला जाता है।
लेसन १ : तैयारी और फ्लेक्सिबिलिटी का बैलेंस
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो किसी भी मीटिंग या बहस में जाने से पहले आईने के सामने खड़े होकर घंटों रिहर्सल करते हैं। आपको लगता है कि आपने जो भारी भरकम शब्द और दलीलें रटी हैं वह सामने वाले को चित कर देंगी। लेकिन जैसे ही आप मैदान में उतरते हैं सामने वाला कोई ऐसा सवाल दाग देता है जिसका आपकी स्क्रिप्ट में कहीं नामोनिशान नहीं होता। बस वहीं आपका कॉन्फिडेंस किसी फटे हुए गुब्बारे की तरह फुस्स हो जाता है और आप हकलाने लगते हैं। माइकल व्हीलर कहते हैं कि नेगोशिएशन कभी भी किसी फिक्स स्क्रिप्ट पर नहीं चलता। यह एक लाइव जैज म्यूजिक या एक डांस की तरह है जहाँ आपको पार्टनर के स्टेप्स के हिसाब से खुद को ढालना पड़ता है।
सोचिए आप अपने बॉस से सैलरी बढ़ाने की बात करने गए हैं। आपने पूरी रात बैठकर अपनी उपलब्धियों की लिस्ट बनाई है। आप ऑफिस में कदम रखते हैं और बॉस पहले ही बोल देता है कि कंपनी अभी बड़े घाटे में चल रही है और शायद कुछ लोगों की छंटनी करनी पड़े। अब अगर आप अपनी वही रटी हुई लाइनें बोलेंगे कि मैंने पिछले साल बहुत अच्छा काम किया है तो यकीन मानिए आप ऑफिस से तरक्की का लेटर नहीं बल्कि पिंक स्लिप लेकर बाहर आएंगे। यहाँ काम आती है फ्लेक्सिबिलिटी। स्मार्ट नेगोशिएटर वह नहीं है जिसके पास हर बात का जवाब पहले से तैयार हो बल्कि वह है जो माहौल को भांपकर अपनी चाल बदल ले। अगर बॉस ने घाटे की बात की है तो आपको तुरंत अपना गियर बदलना होगा और बात इस पर लानी होगी कि आप कंपनी का पैसा बचाने में कैसे मदद कर सकते हैं।
ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक युद्ध समझते हैं जहाँ उन्हें बस अपनी बात मनवानी होती है। वह सोचते हैं कि अगर वह थोड़े भी लचीले हुए तो सामने वाला उन्हें कमजोर समझ लेगा। लेकिन असलियत में जो पेड़ सबसे ज्यादा सख्त होता है वही तेज हवा में सबसे पहले टूटता है। मान लीजिए आप एक पुरानी कार बेच रहे हैं। आपने मन में ठान लिया है कि 5 लाख से एक रुपया कम नहीं लेंगे। एक खरीदार आता है जो आपको साढ़े चार लाख दे रहा है लेकिन साथ ही वह आपको एक ऐसी बिजनेस डील का ऑफर दे रहा है जिससे आप भविष्य में 10 लाख कमा सकते हैं। अब अगर आप अपने 5 लाख के अडियल रवैये पर चिपके रहे तो आप अपनी ईगो को तो संतुष्ट कर लेंगे लेकिन असल फायदे से हाथ धो बैठेंगे।
तैयारी करना बहुत जरूरी है लेकिन उस तैयारी को जंजीर मत बनने दीजिए। आपको पता होना चाहिए कि आपका लक्ष्य क्या है लेकिन उस लक्ष्य तक पहुँचने का रास्ता बदला जा सकता है। नेगोशिएशन एक चैओटिक यानी उथल पुथल वाली जगह है। यहाँ हर पल जानकारी बदलती है और सामने वाले की नीयत भी। अगर आप एक रोबोट की तरह व्यवहार करेंगे तो आप कभी सफल नहीं हो पाएंगे। आपको एक जासूस की तरह बनना होगा जो हर छोटे इशारे को समझता है। सामने वाले की बॉडी लैंग्वेज देखिए और उसकी आवाज की टोन पर ध्यान दीजिए। क्या वह घबराया हुआ है। क्या वह जल्दी में है। अगर आप इन चीजों को नहीं पकड़ पा रहे तो आपकी सारी रिसर्च धरी की धरी रह जाएगी।
नेगोशिएशन में सबसे बड़ी गलती यह होती है कि हम केवल अपनी जीत के बारे में सोचते हैं। हम भूल जाते हैं कि सामने वाला भी इंसान है और वह भी कुछ हासिल करने आया है। जब आप थोड़े फ्लेक्सिबल होते हैं तो आप सामने वाले के लिए भी जगह बनाते हैं। इससे एक ऐसा भरोसा पैदा होता है जो किसी भी कागजी एग्रीमेंट से ज्यादा कीमती है। याद रखिए एक सफल नेगोशिएटर वह नहीं है जो बहस जीत जाए बल्कि वह है जो एक ऐसा एग्रीमेंट बना ले जिससे कल को दोबारा साथ काम करने के दरवाजे बंद न हों। तो अगली बार जब आप किसी डील के लिए जाएं तो अपनी स्क्रिप्ट को घर छोड़कर जाइए और अपने दिमाग के साथ साथ अपनी नजरें भी खुली रखिए।
लेसन २ : इमोशनल स्टेबिलिटी और माइंडफुलनेस
क्या आपको कभी ऐसा लगा है कि किसी बहस के बीच में आपका चेहरा लाल पड़ रहा है और आपका दिल इतनी जोर से धड़क रहा है जैसे कोई डीजे बज रहा हो। और फिर गुस्से में आकर आप कुछ ऐसा बोल देते हैं जिसका अफसोस आपको अगले दस साल तक रहता है। माइकल व्हीलर कहते हैं कि नेगोशिएशन की टेबल पर सबसे बड़ा दुश्मन सामने वाला इंसान नहीं बल्कि आपका अपना बेकाबू गुस्सा और डर है। अगर आप खुद को काबू में नहीं रख सकते तो आप किसी और को अपनी बात मानने के लिए कभी मजबूर नहीं कर पाएंगे। ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक कुश्ती का मैच समझते हैं जहाँ चिल्लाने वाला जीत जाता है। लेकिन असल में जो जितना शांत रहता है वही बाजी मारता है।
कल्पना कीजिए आप अपनी सैलरी के लिए बहस कर रहे हैं और आपका बॉस अचानक कह देता है कि आपकी परफॉरमेंस पिछले महीने बहुत बेकार थी। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि आप तुरंत भड़क जाएं और अपनी सफाई देने लगें या बॉस की बुराइयां गिनाने लगें। दूसरा रास्ता यह है कि आप एक लंबी सांस लें और अपनी भावनाओं को साइड में रखकर ठंडे दिमाग से पूछें कि उन्हें ऐसा क्यों लगा। जब आप शांत रहते हैं तो आप सामने वाले की पावर छीन लेते हैं। गुस्सा एक धुंध की तरह होता है जो आपकी अक्ल पर पर्दा डाल देता है। अगर आप उस धुंध में गाड़ी चलाएंगे तो एक्सीडेंट होना पक्का है।
नेगोशिएशन में माइंडफुलनेस का मतलब यह नहीं है कि आपको वहां बैठकर योग करना है। इसका मतलब है कि आपको हर पल यह पता होना चाहिए कि आपके अंदर क्या चल रहा है। अगर आपको लग रहा है कि सामने वाला आपको जानबूझकर उकसा रहा है तो समझ जाइए कि यह उसकी एक चाल है। वह चाहता है कि आप आपा खो दें और कोई गलती कर बैठें। जो इंसान अपनी भावनाओं का गुलाम है उसे कोई भी बच्चा भी बेवकूफ बना सकता है। क्या आप चाहते हैं कि कोई आपको उंगली पर नचाए। बिल्कुल नहीं। तो अपनी भावनाओं को एक कमरे में बंद कर दीजिए और अपनी लॉजिक वाली खिड़की को खुला रखिए।
एक और मजेदार बात यह है कि हम अक्सर अपनी हार के डर से इतने डरे होते हैं कि हम नेगोशिएशन शुरू होने से पहले ही हार मान लेते हैं। हमें लगता है कि अगर हमने ज्यादा मांग लिया तो सामने वाला बुरा मान जाएगा या हमें नौकरी से निकाल देगा। यह डर ही आपकी सबसे बड़ी कमजोरी है। एक प्रोफेशनल नेगोशिएटर जानता है कि ना सुनने में कोई बुराई नहीं है। ना सिर्फ एक शब्द है कोई अंत नहीं। अगर आप इस डर के साथ टेबल पर बैठेंगे तो आपकी बॉडी लैंग्वेज खुद चीख चीख कर कहेगी कि मैं कमजोर हूँ और मेरा फायदा उठा लो।
ह्यूमर के बिना जिंदगी अधूरी है और नेगोशिएशन भी। जब माहौल बहुत तनावपूर्ण हो जाए तो एक छोटा सा मजाक या एक मुस्कुराहट उस तनाव को बर्फ की तरह पिघला सकती है। लेकिन याद रखिए वह मजाक सामने वाले पर नहीं बल्कि स्थिति पर होना चाहिए। जब आप माहौल को हल्का करते हैं तो सामने वाला अपनी सुरक्षा वाली दीवारें नीचे गिरा देता है। तब असली बातचीत शुरू होती है। अगर आप एक पत्थर की मूर्ति बनकर बैठे रहेंगे तो सामने वाला भी आपसे वैसे ही पेश आएगा। इंसानियत और इमोशनल समझ ही वह चाबी है जो बंद से बंद डील के ताले खोल देती है।
अंत में बस इतना याद रखिए कि नेगोशिएशन एक दिमागी शतरंज है। यहाँ खिलाड़ी वही जीतता है जो अपनी अगली चाल के साथ साथ अपनी धड़कनों पर भी कंट्रोल रखता है। अगर आप खुद को शांत रखना सीख गए तो समझ लीजिए कि आधी जंग आपने वहीं जीत ली है। बाकी आधी जंग तो बस शब्दों का सही चुनाव है जो हम अगले लेसन में सीखेंगे।
लेसन ३ : क्रिएटिव प्रॉब्लम सॉल्विंग
क्या आपने कभी दो बच्चों को एक ही खिलौने के लिए लड़ते देखा है। दोनों को लगता है कि जीत का मतलब है खिलौना पूरी तरह मेरा होना। हम बड़े भी अक्सर नेगोशिएशन की टेबल पर यही बचकानी हरकत करते हैं। हमें लगता है कि नेगोशिएशन एक 'जीरो-सम गेम' है, यानी अगर सामने वाला एक रुपया कमाएगा तो मेरी जेब से एक रुपया कम होगा। माइकल व्हीलर कहते हैं कि यह सोच ही आपकी सबसे बड़ी हार है। एक असली मास्टर नेगोशिएटर वह नहीं है जो केक का सबसे बड़ा टुकड़ा छीन ले, बल्कि वह है जो अपनी क्रिएटिविटी से उस केक को ही बड़ा कर दे ताकि दोनों का पेट भर सके।
मान लीजिए आप एक फ्रीलांस प्रोजेक्ट के लिए क्लाइंट से बात कर रहे हैं। क्लाइंट का बजट 50 हजार है और आप 80 हजार से कम में काम नहीं करना चाहते। अब आप दोनों एक पत्थर की दीवार की तरह अपनी-अपनी पोजीशन पर अड़ गए हैं। आप सोच रहे हैं कि यह क्लाइंट कितना कंजूस है और क्लाइंट सोच रहा है कि आप कितने लालची हैं। यहाँ पर एक आम इंसान हार मानकर उठ जाएगा। लेकिन एक क्रिएटिव नेगोशिएटर पूछेगा कि असल समस्या क्या है। शायद क्लाइंट के पास कैश की कमी है लेकिन उसके पास बहुत बड़ा नेटवर्क है। आप उसे ऑफर दे सकते हैं कि ठीक है, आप मुझे 50 हजार ही दीजिए लेकिन अगले तीन महीने तक आप मुझे दो नए बड़े क्लाइंट्स से इंट्रोड्यूस कराएंगे। अब देखिए, आपने अपना घाटा भी कवर कर लिया और क्लाइंट को भी बजट की चिंता नहीं रही। इसे कहते हैं दिमाग की बत्ती जलाना।
ज्यादातर लोग नेगोशिएशन में केवल 'क्या' पर ध्यान देते हैं, 'क्यों' पर नहीं। आपको यह समझना होगा कि सामने वाला जो मांग रहा है, वह उसके पीछे की असली वजह क्या है। अगर कोई दुकानदार आपको डिस्काउंट नहीं दे रहा, तो शायद उसकी वजह यह नहीं कि वह पैसे बचाना चाहता है, बल्कि शायद उसे ऊपर से सख्त आर्डर मिले हैं। अगर आप उसकी मजबूरी समझ लें, तो आप उसे किसी और तरीके से राजी कर सकते हैं, जैसे कि आप उससे ज्यादा सामान खरीद लें या उसे कैश में पेमेंट कर दें। जब आप सामने वाले के जूतों में पैर रखकर देखते हैं, तो आपको वह रास्ते दिखने लगते हैं जो पहले बंद थे।
नेगोशिएशन में सरकजम और ह्यूमर का तड़का भी बहुत जरूरी है। जब बातचीत एकदम ठंडी पड़ जाए और लगे कि अब कुछ नहीं हो सकता, तो अपनी ईगो को थोड़ा साइड में रखिए। अगर आप रोबोट की तरह बस आंकड़े फेंकते रहेंगे, तो सामने वाला भी अपना डिफेंस बढ़ा लेगा। लेकिन अगर आप अपनी बातचीत में थोड़ी इंसानियत और क्रिएटिविटी लाएंगे, तो डील क्लोज होने के चांस बढ़ जाते हैं। याद रखिए, दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका कोई तीसरा रास्ता न हो। बस हम अपनी जिद की वजह से उस रास्ते को देख नहीं पाते।
जब आप सामने वाले को अपना दुश्मन समझने के बजाय अपना पार्टनर समझने लगते हैं, तो जादू होता है। आप दोनों मिलकर एक ऐसी समस्या का समाधान ढूंढ रहे होते हैं जिससे दोनों का भला हो। माइकल व्हीलर की यह किताब हमें सिखाती है कि नेगोशिएशन का असली मकसद जीतना नहीं, बल्कि एक ऐसा एग्रीमेंट बनाना है जो लंबे समय तक चले। अगर आपने किसी को बेवकूफ बनाकर आज डील जीत भी ली, तो कल वह इंसान आपके साथ कभी काम नहीं करेगा। और इस छोटी सी दुनिया में आपकी साख ही आपकी असली दौलत है।
तो दोस्तों, अगली बार जब आप किसी मुश्किल मोल-भाव में फंसें, तो घबराइए मत। अपनी स्क्रिप्ट को भूल जाइए, अपने गुस्से को ठंडा रखिए और अपनी क्रिएटिविटी के घोड़े दौड़ाइए। याद रखिए, यह दुनिया एक मेला है और यहाँ हर चीज का नेगोशिएशन हो सकता है। बस आपको सही कला आनी चाहिए। अपनी स्किल्स को धार दीजिए और आज से ही अपनी लाइफ की हर डील के मास्टर बन जाइए। अब वक्त है एक्शन लेने का, क्योंकि पढ़ तो सब लेते हैं, लेकिन असली खिलाड़ी वही है जो मैदान में उतरकर खेलता है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#NegotiationSkills #BookSummaryHindi #SuccessMindset #CommunicationTips #DYBooks
_