क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो इन्वेस्टर के पीछे ऐसे भागते हैं जैसे पड़ोस वाली पिंकी के पीछे गलियों के लड़के भागते हैं। अपनी इज्जत और पैसा दोनों दांव पर लगा कर आप किसी और की शर्तों पर नाच रहे हैं। मुबारक हो आप अपने ही बिजनेस में नौकर बन चुके हैं।
आज हम जॉन मुलिन्स की शानदार बुक द कस्टमर फंडेड बिजनेस से यह समझेंगे कि कैसे आप बिना किसी बाहर वाले की भीख मांगे अपने बिजनेस को सीधे कस्टमर के पैसे से खड़ा कर सकते हैं। चलिए जानते हैं वो 3 जादुई लेसन जो आपके स्टार्टअप की किस्मत बदल देंगे।
लेसन १ : इन्वेस्टर के तलवे चाटना बंद करो और कस्टमर को भगवान बनाओ
आजकल के स्टार्टअप कल्चर में एक बहुत बड़ी बीमारी फैली है जिसे हम फंडिंग की खुजली कह सकते हैं। हर दूसरा इंसान चाय की टपरी पर बैठकर यही डिस्कस कर रहा है कि भाई बस एक इन्वेस्टर मिल जाए तो आग लगा दूंगा। सच तो यह है कि आप आग नहीं बस अपनी आजादी की होली जला रहे हैं। जब आप किसी वेंचर कैपिटलिस्ट से पैसा लेते हैं तो आप अपने बिजनेस के मालिक नहीं रहते बल्कि उनके एक महंगे कर्मचारी बन जाते हैं। जॉन मुलिन्स कहते हैं कि दुनिया का सबसे बेहतरीन इन्वेस्टर कोई सूट-बूट वाला अमीर आदमी नहीं बल्कि वह कस्टमर है जो आपकी सर्विस के लिए आपको पैसे देता है।
जरा सोचिए जब आप इन्वेस्टर के पास जाते हैं तो आप अपनी आत्मा बेचने की डील कर रहे होते हैं। वह आपको बताएगा कि कब ऑफिस जाना है और कब अपनी ग्रोथ की रिपोर्ट दिखानी है। इसके उलट अगर आप कस्टमर से पैसा लेते हैं तो वह आपसे केवल एक ही चीज मांगता है और वह है क्वालिटी। अगर आपने कस्टमर की प्रॉब्लम सॉल्व कर दी तो वह खुशी-खुशी अपनी जेब ढीली कर देगा। इसे हम मैचमेकर मॉडल भी कह सकते हैं। इसमें आपको अपनी जमीन या घर गिरवी रखने की जरूरत नहीं पड़ती। बस दो लोगों की जरूरत को आपस में मिला दो और बीच में अपना मुनाफा कमा लो।
जैसे मान लीजिए आपने एक ऐसी वेबसाइट बनाई जो मोहल्ले के हलवाइयों और शादियों के ऑर्डर को आपस में जोड़ती है। अब यहाँ आपको खुद लड्डू बनाने की जरूरत नहीं है और न ही दुकान खोलने के लिए किसी इन्वेस्टर से करोड़ों रुपए चाहिए। आपने बस उन लोगों को पकड़ा जिन्हें मिठाई चाहिए थी और उनसे एडवांस पेमेंट ली। उसी पैसे का एक हिस्सा हलवाई को दिया और अपना कमीशन अपनी जेब में रखा। यहाँ कस्टमर ने ही आपकी मार्केटिंग और आपके बिजनेस को फंड किया है।
यही असली आजादी है मेरे दोस्त। लोग अक्सर कहते हैं कि बिना पैसे के बिजनेस शुरू नहीं हो सकता। यह दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है जो उन लोगों ने फैलाया है जो खुद रिस्क लेने से डरते हैं। अगर आपकी सर्विस में दम है तो लोग आपको पैसा देने के लिए लाइन लगाकर खड़े होंगे। इन्वेस्टर के ऑफिस के बाहर धक्के खाने से अच्छा है कि आप अपने कस्टमर की पसंद और नापसंद पर रिसर्च करें। जब कस्टमर का पैसा आपके अकाउंट में आता है तो वह केवल प्रॉफिट नहीं होता बल्कि वह एक सर्टिफिकेट होता है कि आपका आईडिया काम कर रहा है।
सर्कस के शेर बनने से अच्छा है कि आप जंगल के खुले शिकारी बनें। सर्कस में खाना तो टाइम पर मिलता है पर गले में पट्टा भी इन्वेस्टर का ही होता है। कस्टमर फंडेड मॉडल आपको वह ताकत देता है कि आप अपनी शर्तों पर खेल सकें। अगर आप आज यह लेसन समझ गए तो समझो आपने बिजनेस की आधी जंग जीत ली है।
लेसन २ : एडवांस पेमेंट का जादू और खाली जेब से बिजनेस की शुरुआत
अब आप कहेंगे कि भाई कस्टमर तो आजकल एक रुपया उधार नहीं छोड़ता तो वह एडवांस पैसा क्यों देगा। यहीं पर आपकी क्रिएटिविटी और स्मार्टनेस का इम्तिहान होता है। जॉन मुलिन्स इसे पे-इन-एडवांस मॉडल कहते हैं। अगर आप अभी भी इस इंतजार में बैठे हैं कि पहले आप फैक्ट्री लगाएंगे फिर माल बनाएंगे और फिर कोई उसे खरीदेगा तो बधाई हो आप दिवालिया होने की कगार पर खड़े हैं। आज के दौर में समझदार वही है जो कस्टमर की जेब से पैसा तब निकाल ले जब सामान अभी सिर्फ उसके दिमाग में हो।
आपने एयरलाइन टिकट तो बुक की ही होगी। क्या कभी ऐसा हुआ है कि पायलट ने आपसे कहा हो कि भाई पहले दिल्ली पहुँच जाओ फिर पैसे दे देना। बिल्कुल नहीं। आप महीनों पहले अपनी मेहनत की कमाई इंडिगो या एयर इंडिया को थमा देते हैं। उस पैसे से वो अपना तेल भरवाते हैं और स्टाफ की सैलरी देते हैं। मतलब उन्होंने आपका सफर आपके ही पैसों से फंड कर दिया। यही दिमाग आपको अपने छोटे या बड़े बिजनेस में लगाना है। आपको एक ऐसी सर्विस या प्रोडक्ट बनाना है जिसके लिए लोग लाइन लगाकर खड़ा होने को तैयार हों और कहें कि भाई यह पकड़ो पैसे बस मेरा काम पहले कर देना।
अगर आप एक कंसल्टेंट हैं या कोई डिजिटल कोर्स बेच रहे हैं तो कभी भी काम खत्म होने का इंतजार मत करिए। अपनी वैल्यू ऐसी बनाइए कि लोग आपको बुकिंग अमाउंट दें। जब आपके पास कस्टमर का एडवांस पैसा आता है तो आपके ऊपर से कर्ज का बोझ खत्म हो जाता है। आपको किसी बैंक के मैनेजर के सामने गिड़गिड़ाने की जरूरत नहीं पड़ती कि सर मेरा लोन पास कर दो। आपका कस्टमर ही आपका बैंक बन जाता है। और सबसे मजे की बात यह है कि इस बैंक को आपको ब्याज नहीं देना पड़ता बल्कि उसे सिर्फ अच्छी सर्विस देनी पड़ती है।
लेकिन याद रहे इसमें एक बड़ा रिस्क भी है। अगर आपने पैसे लेकर काम खराब किया तो मार्केट में आपकी इज्जत का कचरा होने में देर नहीं लगेगी। कटाक्ष में कहें तो लोग आपके घर के बाहर डंडे लेकर खड़े हो जाएंगे। इसलिए यह मॉडल तभी अपनाएं जब आप अपनी क्वालिटी पर सौ प्रतिशत भरोसा रखते हों। जब आप कस्टमर के पैसे पर बिजनेस बढ़ाते हैं तो आपका कैश फ्लो हमेशा पॉजिटिव रहता है। आपको यह टेंशन नहीं होती कि महीने के आखिर में ऑफिस का किराया कहाँ से आएगा।
तो अगली बार जब कोई आपसे कहे कि बिजनेस शुरू करने के लिए बाप-दादा की जायदाद चाहिए तो उसे प्यार से एक चाय पिलाना और कहना कि भाई तुझे बस एडवांस मांगना नहीं आता। बिजनेस पैसों से नहीं बल्कि भरोसे और कस्टमर की जरूरत से चलता है। अगर आप कस्टमर की कोई ऐसी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं जो उसे रात को सोने नहीं दे रही तो वह आपको एडवांस क्या अपनी वसीयत तक देने को तैयार हो जाएगा।
लेसन ३ : सब्सक्रिप्शन और सर्विस का चस्का लगाओ और चैन की नींद सो जाओ
पिछले दो लेसन में हमने इन्वेस्टर से पीछा छुड़ाना और एडवांस पैसे ऐंठना सीख लिया। अब बात करते हैं उस मॉडल की जो आपको अमीर तो बनाएगा ही पर साथ ही आपको वह सुकून देगा जो एक सरकारी नौकरी वाले को महीने की एक तारीख को मिलता है। जॉन मुलिन्स इसे सब्सक्रिप्शन या सर्विस-टू-प्रोडक्ट मॉडल कहते हैं। हम इंडियंस को फ्री की चीजें पसंद हैं पर उससे भी ज्यादा हमें उस चीज की आदत पड़ जाती है जो हमारी लाइफ आसान बना दे। एक बार अगर कस्टमर को आपके काम की लत लग गई तो समझो आपका कैश फ्लो ऑटोमेशन पर चला गया।
जरा अपने मोबाइल को उठाकर देखिए। नेटफ्लिक्स से लेकर जिम की मेंबरशिप और आपके घर का दूध वाला भी इसी मॉडल पर चल रहा है। वह आपसे हर महीने एक फिक्स्ड अमाउंट वसूलते हैं चाहे आप महीने भर मूवी देखें या न देखें। इसे कहते हैं रेकरिंग रेवेन्यू। जब आपका बिजनेस इस लेवल पर पहुँच जाता है जहाँ कस्टमर आपको हर महीने खुद पैसे भेजता है तो आपको रोज सुबह उठकर यह नहीं सोचना पड़ता कि आज शिकार कहाँ से मिलेगा। आपका पुराना कस्टमर ही आपकी कंपनी को फंड कर रहा होता है। यह सुनने में जितना आसान लगता है इसे लागू करने में उतना ही दिमाग चाहिए।
मान लीजिए आप एक ग्राफिक डिजाइनर हैं। आप एक-एक क्लाइंट के पीछे भागने के बजाय एक मंथली पैक लॉन्च करते हैं जिसमें आप कहते हैं कि भाई महीने के पांच हजार दो और अपनी सारी सोशल मीडिया पोस्ट मुझसे बनवा लो। अब उस क्लाइंट के लिए आप उसके घर के दामाद की तरह जरूरी हो गए हैं। उसे पता है कि अगर आपको पैसे नहीं दिए तो उसका धंधा रुक जाएगा। और आपके लिए? आपके पास एक पक्का बजट है जिससे आप अपने बिजनेस को और बड़ा कर सकते हैं। बिना किसी फालतू के इन्वेस्टर की चिक-चिक के आप अपनी टीम बढ़ा सकते हैं और नए टूल्स खरीद सकते हैं।
हैरानी की बात तो यह है कि लोग आज भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं जहाँ वो सामान बेचकर भूल जाते हैं। अरे भाई कस्टमर को पकड़कर रखो। उसे सर्विस दो और उसे अपना परमानेंट एटीएम बना लो। जब आप किसी को कोई सर्विस देते हैं तो आप असल में उसका समय खरीद रहे होते हैं। और आज के जमाने में समय से कीमती कुछ नहीं है। कटाक्ष में कहें तो अगर आप अपने कस्टमर को आलसी बनाने में कामयाब हो गए तो समझो आपका बिजनेस कभी फेल नहीं होगा।
अंत में यही कहूंगा कि अमीर बनने के लिए करोड़ों का फंड नहीं बल्कि करोड़ों का दिमाग चाहिए। इन्वेस्टर के ऑफिस के चक्कर काटकर अपने जूते घिसने से बेहतर है कि आप अपने कस्टमर के पास जाएं और उसकी नब्ज पकड़ें। जिस दिन आपने कस्टमर की जेब का रास्ता ढूंढ लिया उस दिन से आपको दुनिया की कोई भी ताकत सफल होने से नहीं रोक पाएगी। अब उठो और जाकर अपना पहला कस्टमर ढूंढो जो आपके सपनों को फंड करेगा।
अगर आप अभी भी इन्वेस्टर के पीछे भाग रहे हैं तो रुकिए और अपनी स्ट्रेटेजी बदलिए। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो स्टार्टअप का सपना देख रहे हैं पर पैसों की कमी का रोना रोते हैं। कमेंट में बताइए कि आप अपने बिजनेस में कस्टमर से एडवांस लेने के लिए कौन सा आईडिया लगाएंगे।
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