The Halo Effect (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो किसी कंपनी का बड़ा प्रॉफिट देखकर उसके चपरासी को भी जीनियस मान लेते हैं? मुबारक हो आप हेलो इफेक्ट के जाल में फंसे हैं और अपनी मेहनत की कमाई और अकल दोनों को कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। यह आर्टिकल नहीं पढ़ा तो लाइफ भर ऐसे ही बेवकूफ बनते रहेंगे और फेक गुरुओं के बिजनेस फार्मूले चाटते रह जाएंगे।

आज हम फिल रोजेनज्वाइग की बुक दि हेलो इफेक्ट से वह कड़वे सच जानेंगे जो बड़ी बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां आपसे छुपाती हैं। यह आर्टिकल आपके सोचने का तरीका बदल देगा और आपको बिजनेस के असली धोखों से बचाएगा।


लेसन १ : हेलो इफेक्ट का मायाजाल और परफॉरमेंस का भ्रम

क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई कंपनी शेयर मार्केट में आसमान छू रही होती है तो अचानक उसके सीईओ को भगवान का दर्जा क्यों दे दिया जाता है? लोग कहने लगते हैं कि देखो उनकी स्ट्रेटेजी कितनी कमाल है उनका वर्क कल्चर कितना महान है और वह सुबह चार बजे उठकर ठंडे पानी से नहाते हैं इसलिए कंपनी टॉप पर है। लेकिन जैसे ही वही कंपनी घाटे में जाती है वही लोग कहने लगते हैं कि सीईओ तो आलसी था कल्चर एकदम सड़ा हुआ था और उनकी स्ट्रेटेजी में तो पहले से ही छेद थे। इसी को कहते हैं हेलो इफेक्ट यानी एक अच्छी चीज को देखकर बाकी सब कुछ अच्छा मान लेना। यह वैसा ही है जैसे किसी लड़के के पास चमचमाती फरारी देखकर आप यह मान लें कि वह लड़का बहुत ही संस्कारी और बुद्धिमान होगा जबकि हो सकता है कि वह अपनी पूरी जायदाद जुए में हारने की दहलीज पर खड़ा हो।

बिजनेस वर्ल्ड में यह बीमारी कैंसर की तरह फैली हुई है। मान लीजिए एक कंपनी है जिसका नाम है सुपर टेक। पिछले साल इनका प्रॉफिट २०० परसेंट बढ़ गया। अब मार्केट के ज्ञानी और सो कॉल्ड एक्सपर्ट्स अपनी डायरी लेकर पहुँच जाएंगे। वह कहेंगे कि सुपर टेक की सफलता का राज उनकी ओपन ऑफिस पॉलिसी है। वह कहेंगे कि वहां के लोग साथ में लंच करते हैं इसलिए कंपनी आगे बढ़ रही है। लेकिन सच तो यह है कि यह सब फालतू की बातें हैं। असल में शायद उस साल मार्केट में डिमांड ज्यादा थी या उनके कॉम्पिटिटर की फैक्ट्री में आग लग गई थी। पर हमारा दिमाग इतना आलसी है कि वह किस्मत को क्रेडिट देना ही नहीं चाहता। हमें तो बस एक हीरो चाहिए जिसे हम माला पहना सकें।

जब चीजें अच्छी चल रही होती हैं तो हम डेटा को भी अपनी सुविधा के हिसाब से मरोड़ देते हैं। अगर कंपनी पैसा छाप रही है तो उसका रिस्क लेना विजनरी कहलाता है। और अगर वही रिस्क फेल हो जाए तो उसे लापरवाही का नाम दे दिया जाता है। यह सार्केजम नहीं बल्कि हकीकत है कि हम लोग रिजल्ट देखकर प्रोसेस को जज करते हैं। आप किसी को थप्पड़ मारें और उसके गाल से सोना निकल आए तो लोग कहेंगे कि आपकी टाइमिंग बहुत बढ़िया थी। लेकिन अगर कुछ न निकले तो आप सीधे जेल जाएंगे।

यही हाल हमारी डेली लाइफ का भी है। हम किसी सक्सेसफुल आंत्रप्रेन्योर की रूटीन को कॉपी करने लगते हैं। हमें लगता है कि अगर वह शख्स एवोकैडो टोस्ट खाकर अरबपति बना है तो हम भी वही खाकर चाँद पर पहुँच जाएंगे। हम यह भूल जाते हैं कि उसकी सफलता के पीछे कई ऐसे फैक्टर्स थे जो उसने खुद भी कंट्रोल नहीं किए थे। हेलो इफेक्ट हमें अंधा बना देता है और हम उन बारीकियों को देखना छोड़ देते हैं जो असल में मायने रखती हैं। हम बस उस चमकती हुई आभा यानी हेलो के पीछे भागते रहते हैं और अंत में गड्ढे में गिर जाते हैं।

बिजनेस मैगजीन्स भी इसी आग में घी डालने का काम करती हैं। वह ऐसी कहानियां बुनती हैं जैसे कोई बॉलीवुड की फिल्म चल रही हो। जहाँ हीरो को सब पता है और विलेन यानी मार्केट कंडीशंस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकतीं। लेकिन हकीकत में बिजनेस एक बहुत ही अनिश्चित खेल है। यहाँ आज जो फार्मूला काम कर रहा है कल वह आपको सड़क पर ला सकता है। इसलिए अगली बार जब आप किसी की तारीफों के पुल बंधते देखें तो रुकिए और सोचिए कि क्या वाकई वह इंसान इतना महान है या फिर यह सिर्फ हेलो इफेक्ट का जादू है। क्या आपको वाकई लगता है कि सिर्फ अच्छे कल्चर से कंपनी चलती है? अगर ऐसा होता तो हर एनजीओ आज दुनिया की सबसे अमीर संस्था होती।


लेसन २ : एब्सोल्यूट बनाम रिलेटिव परफॉरमेंस का असली खेल

क्या आपने कभी वह कहानी सुनी है जिसमें दो दोस्त जंगल में शेर के सामने फंस जाते हैं? एक दोस्त जल्दी से अपने जूते पहनने लगता है। दूसरा कहता है कि भाई तुम जूते क्यों पहन रहे हो तुम शेर से तेज नहीं भाग सकते। पहला दोस्त बड़े आराम से जवाब देता है कि मुझे शेर से तेज नहीं भागना मुझे बस तुमसे तेज भागना है। बिजनेस की दुनिया भी बिल्कुल ऐसी ही है। यहाँ अगर आप अपनी परफॉरमेंस को पिछले साल के मुकाबले तौल रहे हैं तो आप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा चूना लगा रहे हैं। लोग अक्सर कहते हैं कि हमारी कंपनी ने इस साल १५ परसेंट ग्रोथ की है तो हम बहुत महान हैं। भाई साहब अगर पूरी इंडस्ट्री ने ३० परसेंट ग्रोथ की है तो आपकी १५ परसेंट वाली महानता असल में एक धीमी मौत है।

इसे एब्सोल्यूट बनाम रिलेटिव परफॉरमेंस का कंफ्यूजन कहते हैं। एब्सोल्यूट परफॉरमेंस का मतलब है कि आपने खुद के रिकॉर्ड तोड़े। लेकिन बिजनेस कोई योगा क्लास नहीं है जहाँ आपको सिर्फ खुद से बेहतर होना है। यह एक ओलंपिक रेस है जहाँ बगल वाला धावक आपसे तेज भाग रहा है तो आपका गोल्ड मेडल गया। मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट खोलते हैं और आपका खाना पहले से बहुत बेहतर हो गया है। आपने नई लाइटिंग लगा ली और वेटर को तमीज भी सिखा दी। लेकिन आपके पड़ोस वाले रेस्टोरेंट ने आधे दाम पर इससे भी अच्छा खाना और फ्री वाईफाई देना शुरू कर दिया है। अब आप अपनी उस १० परसेंट वाली तरक्की का अचार डालिए क्योंकि ग्राहक तो पड़ोस वाली दुकान पर ही जाएगा।

हम अक्सर उन किताबों और गुरुओं के चक्कर में पड़ जाते हैं जो कहते हैं कि बस इन सात स्टेप्स को फॉलो करो और आप सक्सेसफुल हो जाओगे। वह आपको यह नहीं बताते कि आपके कॉम्पिटिटर भी शायद वही किताब पढ़ रहे हैं और शायद वह आपसे ज्यादा मेहनत कर रहे हैं। मैनेजमेंट गुरु अक्सर उन कंपनियों की तारीफ करते हैं जो बहुत अच्छा कर रही होती हैं। वह कहते हैं कि यह कंपनी इसलिए जीत रही है क्योंकि इनका फोकस कस्टमर पर है। अरे भाई कौन सी कंपनी है जो यह कहती है कि हमें कस्टमर से नफरत है? हर कोई वही बेसिक चीजें कर रहा है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कौन उन चीजों को दूसरों से बेहतर और जल्दी कर रहा है।

सच्चाई यह है कि परफॉरमेंस हमेशा रिलेटिव होती है। अगर आप एक क्रिकेटर हैं और आपने १०० बॉल में २० रन बनाए हैं तो यह अच्छी बात हो सकती है अगर बाकी पूरी टीम २ रन पर आउट हो गई हो। लेकिन अगर पिच ऐसी है जहाँ हर कोई सेंचुरी मार रहा है तो आपके २० रन की औकात जीरो के बराबर है। बिजनेस में भी यही सार्केजम लागू होता है। अक्सर कंपनियां अपने आप में मग्न रहती हैं और उन्हें लगता है कि वह बहुत अच्छा कर रही हैं क्योंकि उनका ग्राफ ऊपर जा रहा है। वह भूल जाती हैं कि उनके कॉम्पिटिटर का ग्राफ रॉकेट की तरह ऊपर जा रहा है।

लोग अक्सर कहते हैं कि अगर हम अपनी क्वालिटी बढ़ा लेंगे तो हम जीत जाएंगे। यह वैसा ही है जैसे यह सोचना कि अगर मैं अच्छे से ब्रश करूँगा तो मुझे नौकरी मिल जाएगी। भाई ब्रश करना तो बेसिक है जीत तो इस बात पर तय होगी कि आपके पास स्किल्स क्या हैं और मार्केट में बाकी लोग क्या ऑफर कर रहे हैं। फिल रोजेनज्वाइग हमें यही समझाते हैं कि डेटा को आइसोलेशन में मत देखो। जब तक आप अपने कॉम्पिटिटर की चाल को नहीं समझ रहे और उनसे एक कदम आगे नहीं निकल रहे तब तक आपकी सारी मेहनत सिर्फ एक भ्रम है। इसलिए अगली बार जब आप अपनी टीम के साथ पार्टी करें कि हमने टारगेट अचीव कर लिया है तो एक बार खिड़की से बाहर झांक कर जरूर देख लेना कि कहीं कॉम्पिटिटर आपकी पूरी मार्केट ही न उड़ा ले गया हो।


लेसन ३ : अनिश्चितता का कड़वा सच और सक्सेस का झूठा फार्मूला

क्या आपको भी लगता है कि बिजनेस कोई गणित का सवाल है जिसे हल करने का कोई एक फिक्स्ड फॉर्मूला होता है? अगर आपका जवाब हाँ है तो आपको अपनी अकल का बीमा करवा लेना चाहिए। मैनेजमेंट की दुनिया में सबसे बड़ा झूठ यही बेचा जाता है कि अगर आप ए प्लस बी करेंगे तो हमेशा सी ही मिलेगा। फिल रोजेनज्वाइग बड़े प्यार से समझाते हैं कि बिजनेस में कोई भी स्ट्रेटेजी पत्थर की लकीर नहीं होती। यहाँ आप दुनिया के बेस्ट माइंड्स को काम पर रख सकते हैं और बेहतरीन डेटा का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन फिर भी आपका प्रोजेक्ट बुरी तरह फेल हो सकता है। और सार्केजम की बात तो यह है कि फेल होने के बाद वही लोग जो कल तक आपकी तारीफ कर रहे थे वह आपकी गलतियां गिनाने के लिए सबसे पहले लाइन में खड़े होंगे।

असल में बिजनेस एक ऐसा खेल है जहाँ नियम बीच मैच में ही बदल जाते हैं। मान लीजिए आपने एक बहुत ही शानदार होटल चेन शुरू की। आपकी लोकेशन बेस्ट है स्टाफ टॉप क्लास है और खाना तो ऐसा कि उंगलियां चाटते रह जाएं। लेकिन अचानक से एक महामारी आ जाती है और पूरी दुनिया लॉक हो जाती है। अब आपके उस सो कॉल्ड सक्सेस फार्मूले का क्या हुआ? क्या आपकी मेहनत कम थी? क्या आपकी स्ट्रेटेजी गलत थी? नहीं। बस किस्मत और मार्केट की अनिश्चितता ने आपका पत्ता काट दिया। लोग अक्सर सफलता का सारा क्रेडिट खुद को देते हैं लेकिन फेलियर को किस्मत पर डाल देते हैं। जबकि सच तो यह है कि सफलता में भी किस्मत का उतना ही बड़ा हाथ होता है जितना मेहनत का।

हम अक्सर उन कंपनियों की केस स्टडी पढ़ते हैं जो सौ साल से चल रही हैं। हम सोचते हैं कि उन्होंने कुछ जादुई किया होगा। लेकिन हम उन हजारों कंपनियों को भूल जाते हैं जिन्होंने बिल्कुल वही सब किया जो इन बड़ी कंपनियों ने किया था पर वह आज इतिहास के पन्नों में भी नहीं हैं। इसे सर्वाइवरशिप बायस कहते हैं। हम सिर्फ जिंदा बचे हुए लोगों की बातें सुनते हैं और जो मर गए उनकी कोई कहानी नहीं सुनाता। यह वैसा ही है जैसे आप किसी लॉटरी जीतने वाले से पूछें कि अमीर कैसे बनें और वह कहे कि बस टिकट खरीदो और दुआ करो। क्या आप उस पर भरोसा करेंगे? शायद नहीं। लेकिन बिजनेस वर्ल्ड में हम यही करते आ रहे हैं।

स्ट्रेटेजी और एग्जीक्यूशन कभी भी गारंटी नहीं होते। यह सिर्फ आपकी जीतने की संभावना यानी प्रोबेबिलिटी को बढ़ाते हैं। अगर आप अच्छी स्ट्रेटेजी बनाते हैं तो आपके जीतने के चांस ५० परसेंट से बढ़कर ७० परसेंट हो सकते हैं लेकिन वह ३० परसेंट रिस्क हमेशा आपके सिर पर तलवार बनकर लटका रहेगा। दुनिया के सबसे बड़े इन्वेस्टर्स भी यही मानते हैं कि हम सिर्फ सही दांव लगा सकते हैं नतीजे हमारे हाथ में नहीं होते। लेकिन कॉर्पोरेट के सूट बूट वाले ज्ञानी आपको यह कभी नहीं बताएंगे क्योंकि अगर उन्होंने मान लिया कि सब कुछ उनके कंट्रोल में नहीं है तो उनकी भारी भरकम फीस कौन देगा?

तो इसका मतलब क्या यह है कि हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएं? बिल्कुल नहीं। असली बुद्धिमानी इसी में है कि आप यह स्वीकार करें कि सब कुछ आपके कंट्रोल में नहीं है। एक अच्छा मैनेजर वह नहीं है जो दावे करे कि वह कभी फेल नहीं होगा बल्कि वह है जो जानता है कि हार की गुंजाइश है और उसके पास एक प्लान बी तैयार है। बिजनेस में सबसे खतरनाक चीज है ओवर कॉन्फिडेंस। जब आप यह सोचने लगते हैं कि आपको सफलता का सीक्रेट मिल गया है वहीं से आपका पतन शुरू हो जाता है। इसलिए अगली बार जब कोई आपको सफलता का शॉर्टकट बताए तो समझ जाना कि वह आपको सिर्फ एक नया भ्रम बेच रहा है। सच तो यह है कि बिजनेस एक गहरा समंदर है जहाँ लहरें कभी भी आपका रुख बदल सकती हैं।


तो दोस्तों, दि हेलो इफेक्ट हमें यही सिखाती है कि चमकती हुई हर चीज सोना नहीं होती। किसी कंपनी की सफलता को देखकर अंधे मत बनिए और न ही किसी की असफलता को देखकर उसे नकारा मान लीजिए। बिजनेस के ९ भ्रमों से बचिए और डेटा को गहराई से देखना शुरू कीजिए। क्या आपने कभी अपनी लाइफ या करियर में इस हेलो इफेक्ट को महसूस किया है? क्या आपने कभी किसी के अच्छे लुक्स या कॉन्फिडेंस को देखकर उसे ज्यादा काबिल मान लिया और बाद में पछताए?

अपने अनुभव कमेंट्स में जरूर शेयर करें क्योंकि आपकी एक कहानी किसी और को बेवकूफ बनने से बचा सकती है। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो बिजनेस बुक्स के फार्मूलों को गीता और कुरान की तरह सच मानते हैं। आइए मिलकर इस कॉर्पोरेट मायाजाल का पर्दाफाश करें।

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