क्या आप अभी भी उन पुराने दुकानदारों की तरह हर महीने नए कस्टमर की भीख मांग रहे हैं? अगर हां, तो मुबारक हो, आप बहुत जल्द मार्केट से गायब होने वाले हैं। जबकि आपके कॉम्पिटिटर चैन की नींद सो रहे हैं क्योंकि उनके कस्टमर खुद चलकर उन्हें हर महीने पैसा दे रहे हैं और आप बस डिस्काउंट के कूपन बांटने में बिजी हैं।
आज हम रॉबी बैक्सटर की किताब द मेंबरशिप इकोनमी से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपके बिजनेस को एक वन टाइम सेल से हटाकर हमेशा चलने वाली कमाई की मशीन बना देंगे। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन को समझते हैं।
लेसन १ : फॉरएवर ट्रांजैक्शन — शादी कीजिए, वन नाइट स्टैंड नहीं
मान लीजिए आप एक ऐसी दुकान चलाते हैं जहाँ कस्टमर आता है, सामान लेता है और फिर कभी शक्ल नहीं दिखाता। आप हर सुबह उठकर दुआ मांगते हैं कि हे भगवान आज कोई नया बकरा फंस जाए। क्या आपको नहीं लगता कि आप बिजनेस नहीं बल्कि जुआ खेल रहे हैं? रॉबी बैक्सटर कहती हैं कि अगर आप आज के जमाने में कामयाब होना चाहते हैं, तो आपको 'फॉरएवर ट्रांजैक्शन' यानी एक ऐसा रिश्ता बनाना होगा जो कभी खत्म न हो। पुराने जमाने में लोग सामान बेचते थे और भूल जाते थे, लेकिन आज की मेंबरशिप इकोनमी में आपको कस्टमर से शादी करनी पड़ती है। और यकीन मानिए, इस शादी में तलाक बहुत महंगा पड़ता है।
सोचिए, नेटफ्लिक्स या जिम की मेंबरशिप क्या है? ये सिर्फ सर्विस नहीं है, ये एक वादा है कि जब तक आप जिंदा हैं और एंटरटेनमेंट या बॉडी बनाना चाहते हैं, हम आपके साथ हैं। इंडिया में हमारे पास दूधवाले भैया का बेस्ट एग्जांपल है। वो कभी आपको मक्खन लगाने नहीं आते कि आज आधा लीटर दूध ले लो। उन्हें पता है कि आपने उनके साथ एक फॉरएवर ट्रांजैक्शन किया है। रोज सुबह घंटी बजेगी और दूध आपके दरवाजे पर होगा। न कोई मोल भाव, न कोई नया विज्ञापन। इसे ही कहते हैं चैन की नींद सोना।
लेकिन बहुत से स्टार्टअप वाले क्या करते हैं? वो बस अपनी मार्केटिंग की आग में पैसा झोंकते रहते हैं। उन्हें लगता है कि जितने ज्यादा लोग उनकी ऐप डाउनलोड करेंगे, वो उतने ही बड़े किंग बन जाएंगे। भाई साहब, अगर आपकी बाल्टी में छेद है, तो आप उसमें कितना भी पानी भर लें, वो खाली ही रहेगी। अगर आपका कस्टमर एक बार आकर दोबारा मुड़कर नहीं देख रहा, तो इसका मतलब है कि आपकी सर्विस में वो दम नहीं है कि वो आपसे वफादारी निभाए।
लोग अक्सर गलती यह करते हैं कि वो सिर्फ ट्रांजैक्शन पर फोकस करते हैं। 'मैंने माल बेचा, मुझे पैसे मिले, खेल खत्म'। मेंबरशिप इकोनमी कहती है कि खेल तो पैसा मिलने के बाद शुरू होता है। आपको अपने कस्टमर के दिमाग में यह बात डालनी होगी कि 'भाई, तुझे कहीं और जाने की जरूरत ही नहीं है'। जब आप किसी को मेंबर बनाते हैं, तो आप उसे एक कम्युनिटी का हिस्सा महसूस कराते हैं। इंसान को अकेलापन पसंद नहीं है, उसे ग्रुप में रहना पसंद है। जब आप उसे यह अहसास दिलाते हैं कि वो 'स्पेशल' है, तो वो आपको हर महीने पैसे देने में खुशी महसूस करता है।
सरल भाषा में कहूं तो, अगर आप अपनी गर्लफ्रेंड को हर रोज यह यकीन नहीं दिला सकते कि आप ही उसके लिए बेस्ट हैं, तो वो किसी और के साथ भाग जाएगी। बिजनेस में भी यही होता है। अगर आप अपने कस्टमर को हर रोज वैल्यू नहीं दे सकते, तो मार्केट में डिस्काउंट की दुकानें बहुत सजी हुई हैं। फॉरएवर ट्रांजैक्शन का मतलब है कि आप कस्टमर की प्रॉब्लम को जड़ से खत्म कर रहे हैं, न कि उसे बस एक पेनकिलर दे रहे हैं।
आजकल के दौर में जब हर चीज एक क्लिक पर मिल रही है, लोग भरोसा खरीदना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि कोई उनकी जिम्मेदारी ले ले। जब आप मेंबरशिप मॉडल अपनाते हैं, तो आप कस्टमर से कहते हैं कि 'तू टेंशन मत ले, तेरी ये जरूरत अब मेरी जिम्मेदारी है'। यही वो भरोसा है जो आपकी तिजोरी को हर महीने भरता रहेगा। चाहे मंदी आए या तूफान, अगर आपके पास वफादार मेंबर्स की फौज है, तो आपको कोई नहीं हिला सकता। तो अपनी बाल्टी के छेद बंद कीजिए और ऐसे रिश्ते बनाइए जो सात जन्मों तक तो नहीं, पर कम से कम आपके बिजनेस के अंत तक जरूर चलें।
लेसन २ : सुपर यूजर्स की तलाश — अपने असली यार पहचानिए
क्या आपने कभी गौर किया है कि आपके दोस्तों के ग्रुप में एक ऐसा बंदा जरूर होता है जो हर प्लान को हिट करवाता है? वही जो सबको फोन करके बुलाता है, गाड़ी का इंतजाम करता है और अगर आप मना करें तो घर तक खींच कर ले आता है। बिजनेस की दुनिया में ऐसे ही लोगों को 'सुपर यूजर्स' कहा जाता है। रॉबी बैक्सटर कहती हैं कि आपके बिजनेस की नैया पार लगाने के लिए आपको हजारों रैंडम कस्टमर्स की जरूरत नहीं है, बल्कि बस कुछ सौ सुपर यूजर्स ही काफी हैं। ये वो लोग हैं जो आपके ब्रांड के प्यार में इतने पागल हैं कि वो न सिर्फ आपका सामान खरीदते हैं, बल्कि आपके मार्केटिंग मैनेजर बनकर फ्री में आपका प्रमोशन भी करते हैं।
अब प्रॉब्लम यह है कि ज्यादातर बिजनेस वाले इन हीरों को पहचान नहीं पाते। वो उन लोगों के पीछे भागते हैं जो सेल के चक्कर में एक बार आए और फिर कभी नहीं दिखे। यह तो वैसा ही हुआ जैसे आप अपनी शादी में उन रिश्तेदारों को ज्यादा भाव दे रहे हैं जो सिर्फ पनीर की सब्जी पर कमेंट करने आए हैं, जबकि आपका वो जिगरी दोस्त भूखा प्यासा काम कर रहा है। सुपर यूजर्स वो हैं जो आपकी ऐप को रोज खोलते हैं, आपकी सर्विस में कमियां निकालकर आपको फीडबैक देते हैं ताकि आप बेहतर बन सकें। वो आपके ब्रांड को अपना मानते हैं। अगर आप उनके इस लगाव को नहीं समझ रहे, तो आप अपनी सबसे बड़ी ताकत को खो रहे हैं।
सोचिए एप्पल या रॉयल एनफील्ड के बारे में। क्या ये सिर्फ फोन या बाइक बेचते हैं? बिल्कुल नहीं। इनके पास एक ऐसी कम्युनिटी है जो अगर कल को गोबर भी पैक करके बेचेंगे, तो इनके सुपर यूजर्स लाइन लगाकर खड़े हो जाएंगे और दूसरों को भी समझाएंगे कि 'भाई, इसमें जो खुशबू है वो तू नहीं समझेगा'। इंडिया में भी आप देखिए, जो लोग किसी खास चाय की दुकान या जिम के दीवाने होते हैं, वो अपने मोहल्ले के दस लोगों को वहां जबरदस्ती लेकर जाते हैं। ये फ्री की मार्केटिंग जो क्रेडिबिलिटी देती है, वो करोड़ों के फेसबुक एड्स भी नहीं दे सकते।
लेकिन यहाँ एक कैच है। सुपर यूजर बनने के लिए आपको उन्हें सिर्फ कस्टमर नहीं बल्कि एक 'मेंबर' की तरह ट्रीट करना होगा। अगर आप उन्हें वही घिसे पिटे डिस्काउंट देंगे जो सबको मिल रहे हैं, तो वो बुरा मान जाएंगे। उन्हें चाहिए एक्सक्लूसिव एक्सेस, उन्हें चाहिए कि उनकी बात सुनी जाए। उन्हें वो पावर दीजिए कि वो आपकी कम्युनिटी को लीड कर सकें। जब आप अपने सबसे वफादार ग्राहकों को स्पेशल फील कराते हैं, तो वो आपके बिजनेस के लिए एक ऐसी ढाल बन जाते हैं जिसे कोई कॉम्पिटिटर नहीं तोड़ सकता।
अगर आप एक सुपर यूजर को नाराज करते हैं, तो आप सिर्फ एक कस्टमर नहीं खोते, बल्कि आप उस पूरे नेटवर्क को खो देते हैं जो वो आपके पास ला सकता था। सरकाज्म की बात तो यह है कि कंपनियां नए कस्टमर लाने के लिए तो लाखों खर्च करती हैं, लेकिन जो पुराने और वफादार लोग हैं, उनके लिए एक थैंक यू नोट भेजने में भी उनकी जान निकलती है। यह वही बात हो गई कि घर की मुर्गी दाल बराबर और बाहर के मेहमानों को पनीर टिक्का खिला रहे हैं। यकीन मानिए, जिस दिन आपने अपने सुपर यूजर्स की कद्र करना शुरू कर दिया, उस दिन आपका मार्केटिंग बजट आधा हो जाएगा और आपकी ग्रोथ डबल।
सुपर यूजर्स को ढूंढना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। अपने डेटा में देखिए कि कौन सा कस्टमर आपकी सर्विस बार बार यूज कर रहा है। कौन है जो सोशल मीडिया पर आपको टैग कर रहा है? उनसे बात कीजिए, उन्हें सरप्राइज दीजिए और उन्हें अपने बिजनेस का हिस्सा बनाइए। जब वो आपके साथ खड़े होंगे, तो दुनिया की कोई भी मंदी आपके धंधे को कम नहीं कर पाएगी। क्योंकि आखिर में, लोग ब्रांड से नहीं, लोगों से जुड़ते हैं।
लेसन ३ : वैल्यू का नशा — डिस्काउंट छोड़िए, आदत बनिए
अगर आपको लगता है कि आप बार-बार डिस्काउंट देकर कस्टमर को रोक लेंगे, तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। डिस्काउंट से आने वाला कस्टमर उस बिन पेंदे के लोटे जैसा होता है जिसे जहाँ दो रुपये सस्ता मिलेगा, वो वहीं लुढ़क जाएगा। रॉबी बैक्सटर का तीसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि मेंबरशिप इकोनमी में 'वैल्यू' ही राजा है। आपको अपने प्रोडक्ट को डिस्काउंट की बैसाखी पर नहीं, बल्कि कस्टमर की जरूरत और उसकी आदत पर खड़ा करना होगा। जब आपका प्रोडक्ट किसी की लाइफस्टाइल का हिस्सा बन जाता है, तो उसे पैसे देने में दर्द नहीं होता, बल्कि उसे न इस्तेमाल करने में बेचैनी होती है।
जरा सोचिए, आप अपनी केबल टीवी या इंटरनेट का बिल हर महीने बिना सोचे-समझे क्यों भरते हैं? क्योंकि उसके बिना आपकी जिंदगी अधूरी लगने लगती है। यही वो 'वैल्यू' है जो आपको एक मेंबर बनाए रखती है। इंडिया में हम लोग मुफ्त की चीज के पीछे भागते जरूर हैं, लेकिन हम उस चीज की इज्जत ज्यादा करते हैं जो हमारी मुश्किल आसान करती है। अगर आपकी सर्विस कस्टमर का टाइम बचा रही है, उसे स्टेटस दे रही है या उसका कोई बड़ा सिरदर्द खत्म कर रही है, तो यकीन मानिए, वो आपका दामन कभी नहीं छोड़ेगा।
बहुत से लोग बिजनेस शुरू करते ही एडवर्टाइजिंग पर पैसा पानी की तरह बहाने लगते हैं। उनका पूरा फोकस इस बात पर होता है कि लोग उनके बारे में जानें। लेकिन भाई साहब, अगर आपके रेस्टोरेंट का खाना ही बकवास है, तो आप दुनिया के सबसे बड़े होर्डिंग लगवा लें, लोग एक बार आएंगे और दोबारा कभी मुड़कर नहीं देखेंगे। असली जादू तो तब होता है जब आप अपने एक्जिस्टिंग मेंबर्स को इतनी ज्यादा वैल्यू देते हैं कि वो खुद दूसरों को बताएं। सरकाज्म तो देखिए, कंपनियां नए कस्टमर को लुभाने के लिए तो 'फर्स्ट ऑर्डर पर 50 परसेंट ऑफ' देती हैं, लेकिन जो बेचारा तीन साल से उनसे जुड़ा है, उसे पूरा पैसा देना पड़ता है। यह तो वफादारी की सरेआम बेइज्जती है।
वैल्यू का मतलब सिर्फ फीचर बढ़ाना नहीं होता। कभी-कभी वैल्यू का मतलब होता है 'सिंप्लिसिटी'। कस्टमर को कंफ्यूज मत कीजिए। उसे इतना आसान और स्मूथ एक्सपीरियंस दीजिए कि उसे आपके कॉम्पिटिटर की ऐप यूज करना पहाड़ चढ़ने जैसा लगे। जब आप उसे एक 'इकोसिस्टम' में बांध लेते हैं, जहाँ उसकी सारी जरूरतें एक ही जगह पूरी हो रही हैं, तब आप एक फॉरएवर ट्रांजैक्शन की नींव रख देते हैं। याद रखिए, मार्केट में आपसे सस्ता बेचने वाला कोई न कोई हमेशा मिल जाएगा, लेकिन आपकी जैसी वैल्यू और केयर देने वाला कोई नहीं होना चाहिए।
जब आप अपने लेसन 01 (रिश्ता बनाना) और लेसन 02 (सुपर यूजर्स) को इस तीसरे लेसन के साथ जोड़ देते हैं, तब आपका बिजनेस एक अमर कहानी बन जाता है। यह एक ऐसा सफर है जहाँ आप अकेले नहीं चलते, बल्कि आपके साथ आपके वफादार मेंबर्स की एक फौज होती है जो हर मुश्किल में आपके साथ खड़ी रहती है। बिजनेस सिर्फ ट्रांजैक्शन का नाम नहीं है, यह तो लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने का एक जरिया है। अगर आप उनकी लाइफ में वैल्यू ऐड कर रहे हैं, तो वो आपकी तिजोरी में वैल्यू ऐड करना कभी बंद नहीं करेंगे।
दोस्तों, बिजनेस करने का पुराना तरीका अब मर चुका है। अब सवाल यह नहीं है कि आप कितना बेचते हैं, बल्कि यह है कि आपके साथ कितने लोग टिके रहते हैं। क्या आप भी अपने कस्टमर के साथ वो 'फॉरएवर ट्रांजैक्शन' शुरू करने के लिए तैयार हैं? नीचे कमेंट में बताइए कि आपके बिजनेस का वो एक 'सुपर यूजर' कौन है जिसे आप कभी खोना नहीं चाहेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिए जो आज भी सिर्फ डिस्काउंट के भरोसे धंधा चला रहा है। चलिए, मिलकर एक ऐसी कम्युनिटी बनाते हैं जहाँ प्रॉफिट से ज्यादा लोगों की कद्र हो।
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