क्या आप अभी भी वही घिसी पिटी सेल्स पिच मार रहे हैं जिसे सुनकर कस्टमर फोन काट देता है। बधाई हो आप अपनी मेहनत और पैसा दोनों कचरे के डिब्बे में डाल रहे हैं। अगर आपको लगता है कि सिर्फ चिल्लाने से सेल्स होती है तो आप बहुत बड़े भ्रम में जी रहे हैं।
आज हम हार्वे मैके की कमाल की बुक से वह सीक्रेट्स जानेंगे जो बड़े बड़े एमबीए कॉलेज में भी नहीं सिखाए जाते। यह तीन लेसन आपकी सेल्स करने की स्टाइल को पूरी तरह बदल देंगे और आपको एक प्रो क्लोजर बना देंगे।
लेसन १ : कस्टमर की कुंडली निकालना ही असली जीत है
मार्केट में हर कोई माल बेचने के लिए चिल्ला रहा है। पर क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग मिट्टी को भी सोने के भाव कैसे बेच देते हैं। हार्वे मैके कहते हैं कि अगर आप अपने कस्टमर के बारे में सिर्फ उतना ही जानते हैं जितना कि एक सरकारी फॉर्म में भरा जाता है तो आप एक मामूली सेल्समैन बनकर ही रह जाएंगे। असली सेल्स गेम तब शुरू होता है जब आप अपने कस्टमर की पूरी कुंडली अपने पास रखते हैं। इसे हार्वे मैके 66 कहते हैं। यह 66 सवालों की एक ऐसी लिस्ट है जो आपको बताती है कि कस्टमर को खाने में क्या पसंद है या उसका फेवरेट स्पोर्ट्स कौन सा है।
मान लीजिए आप एक बहुत बड़े बिजनेस ओनर के पास अपनी सर्विस बेचने गए। आप वहां जाकर सिर्फ अपने प्रोडक्ट की तारीफ करने लगे। आप चिल्ला रहे हैं कि मेरा प्रोडक्ट बेस्ट है और मेरा डिस्काउंट सबसे ज्यादा है। लेकिन वह आदमी आपको घास भी नहीं डाल रहा है। क्यों। क्योंकि आपने अपना होमवर्क नहीं किया। अब जरा सीन बदलिए। आपको पता चलता है कि उस क्लाइंट को पुरानी घड़ियों का बहुत शौक है। आप अपनी बात शुरू करने से पहले बस एक छोटा सा जिक्र करते हैं कि उनकी टेबल पर रखी वह विंटेज घड़ी कितनी शानदार है। अचानक उस क्लाइंट की आंखों में चमक आ जाती है। अब वह आपको एक सेल्समैन की तरह नहीं बल्कि एक दोस्त की तरह देख रहा है। आपने उसका दिल जीत लिया है और जब दिल जीत लिया जाता है तो जेब अपने आप खुल जाती है।
ज्यादातर लोग गलती यही करते हैं कि वह कस्टमर को एक चलता फिरता नोटों का बंडल समझते हैं। वह भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक इंसान है जिसके जज्बात हैं। हार्वे मैके का मानना है कि आपको कस्टमर से तब भी रिश्ता बनाकर रखना चाहिए जब आप उसे कुछ बेच नहीं रहे होते। अगर आप सिर्फ मतलब के लिए फोन करेंगे तो कस्टमर आपका नंबर स्पैम में डाल देगा। लेकिन अगर आप उसके बच्चे के जन्मदिन पर एक छोटा सा मैसेज भेज देते हैं तो आप उसकी गुड बुक्स में आ जाते हैं। यह कोई चापलूसी नहीं है। यह स्मार्ट बिजनेस है।
इंडिया में तो वैसे भी लोग रिश्तों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। यहाँ लोग दुकान से सामान बाद में खरीदते हैं और दुकानदार से रिश्ता पहले बनाते हैं। अगर आप किसी को यह महसूस करा सकते हैं कि आप उसकी परवाह करते हैं तो वह आपसे ही सामान खरीदेगा चाहे पड़ोस वाला दस परसेंट एक्स्ट्रा डिस्काउंट ही क्यों न दे रहा हो। इसलिए अगली बार जब किसी से मिलने जाएं तो सिर्फ अपना कैटलॉग लेकर न जाएं। थोड़ी रिसर्च भी लेकर जाएं। कस्टमर को लगना चाहिए कि आपने उस पर टाइम इन्वेस्ट किया है। जब आप सामने वाले की लाइफ में इंटरेस्ट लेते हैं तब वह आपके बिजनेस में इंटरेस्ट लेना शुरू करता है।
यही वह बारीक लाइन है जो एक टॉप लेवल के क्लोजर और एक गली के सेल्समैन के बीच होती है। तैयारी के बिना मैदान में उतरना हार को दावत देना है। और जब आप इस तरह की गहरी जानकारी रखते हैं तो आप सिर्फ माल नहीं बेचते बल्कि आप एक भरोसा बेचते हैं। यही भरोसा आगे चलकर बड़े बड़े कॉन्ट्रैक्ट्स में बदल जाता है। लेकिन याद रखिए यह सिर्फ जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं है। इस जानकारी का सही इस्तेमाल करना भी एक कला है। जब आप कस्टमर की पसंद और नापसंद को अपनी पिच में बुन देते हैं तो आपकी बात किसी जादू की तरह काम करती है।
लेसन २ : तैयारी ऐसी हो कि किस्मत भी सलाम करे
पहले लेसन में हमने समझा कि कस्टमर को जानना क्यों जरूरी है। लेकिन क्या सिर्फ जानकारी काफी है। बिल्कुल नहीं। हार्वे मैके कहते हैं कि बिना तैयारी के सेल्स कॉल पर जाना वैसा ही है जैसे बिना कपड़ों के शादी में चले जाना। लोग आप पर हंसेंगे और आप शर्मिंदा होकर वापस आएंगे। रीयल वर्ल्ड में जीत उसी की होती है जिसका होमवर्क सबसे तगड़ा होता है। हमारे देश में बहुत से लोग किस्मत के भरोसे बैठे रहते हैं कि आज शायद कोई बड़ी डील हाथ लग जाए। पर भाई साहब किस्मत भी उसी का साथ देती है जो पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरता है।
मान लीजिए आपको किसी बड़ी कंपनी के मैनेजर के साथ मीटिंग मिली है। आप वहां बिना किसी रिसर्च के चले जाते हैं। मैनेजर आपसे पूछता है कि आपका प्रोडक्ट हमारे कॉम्पिटिटर से बेहतर कैसे है। आप वहां हकबका जाते हैं और बस गोल गोल बातें करने लगते हैं। आप कहते हैं कि हमारा माल अच्छा है और हम सस्ते में दे देंगे। मैनेजर मुस्कुराता है और कहता है कि हम सोचकर बताएंगे। वह 'सोचकर बताएंगे' असल में सेल्स की दुनिया का सबसे बड़ा झूठ है। इसका मतलब है कि आप अपना बोरिया बिस्तर समेटिए और यहाँ से निकलिए। आपने अपनी बेइज्जती खुद करवाई क्योंकि आपको अपने कॉम्पिटिटर की कमजोरियों का पता ही नहीं था।
अब इसी सीन को फिर से इमेजिन कीजिए। आप मीटिंग से दो दिन पहले उस कंपनी की पूरी हिस्ट्री पढ़ लेते हैं। आपको पता चलता है कि पिछले महीने उन्हें डिलीवरी में बहुत दिक्कत आई थी। आप मीटिंग में जाते ही सीधे मुद्दे पर बात करते हैं। आप कहते हैं कि मुझे पता है कि सप्लाई चेन में देरी की वजह से आपका कितना नुकसान हुआ है और हमारा सिस्टम इस परेशानी को कैसे खत्म कर सकता है। अब मैनेजर के कान खड़े हो जाएंगे। उसे लगेगा कि यह बंदा सिर्फ बेचने नहीं आया है बल्कि मेरी समस्या का समाधान लेकर आया है। तैयारी का मतलब ही यही है कि आप कस्टमर के सवाल पूछने से पहले ही उसका जवाब तैयार रखें।
हार्वे मैके एक बहुत बड़ी बात कहते हैं कि सेलिंग तब शुरू नहीं होती जब आप क्लाइंट के सामने बैठते हैं। वह तब शुरू होती है जब आप अपने ऑफिस में बैठकर रिसर्च कर रहे होते हैं। आपको अपने प्रोडक्ट की हर बारीक जानकारी होनी चाहिए। अगर आपको खुद नहीं पता कि आपका सामान कैसे काम करता है तो आप दूसरों को क्या खाक समझाएंगे। लोग अक्सर आलस कर जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी बातों का जादू चल जाएगा। पर याद रखिए रीयल वर्ल्ड में डेटा और तैयारी ही असली जादू है। बिना तैयारी के आप सिर्फ तुक्का मार रहे हैं और तुक्के से कभी कोई बड़ा साम्राज्य खड़ा नहीं होता।
सेल्स में तैयारी का मतलब सिर्फ फाइलें पढ़ना नहीं है। इसमें अपनी बॉडी लैंग्वेज और बोलने के तरीके पर काम करना भी आता है। अगर आप थके हुए और ढीले ढाले दिख रहे हैं तो कोई आप पर भरोसा नहीं करेगा। आपको अपनी पिच की इतनी प्रैक्टिस होनी चाहिए कि अगर कोई आपको आधी रात को नींद से जगाकर भी पूछे तो आप बिना अटके अपनी बात कह सकें। यह तैयारी ही आपको वह कॉन्फिडेंस देती है जिससे आप बड़ी से बड़ी डील टेबल पर बैठकर क्लोज कर सकते हैं। जब आप तैयार होते हैं तो आपका डर गायब हो जाता है और आप एक लीडर की तरह बात करते हैं।
लेसन ३ : रिजेक्शन का अचार डालिए और आगे बढ़िए
तैयारी भी कर ली और कस्टमर की कुंडली भी निकाल ली। पर क्या इसका मतलब यह है कि हर कोई आपसे सामान खरीद ही लेगा। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो आप शायद किसी परियों की कहानी में जी रहे हैं। हार्वे मैके कहते हैं कि सेल्स की दुनिया में 'ना' सुनना उतना ही नॉर्मल है जितना सुबह उठकर ब्रश करना। असली सेल्समैन वह नहीं है जिसे कभी रिजेक्शन न मिला हो। असली प्रो वह है जो रिजेक्शन को सुनकर रोता नहीं है बल्कि उसे अगले दरवाजे की चाबी बना लेता है। इंडिया में हम लोग रिजेक्शन को बहुत जल्दी दिल पर लगा लेते हैं। अगर किसी क्लाइंट ने मना कर दिया तो हम ऐसे दुखी हो जाते हैं जैसे हमारा ब्रेकअप हो गया हो।
मान लीजिए आपने एक हफ्ते तक किसी क्लाइंट के पीछे मेहनत की। आपने उसे प्रेजेंटेशन दी और चाय भी पिलाई। आखिर में वह कहता है कि भाई अभी बजट नहीं है बाद में देखेंगे। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि आप अपना मूंह लटकाकर घर बैठ जाएं और सोचने लगें कि आपकी किस्मत ही खराब है। दूसरा रास्ता यह है कि आप मुस्कुराकर कहें कि कोई बात नहीं सर मैं अगले महीने फिर से आपसे फीडबैक लेने आऊंगा। हार्वे मैके कहते हैं कि रिजेक्शन का मतलब 'कभी नहीं' नहीं होता। इसका मतलब अक्सर 'अभी नहीं' होता है। जो सेल्समैन इस फर्क को समझ गया वह खेल जीत गया।
सेल्स में सफल होने के लिए आपकी खाल गेंडे जैसी मोटी होनी चाहिए। लोग आपको मना करेंगे और कभी कभी तो बिना बात के डांट भी देंगे। पर याद रखिए वह आपके प्रोडक्ट को मना कर रहे हैं आपको नहीं। हार्वे मैके अपनी लाइफ का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कैसे उन्होंने बड़े बड़े सौदों के लिए सालों तक इंतजार किया। वह तब तक हार नहीं मानते थे जब तक उन्हें फाइनल जवाब न मिल जाए। अगर आप एक दरवाजे के बंद होने पर बैठ जाएंगे तो बाकी के खुले हुए सौ दरवाजे आपको कभी नहीं दिखेंगे। रिजेक्शन तो एक फिल्टर की तरह है जो कमजोर लोगों को बाहर निकाल देता है ताकि मैदान में सिर्फ खिलाड़ी बचे रहें।
रिजेक्शन हमें वह सिखाता है जो कोई ट्रेनिंग नहीं सिखा सकती। जब कोई क्लाइंट मना करता है तो वह असल में आपको आपकी पिच की कमी बता रहा होता है। अगर आप स्मार्ट हैं तो आप उस 'ना' का विश्लेषण करेंगे। क्या आपकी कीमत ज्यादा थी। क्या आपका भरोसा कम था। या फिर आपकी टाइमिंग गलत थी। जब आप अपनी गलतियों से सीखना शुरू कर देते हैं तो रिजेक्शन आपके लिए कड़वी दवाई नहीं बल्कि एक एनर्जी ड्रिंक बन जाता है। अगली बार जब कोई आपको मना करे तो उसे थैंक यू बोलिए क्योंकि उसने आपको एक और लेसन दे दिया है।
अंत में याद रखिए कि दुनिया का सबसे अमीर सेल्समैन भी दिन में दस बार 'ना' सुनता है। फर्क सिर्फ इतना है कि वह ग्यारहवीं बार फिर से उसी जोश के साथ दरवाजा खटखटाता है। हार्वे मैके की यह फिलॉसफी हमें सिखाती है कि जीतना जरूरी है पर हारकर फिर से खड़े होना उससे भी ज्यादा जरूरी है। तो अपनी फाइल उठाइए अपना सूट ठीक कीजिए और फिर से बाहर निकलिए। क्योंकि असली डील बस एक कॉल की दूरी पर है।
दोस्तों, सेलिंग सिर्फ एक जॉब नहीं है बल्कि यह जीने की एक कला है। हार्वे मैके के यह लेसन हमें सिखाते हैं कि अगर हम अपनी तैयारी पूरी रखें और रिश्तों की कद्र करें तो हमें सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। आज ही अपनी सेल्स डायरी निकालिए और कम से कम पांच ऐसे पुराने क्लाइंट्स को कॉल कीजिए जिनसे आपने बात करना छोड़ दिया था। याद रखिए रिजेक्शन से डरना बंद कीजिए और मैदान में डटे रहिए। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो सेल्स और बिजनेस में कुछ बड़ा करना चाहते हैं। कमेंट में हमें बताएं कि आपको सबसे अच्छा लेसन कौन सा लगा।
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