अगर आप अब भी यह सोचते हैं कि आपकी कंपनी के सबसे स्मार्ट आइडियाज सिर्फ एसी केबिन में बैठे बॉस के पास ही होते हैं तो मुबारक हो आप अपनी डूबती नैय्या के कैप्टन हैं। अपनी टीम के दिमाग को कचरा समझना बंद कीजिए वरना कंपटीटर आपको मार्केट से डिलीट कर देंगे और आपको पता भी नहीं चलेगा।
आज हम एलन रॉबिन्सन और डीन श्रोडर की किताब द आइडिया ड्रिवन ऑर्गनाइजेशन से सीखेंगे कि कैसे ग्राउंड लेवल के छोटे छोटे आइडियाज आपके बिजनेस को एक नई ऊचाई पर ले जा सकते हैं। चलिए इन ३ लेसन्स को गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : बॉटम अप पावर - असली हीरो तो ग्राउंड पर है
अक्सर कंपनियों में एक बड़ा ही अजीब ड्रामा चलता है। ऊपर बैठे टॉप लेवल मैनेजर्स को लगता है कि सारी अकल और विजनरी पावर सिर्फ उनके महंगे सूट और आलीशान केबिन्स में ही कैद है। उन्हें लगता है कि कंपनी को आगे ले जाने वाले आइडियाज सिर्फ बोर्ड मीटिंग्स के बीच ही पैदा होते हैं। लेकिन भाई साहब सच तो यह है कि असली एक्शन तो ग्राउंड लेवल पर हो रहा है। जो एम्प्लॉई दिन भर कस्टमर से बात कर रहा है या जो मशीन पर खड़ा होकर प्रोडक्शन संभाल रहा है उसे असली प्रॉब्लम्स के बारे में आपसे १० गुना ज्यादा पता है। एलन रॉबिन्सन कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी के सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले इंसान की बात नहीं सुन रहे तो आप एक सोने की खान के ऊपर बैठे हैं और उसे खोदने की हिम्मत भी नहीं कर रहे।
जरा सोचिए आप एक रेस्टोरेंट के मालिक हैं। आप महीने में एक बार आते हैं और अकाउंट्स चेक करके चले जाते हैं। आपको लगता है कि सब बढ़िया है। लेकिन जो वेटर हर टेबल पर खाना सर्व कर रहा है वह जानता है कि कस्टमर बार बार नमक कम होने की शिकायत कर रहे हैं या सर्विस स्लो होने की वजह से चिढ़ रहे हैं। अब अगर आप एक ऐसा कल्चर नहीं बनाएंगे जहाँ वह वेटर बेझिझक आपको यह बता सके तो आप बस अपनी झूठी शान में डूबे रहेंगे और धीरे धीरे आपके कस्टमर गायब हो जाएंगे। इंडिया में तो वैसे भी हम सबको लगता है कि जो बड़ा है वही सही है। लेकिन बिजनेस में जो काम कर रहा है वही सही है।
किताब कहती है कि ८० परसेंट से ज्यादा पोटेंशियल तो उन छोटे आइडियाज में छिपा होता है जो एम्प्लॉई के पास होते हैं। लेकिन ईगो का क्या करें। मैनेजर्स को लगता है कि अगर उन्होंने किसी जूनियर का आइडिया मान लिया तो उनकी इज्जत कम हो जाएगी। यह सोच ही सबसे बड़ी दुश्मन है। एक आइडिया ड्रिवन ऑर्गनाइजेशन वह है जहाँ एक डिलीवरी बॉय भी आकर कह सके कि सर अगर हम इस रास्ते से जाएं तो पेट्रोल बचेगा और टाइम भी। और बॉस उसे डांटने के बजाय उसे शाबाशी दे। जब आप अपनी टीम को यह भरोसा दिलाते हैं कि उनके छोटे सुझाव भी मायने रखते हैं तो वे सिर्फ तनख्वाह के लिए काम नहीं करते बल्कि वे उस कंपनी को अपना समझने लगते हैं।
आजकल के स्टार्टअप्स में भी यही बीमारी है। वे बहुत सारे फंड्स लेकर आते हैं और बड़े बड़े एक्सपर्ट्स को हायर कर लेते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि जो इंटर्न रोज मार्केट की धूल फांक रहा है उसके पास ऐसी इनसाइट्स हो सकती हैं जो आपकी १० लाख की कंसल्टिंग फर्म भी नहीं दे पाएगी। तो अपनी आंखें और कान खोलिए। अपने ऑफिस के केबिन से बाहर निकलिए। उन लोगों से बात कीजिए जो असल में काम कर रहे हैं। वरना आप बस फाइल्स और डेटा के बीच ही उलझे रहेंगे और आपका कंपटीटर जो अपने एम्प्लॉई की बात सुनता है वह आपको धूल चटाकर आगे निकल जाएगा।
लेसन २ : छोटे बदलाव बड़ा इम्पैक्ट - छोटे आइडियाज का बड़ा धमाका
अक्सर हम इंडियंस की एक पुरानी बीमारी है। हमें लगता है कि अगर कुछ बड़ा करना है तो कोई बहुत ही क्रांतिकारी और भारी भरकम आइडिया होना चाहिए। हम हमेशा उस एक मास्टरस्ट्रोक के इंतजार में बैठे रहते हैं जो रातों रात हमारी किस्मत बदल देगा। लेकिन एलन रॉबिन्सन और डीन श्रोडर अपनी इस किताब में हमें एक कड़वा सच बताते हैं। वे कहते हैं कि कंपनी की तरक्की किसी एक बड़े धमाके से नहीं बल्कि उन हजारों छोटे छोटे सुधारों से होती है जिन्हें हम अक्सर मामूली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। इसे आप क्रिकेट के मैच की तरह समझिए। हर बॉल पर छक्का मारना मुमकिन नहीं है लेकिन अगर आप लगातार सिंगल्स लेते रहें और स्ट्राइक रोटेट करते रहें तो स्कोरबोर्ड अपने आप आसमान छूने लगता है।
मान लीजिए आपकी एक ई कॉमर्स कंपनी है और आपका पैकिंग डिपार्टमेंट हर बॉक्स पर एक्स्ट्रा टेप लपेट देता है। सुनने में यह बहुत छोटी बात लगती है। लेकिन अगर आपका कोई कर्मचारी सुझाव दे कि टेप को सिर्फ एक खास तरीके से लगाने से भी बॉक्स उतना ही मजबूत रहेगा और हर बॉक्स पर २ रुपये की बचत होगी तो सोचिए क्या होगा। अगर आप दिन में ५००० बॉक्स पैक करते हैं तो साल के अंत में यह छोटी सी बचत लाखों का मुनाफा बन जाएगी। यह है छोटे आइडिया की ताकत। लेकिन प्रॉब्लम यह है कि हम ऐसे आइडिया देने वाले को पागल समझते हैं। हमें लगता है कि यह क्या छोटी बातें कर रहा है कुछ बड़ा सोचो। भाई साहब बड़ा सोचने के चक्कर में हम अक्सर बेसिक चीजें ही भूल जाते हैं।
किताब में एक बेहतरीन उदाहरण दिया गया है कि कैसे एक कंपनी ने सिर्फ अपनी मशीनों की जगह बदलकर लाखों डॉलर बचा लिए। कोई नई टेक्नोलॉजी नहीं कोई करोड़ों का निवेश नहीं। सिर्फ एक वर्कर ने कहा कि अगर यह मशीन वहां के बजाय यहाँ हो तो सामान ले जाने का समय बचेगा। बस इतना सा काम और रिजल्ट बेमिसाल। हमारे यहाँ भी ऑफिस में अक्सर लोग कहते हैं कि अरे यार यह प्रिंटर अगर थोड़ा पास होता तो बार बार उठना नहीं पड़ता। लेकिन हम क्या करते हैं। हम इसे बस एक शिकायत समझकर छोड़ देते हैं। हम यह नहीं देखते कि उस इंसान ने काम को आसान बनाने का एक तरीका ढूंढ लिया है।
असली लीडर वह है जो इन छोटे बदलावों को सेलिब्रेट करे। अगर आप सिर्फ बड़े अचीवमेंट्स पर तालियां बजाएंगे तो आपकी टीम छोटे सुझाव देना बंद कर देगी। उन्हें लगेगा कि जब तक मैं दुनिया नहीं बदल देता मेरी कोई वैल्यू नहीं है। और यही वह पॉइंट है जहाँ इनोवेशन मर जाता है। याद रखिए समंदर बूंद बूंद से ही भरता है। आपके बिजनेस का मुनाफा भी उन छोटी छोटी कमियों को दूर करने से बढ़ेगा जिन्हें सिर्फ वह इंसान देख सकता है जो रोज उस काम को कर रहा है। तो अगली बार जब कोई एम्प्लॉई आपके पास आकर कहे कि सर इस फाइल का कलर बदल देते हैं तो उसे झिड़की मत दीजिए। शायद वह आपकी कंपनी का कीमती वक्त बचाने का रास्ता दिखा रहा हो।
लेसन ३ : आइडिया फ्रेंडली सिस्टम - सिस्टम बनाओ वरना आइडियाज मर जाएंगे
अब तक हमने समझा कि ग्राउंड लेवल के लोग और उनके छोटे आइडियाज कितने जरूरी हैं। लेकिन मान लीजिए आपकी टीम के पास दुनिया का सबसे बेहतरीन आइडिया है पर उसे बताने का कोई रास्ता ही नहीं है तो क्या फायदा। अक्सर कंपनियों में 'सजेशन बॉक्स' धूल फांक रहे होते हैं या फिर कोई नया सुझाव देने पर एम्प्लॉई को दस फॉर्म भरने पड़ते हैं। एलन रॉबिन्सन कहते हैं कि सिर्फ अच्छे लोग होना काफी नहीं है। अगर आपका सिस्टम पुराना और सड़ा हुआ है तो वह किसी भी अच्छे आइडिया का गला घोंट देगा। आपको एक ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहाँ आइडियाज का स्वागत हो न कि उनका मजाक उड़ाया जाए।
सोचिए आप एक सरकारी दफ्तर में खड़े हैं जहाँ एक छोटी सी फाइल को आगे बढ़ाने के लिए आपको दस टेबल्स के चक्कर काटने पड़ते हैं। अब ऐसी जगह पर क्या कोई कर्मचारी यह हिम्मत करेगा कि वह कुछ नया करने की सोचे। बिल्कुल नहीं। उसे पता है कि अगर उसने कुछ अलग करने की कोशिश की तो सिस्टम उसे कुचल देगा। यही हाल कई बड़ी प्राइवेट कंपनियों का भी है। वहां के नियम इतने सख्त और पुराने होते हैं कि लोग बस अपनी शिफ्ट खत्म करने का इंतजार करते हैं। किताब के लेखक कहते हैं कि एक आइडिया ड्रिवन ऑर्गनाइजेशन में आइडिया देने और उसे लागू करने के बीच का समय कम से कम होना चाहिए।
एक कंपनी ने अपने वर्कर्स को यह पावर दे दी कि अगर उन्हें लगे कि कोई काम गलत हो रहा है तो वे असेंबली लाइन को रोक सकते हैं। शुरू में मैनेजर्स को लगा कि इससे तो काम ठप हो जाएगा। लेकिन हुआ इसका उल्टा। वर्कर्स ने अपनी जिम्मेदारी समझी और छोटे छोटे सुधारों के जरिए प्रोडक्शन की क्वालिटी इतनी बढ़ा दी कि बाद में कोई बड़ी खराबी आई ही नहीं। इंडिया में हम अक्सर 'जुगाड़' की बात करते हैं। यह जुगाड़ भी एक तरह का बॉटम अप आइडिया ही है। बस जरूरत है इसे एक फॉर्मल सिस्टम में बदलने की। अगर आप अपनी टीम को यह नहीं बताएंगे कि आइडिया किसके पास ले जाना है और उस पर एक्शन कौन लेगा तो वे चुप बैठना ही बेहतर समझेंगे।
सिस्टम ऐसा हो जो फेलियर को भी जगह दे। अगर कोई नया आइडिया काम नहीं करता तो उस कर्मचारी को सजा मत दीजिए। वरना अगली बार कोई मुंह खोलने की हिम्मत नहीं करेगा। जब आप एक ऐसा ईकोसिस्टम बनाते हैं जहाँ हर कोई एक प्रॉब्लम सॉल्वर बन जाता है तब आपकी कंपनी असल में ग्रो करती है। यह किसी फिल्म के क्लाइमेक्स जैसा है जहाँ पूरी टीम मिलकर विलेन यानी बिजनेस की प्रॉब्लम्स को हराती है। याद रखिए एक अकेला इंसान सिर्फ एक सपना देख सकता है लेकिन एक पूरी टीम मिलकर उस सपने को हकीकत बना सकती है। अपनी कंपनी को एक जेल नहीं बल्कि एक लैब बनाइए जहाँ हर रोज कुछ नया सीखने और करने की आजादी हो।
बिजनेस चलाना सिर्फ ऑर्डर्स देना नहीं है बल्कि अपनी टीम के भीतर छिपे हुए जीनियस को बाहर लाना है। द आइडिया ड्रिवन ऑर्गनाइजेशन हमें सिखाती है कि सफलता का रास्ता टॉप से बॉटम नहीं बल्कि बॉटम से टॉप की तरफ जाता है। तो आज ही अपनी ईगो को साइड में रखिए और अपनी टीम से पूछिए कि हम इस काम को और बेहतर कैसे कर सकते हैं। क्या आप अपनी कंपनी में बदलाव लाने के लिए तैयार हैं या आप भी पुराने ढर्रे पर चलकर गायब होना चाहते हैं। नीचे कमेंट्स में बताइए कि आपने अपनी लाइफ या काम में कौन सा छोटा बदलाव किया जिसने बड़ा रिजल्ट दिया। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो मैनेजमेंट में हैं या अपना बिजनेस शुरू कर रहे हैं।
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