क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन रात गधों की तरह मेहनत करके सोचते हैं कि एक दिन आप मार्केट के लीडर बन जाएंगे। सच तो यह है कि आपकी यही बेस्ट बनने की जिद आपको और आपके बिजनेस को बहुत जल्द डुबोने वाली है। मुबारक हो आप अपनी मेहनत और पैसा दोनों बर्बाद कर रहे हैं।
अगर आप नहीं चाहते कि आपका स्टार्टअप भी उन फेल होने वाले ९० परसेंट बिजनेस की लिस्ट में शामिल हो जाए तो आपको माइकल पोर्टर की यह पावरफुल स्ट्रेटेजी समझनी ही होगी। आइए जानते हैं वह ३ लाइफ चेंजिंग लेसन्स जो आपकी बिजनेस लाइफ को पूरी तरह से बदल सकते हैं।
लेसन १ : कॉम्पिटिशन का असली मतलब बेस्ट होना नहीं बल्कि अलग होना है
ज्यादातर लोग बिजनेस को एक ऐसी रेस समझते हैं जहाँ सबको एक ही ट्रैक पर दौड़ना है और बस पहले नंबर पर आना है। अगर आप भी यही सोच रहे हैं, तो यकीन मानिए आप उस चूहा दौड़ का हिस्सा हैं जिसमें जीतने वाला भी आखिर में चूहा ही रहता है। माइकल पोर्टर कहते हैं कि बिजनेस कोई १०० मीटर की ओलंपिक रेस नहीं है जहाँ सिर्फ एक विनर होगा। असल में बिजनेस एक परफॉरमेंस आर्ट की तरह है। जैसे म्यूजिक की दुनिया में अरिजीत सिंह और यो यो हनी सिंह दोनों ही सफल हैं, क्योंकि दोनों अलग हैं। सोचिए अगर हनी सिंह अरिजीत सिंह जैसा बनने की कोशिश करते तो शायद आज वो किसी शादी में ढोलक बजा रहे होते।
यही गलती हमारे देश के स्टार्टअप्स और छोटे दुकानदार करते हैं। बगल वाले ने मोमोज की दुकान खोली और उसकी दुकान चल पड़ी, तो हम भी उसके बगल में अपनी दुकान खोल लेते हैं। अब शुरू होती है बेस्ट बनने की जंग। वो चटनी तीखी बनाता है, तो आप उससे भी ज्यादा तीखी बनाने लगते हैं। वो १० रुपये सस्ते देता है, तो आप ५ रुपये और कम कर देते हैं। अंत में क्या होता है। आप दोनों ही कंगाली की कगार पर पहुँच जाते हैं क्योंकि आपने अपनी पूरी एनर्जी दूसरों को हराने में लगा दी, खुद को यूनिक बनाने में नहीं।
जब आप बेस्ट बनने की कोशिश करते हैं, तो आप असल में दूसरों की नकल कर रहे होते हैं। आप वही प्रोडक्ट बेच रहे हैं, वही सर्विस दे रहे हैं और वही फीचर्स दे रहे हैं। ऐसे में कस्टमर के पास आपको चुनने की कोई खास वजह नहीं होती, सिवाय कम कीमत के। और कम कीमत पर धंधा करना सुसाइड करने जैसा है। माइकल पोर्टर के हिसाब से असली कॉम्पिटिटिव एडवांटेज तब मिलता है जब आप कुछ ऐसा करते हैं जो कोई और नहीं कर रहा।
मान लीजिए आप एक हेयर सैलून चलाते हैं। अब अगर आप वही बाल काटने की मशीन और वही कुर्सी लगाएंगे जो गली के बाकी १० सैलून में है, तो आप कभी पैसा नहीं बना पाएंगे। लेकिन अगर आप सिर्फ बच्चों के लिए सैलून खोलें जहाँ कुर्सी की जगह खिलौने वाली कार हो और कटिंग के बाद उन्हें फ्री चॉकलेट मिले, तो आपने खुद को अलग कर लिया। अब आप कॉम्पिटिशन से बाहर हैं क्योंकि आपने अपनी एक अलग दुनिया बना ली है। अब माँ बाप आपके पास ही आएंगे चाहे आप उनसे दोगुने पैसे क्यों न लें।
इसे ही पोर्टर यूनिक वैल्यू प्रपोजिशन कहते हैं। आपको मार्केट का लीडर बनने के लिए सबको पछाड़ना नहीं है, बल्कि एक ऐसा कोना ढूंढना है जहाँ आपके जैसा कोई और हो ही नहीं। अगर आप भी वही कर रहे हैं जो सब कर रहे हैं, तो आप बिजनेस नहीं कर रहे, आप बस भीड़ का हिस्सा हैं। और याद रखिए, भीड़ सिर्फ शोर मचाती है, पैसे नहीं कमाती।
लेसन २ : फाइव फोर्सेस का खेल और आपके असली दुश्मन
अक्सर बिजनेस चलाने वालों को लगता है कि उनका सबसे बड़ा दुश्मन सामने वाली गली का दुकानदार या वो बड़ी कंपनी है जो टीवी पर विज्ञापन देती है। लेकिन माइकल पोर्टर कहते हैं कि आप बहुत भोले हैं। कॉम्पिटिशन सिर्फ आपके डायरेक्ट प्रतिद्वंद्वी से नहीं होता। यह एक पांच तरफा जंग है जिसमें आप हर वक्त घिरे हुए हैं। अगर आप सिर्फ अपने बगल वाले कॉम्पिटिटर पर नजर रख रहे हैं, तो आप उस आदमी की तरह हैं जो सामने से आती साइकिल को देख रहा है और पीछे से आ रहे ट्रक से बेखबर है।
पहला फोर्स है आपके सप्लायर्स। अगर आपके बिजनेस का कच्चा माल देने वाला अकेला है, तो समझ लीजिए वो आपका असली मालिक है। वो जब चाहे दाम बढ़ाएगा और आपका प्रॉफिट डकार जाएगा। दूसरा फोर्स है आपके कस्टमर्स। आज के जमाने में कस्टमर किसी राजा से कम नहीं हैं। अगर उन्हें लगता है कि आपके पास कुछ खास नहीं है, तो वो एक क्लिक पर आपको छोड़ देंगे। वो आपसे डिस्काउंट मांगेंगे और आपकी जान निकाल लेंगे। तीसरा फोर्स है नए खिलाडी। आज आप खुश हैं कि आपका काम अच्छा चल रहा है, लेकिन कल सुबह कोई नया लड़का लैपटॉप लेकर आएगा और एक ऐप बनाकर आपका पूरा धंधा चौपट कर देगा।
चौथा फोर्स है सब्स्टीट्यूट्स यानी विकल्प। यह सबसे खतरनाक है। याद रखिए, रेलवे का कॉम्पिटिशन सिर्फ दूसरी ट्रेन से नहीं है, बल्कि उन सस्ती फ्लाइट्स और बस सर्विस से भी है जो लोगों को मंजिल तक पहुँचाती हैं। अगर लोग आपकी चीज का विकल्प ढूंढ लेते हैं, तो आपकी वैल्यू खत्म है। और पांचवा फोर्स है वो आपसी होड़ जो आप अपने जैसे दूसरे बिजनेस के साथ करते हैं।
मान लीजिए आप एक चाय की दुकान खोलते हैं। आपके सामने वाले ने भी चाय की दुकान खोली, यह तो सीधा कॉम्पिटिशन है। लेकिन अगर दूध वाला दाम बढ़ा दे, तो सप्लायर आपकी जेब काट रहा है। अगर कस्टमर कहे कि पास वाली दुकान पर बिस्कुट फ्री मिलता है, तो वो आपको कंट्रोल कर रहा है। अगर कोई जूस की दुकान खोल ले और लोग चाय छोड़कर जूस पीने लगें, तो यह सब्स्टीट्यूट का हमला है। और अगर कोई बड़ी कंपनी वहां वेंडिंग मशीन लगा दे, तो यह नया खिलाडी है।
अगर आप इन पांचों ताकतों को नहीं समझते, तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि बस किस्मत के भरोसे बैठे हैं। पोर्टर कहते हैं कि एक समझदार बिजनेसमैन वो है जो ऐसी जगह अपना किला बनाता है जहाँ ये पांचों फोर्स कमजोर पड़ जाएं। आपको ऐसी पोजीशन लेनी होगी जहाँ सप्लायर आपको डरा न सके और कस्टमर आपको छोड़कर जाना न चाहे। वरना आप बस मेहनत करते रहेंगे और मलाई कोई और खा जाएगा। क्या आप अब भी सोचते हैं कि आपका दुश्मन सिर्फ आपका पडोसी है। जाग जाइए, क्योंकि असली खेल तो आपकी नजरों के पीछे चल रहा है।
लेसन ३ : स्ट्रेटेजी का असली मतलब है यह जानना कि क्या नहीं करना है
दुनिया में सबसे बड़ा झूठ यह है कि एक सफल बिजनेस वो है जो सबको सब कुछ बेचता है। अगर आप सोचते हैं कि आप एक ही समय में सबसे सस्ती चीज भी बेच लेंगे और सबसे लग्जरी सर्विस भी दे देंगे, तो मुबारक हो, आप कन्फ्यूजन की फैक्ट्री चला रहे हैं। माइकल पोर्टर का सबसे पावरफुल लेसन यही है कि स्ट्रेटेजी बनाने का मतलब सिर्फ यह चुनना नहीं है कि क्या करना है, बल्कि यह फैसला लेना है कि क्या नहीं करना है।
ज्यादातर इंडियन बिजनेस ओनर्स को 'ना' बोलने से बहुत डर लगता है। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने किसी कस्टमर को मना कर दिया, तो लक्ष्मी घर से चली जाएगी। मान लीजिए आपका एक रेस्टोरेंट है। अब कोई कस्टमर आता है और कहता है कि भाई साहब चाय तो अच्छी है पर थोड़ा पास्ता भी रख लो। फिर कोई दूसरा आता है और कहता है कि यहाँ छोले भटूरे भी मिलने चाहिए। आप सबको खुश करने के चक्कर में अपने मेन्यू कार्ड को महाभारत की पोथी बना देते हैं। नतीजा क्या होता है। आपकी किचन में खिचड़ी पक जाती है, क्वालिटी गिर जाती है और आपका रेस्टोरेंट अपनी पहचान खो देता है। अब आप न तो इटालियन रहे और न ही देसी, आप बस एक कन्फ्यूज्ड ढाबा बनकर रह गए।
पोर्टर कहते हैं कि ट्रेड-ऑफ्स के बिना कोई स्ट्रेटेजी सफल नहीं हो सकती। ट्रेड-ऑफ्स का मतलब है एक चीज पाने के लिए दूसरी चीज का त्याग करना। अगर आप दुनिया की सबसे सुरक्षित कार बनाना चाहते हैं, तो शायद आप उसे दुनिया की सबसे सस्ती कार नहीं बना पाएंगे। अगर आप चाहते हैं कि आपका सामान सबसे प्रीमियम हो, तो आपको उन ग्राहकों को टाटा-बाय बाय कहना पड़ेगा जो सिर्फ डिस्काउंट के लिए मरते हैं। जो कंपनी सबको खुश करने की कोशिश करती है, वो अंत में किसी को भी खुश नहीं कर पाती।
आईफोन कभी भी अपनी स्क्रीन पर १० बटन नहीं देता और न ही वो १० हजार रुपये का फोन बेचता है। एप्पल को पता है कि उसे क्या नहीं करना है। वो लो-बजट मार्केट के पीछे नहीं भागते। वहीं दूसरी तरफ इंडिगो एयरलाइन्स को पता है कि उन्हें क्या नहीं करना है। वो आपको फ्री में खाना नहीं देंगे, वो आपको लग्जरी सीटें नहीं देंगे, क्योंकि उनका फोकस सिर्फ समय पर और सस्ते में पहुँचाने पर है। उन्होंने साफ कह दिया है कि अगर आपको मखमली आराम चाहिए, तो कहीं और जाइये। और इसी 'ना' की वजह से वो सबसे सफल हैं।
अगर आप अपने बिजनेस में हर किसी को अपना कस्टमर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप अपनी एनर्जी बर्बाद कर रहे हैं। आपको अपनी सीमाएं तय करनी होंगी। आपको यह तय करना होगा कि आप किन ऑर्डर्स को मना करेंगे और किन कस्टमर्स को दरवाजे से वापस भेजेंगे। यह सुनने में थोड़ा कड़वा लग सकता है, लेकिन सच यही है कि एक साफ और स्पष्ट 'ना' आपको एक मजबूत ब्रांड बनाने में मदद करती है। याद रखिये, एक ही नाव में पैर रखने वाला पार उतरता है, और जो दो नावों की सवारी करता है, उसका हाल तो आप जानते ही हैं। तो आज ही बैठिए और अपनी वो लिस्ट बनाइये कि आपको अपने बिजनेस में कौन से काम बंद करने हैं।
तो दोस्तों, माइकल पोर्टर की ये बातें सुनने में जितनी आसान हैं, असल लाइफ में उतारना उतना ही मुश्किल। क्या आप अब भी वही घिसी पिटी रेस का हिस्सा बने रहना चाहते हैं या फिर आप हिम्मत जुटाकर कुछ अलग करने को तैयार हैं। कमेंट्स में हमें जरूर बताएं कि आपके बिजनेस या करियर का वो कौन सा एक काम है जिसे आप आज से ही 'ना' बोलने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हर काम में टांग फंसाने की कोशिश करता है। याद रखिये, स्ट्रेटेजी का मतलब भीड़ के पीछे भागना नहीं, बल्कि अपनी खुद की राह बनाना है। चलिए, आज से ही कुछ अलग और यूनिक शुरू करते हैं।
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