क्या आप भी उन्हीं लोगों में से हैं जो दिन रात गधों की तरह मेहनत करके खुद को बहुत बड़ा परफॉर्मर समझ रहे हैं। मुबारक हो आप लाइफ भर सिर्फ दूसरों के सपने पूरे करेंगे और कभी खुद का बड़ा एंपायर खड़ा नहीं कर पाएंगे क्योंकि आपको असली वैल्यू क्रिएट करना आता ही नहीं है। जबकि स्मार्ट लोग बिलेनियर माइंडसेट सीखकर आपसे कोसों आगे निकल रहे हैं और आप बस तालियां बजाते रह जाएंगे।
आज हम जॉन स्वियोक्ला और मिच कोहेन की बेहतरीन किताब द सेल्फ मेड बिलेनियर इफेक्ट के बारे में बात करेंगे। यह आर्टिकल आपको उन ३ खास लेसन के बारे में बताएगा जो एक साधारण परफॉर्मर और एक लेजेंडरी प्रोड्यूसर के बीच की दीवार को हमेशा के लिए गिरा देंगे।
लेसन १ : परफॉर्मर नहीं प्रोड्यूसर बनिए
क्या आपको लगता है कि ऑफिस में बॉस की हर बात मानकर और अपना काम समय पर पूरा करके आप एक दिन बिलेनियर बन जाएंगे। अगर हां तो आपको अपनी इस मासूमियत पर थोड़ा हंसना चाहिए और फिर हकीकत का सामना करना चाहिए। दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं और इसी अंतर में सारा पैसा और पावर छिपा है। एक होता है परफॉर्मर और दूसरा होता है प्रोड्यूसर। परफॉर्मर वो इंसान है जो किसी और के बनाए हुए रास्ते पर बहुत अच्छे से चलना जानता है। वो एक ऐसी मशीन का पुर्जा है जो पहले से ही सेट है। उसे बताया जाता है कि सुबह ९ बजे आना है और शाम को ६ बजे फाइल जमा करनी है। वो यह काम बहुत सफाई से करता है और बदले में उसे एक फिक्स सैलरी और साल में एक बार छोटा सा प्रमोशन मिल जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस मशीन को बनाया किसने है।
यहीं एंट्री होती है प्रोड्यूसर की। प्रोड्यूसर वो नहीं है जो सिर्फ काम करता है बल्कि वो है जो नई वैल्यू क्रिएट करता है। वो यह नहीं देखता कि दुनिया कैसे चल रही है बल्कि वो यह देखता है कि दुनिया में क्या कमी है। चलिए इसे एक मजेदार एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिए एक बहुत बड़ा रेस्टोरेंट है। वहाँ का शेफ एक बहुत अच्छा परफॉर्मर है। वो दुनिया का सबसे टेस्टी पनीर टिक्का बनाता है। लोग उसकी तारीफ करते हैं और उसे अच्छी पगार भी मिलती है। लेकिन क्या वो शेफ कभी बिलेनियर बनेगा। शायद कभी नहीं। बिलेनियर वो इंसान बनेगा जिसने उस रेस्टोरेंट का कॉन्सेप्ट सोचा। जिसने यह समझा कि लोग सिर्फ खाना नहीं बल्कि एक एक्सपीरियंस चाहते हैं। जिसने एक ऐसा सिस्टम बनाया जहाँ उसके बिना मौजूद रहे भी हजारों शेफ खाना बना रहे हैं। प्रोड्यूसर वो इंसान है जो जीरो से वन (0 to 1) का सफर तय करता है।
हकीकत तो यह है कि हमारे एजुकेशन सिस्टम ने हमें सिर्फ एक अच्छा गुलाम यानी परफॉर्मर बनना सिखाया है। हमें कहा गया कि चुपचाप बैठो और जो सिलेबस में है वही पढ़ो। लेकिन बिलेनियर बनने वाले लोग अक्सर क्लास के वो बैकबेंचर होते थे जो टीचर से अजीब सवाल पूछते थे। वे सिस्टम को फॉलो करने के बजाय सिस्टम को तोड़ने और फिर से जोड़ने में यकीन रखते थे। अगर आप भी बस अपनी टू-डू लिस्ट खत्म करके खुश हो जाते हैं तो आप एक बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं। आप बस एक बहुत बड़ी बिल्डिंग की एक ईंट बनकर रह गए हैं। आपको उस बिल्डिंग का आर्किटेक्ट बनना होगा।
प्रोड्यूसर बनने का मतलब यह नहीं है कि आप कल ही अपनी नौकरी छोड़ दें और सड़क पर आ जाएं। इसका मतलब है अपना नजरिया बदलना। एक परफॉर्मर हमेशा सोचता है कि मुझे क्या मिलेगा। जबकि एक प्रोड्यूसर हमेशा यह सोचता है कि मैं इस बिजनेस या इस मार्केट में ऐसा क्या जोड़ सकता हूं जो पहले कभी नहीं था। वो रिस्क लेता है क्योंकि उसे पता है कि बिना कुछ दांव पर लगाए कुछ बड़ा हासिल नहीं किया जा सकता। परफॉर्मर हमेशा सेफ्टी ढूंढता है और यही सेफ्टी उसे कभी अमीर नहीं होने देती। बिलेनियर इफेक्ट का सबसे पहला और कड़वा सच यही है कि अगर आप सिर्फ हुक्म बजाने में माहिर हैं तो आप अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की तिजोरियां भरने में निकाल देंगे। खुद की तिजोरी भरने के लिए आपको वो आईडिया पैदा करना होगा जो लोगों की लाइफ बदल दे।
लेसन २ : परसेप्टिव इमेजिनेशन का जादू
क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया में सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब कुछ लोग अचानक से आकर ऐसा क्या कर देते हैं कि पूरी मार्केट ही बदल जाती है। इसे कहते हैं परसेप्टिव इमेजिनेशन। आसान भाषा में कहें तो, वो देखना जो अभी मौजूद ही नहीं है। एक साधारण इंसान वही देखता है जो उसके सामने है, जैसे कि महंगाई बढ़ गई है या नौकरी में कंपटीशन बहुत है। लेकिन एक बिलेनियर माइंडसेट वाला इंसान उस समस्या के अंदर छिपे हुए खजाने को देख लेता है। अगर आपको लगता है कि सिर्फ मेहनत करने से पैसा आता है, तो यकीन मानिए एक रिक्शा चलाने वाला आज दुनिया का सबसे अमीर आदमी होता। असली खेल तो आपकी कल्पना और उसे हकीकत में बदलने की हिम्मत का है।
मान लीजिए आप एक ऐसे शहर में रहते हैं जहाँ बहुत बारिश होती है। एक आम इंसान क्या करेगा। वो बारिश को कोसेगा, अपने जूते खराब होने का रोना रोएगा और घर में बैठकर पकोड़े खाएगा। लेकिन एक परसेप्टिव इमेजिनेशन वाला इंसान सोचेगा कि क्यों न एक ऐसा जूता बनाया जाए जो पानी में खराब ही न हो और देखने में भी कूल लगे। उसने वो चीज देख ली जिसकी लोगों को जरूरत थी, पर उन्हें खुद नहीं पता था। बिलेनियर्स भविष्य के दुख को आज की अपॉर्चुनिटी बना लेते हैं। वे मार्केट की उन दरारों को ढूंढते हैं जिन्हें किसी ने भरा नहीं है। अगर आप सिर्फ दूसरों की नकल कर रहे हैं, तो आप बस एक फोटोकॉपी मशीन हैं। और याद रखिए, फोटोकॉपी की कीमत हमेशा ओरिजिनल से कम होती है।
ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी यह सोचने में निकाल देते हैं कि काश मेरे पास बहुत सारा पैसा होता तो मैं बिजनेस शुरू करता। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई कहे कि जब सारी ट्रैफिक लाइट ग्रीन हो जाएंगी, तभी मैं घर से बाहर निकलूँगा। बिलेनियर्स के पास शुरुआत में कोई जादू की छड़ी नहीं होती। उनके पास बस एक धुंधली सी तस्वीर होती है कि दुनिया कैसी दिख सकती है। वे उस तस्वीर पर भरोसा करते हैं और उस पर काम करना शुरू कर देते हैं। जब स्टीव जॉब्स ने आईफोन बनाने का सोचा था, तब लोगों को लगा था कि बटन वाले फोन ही बेस्ट हैं। लेकिन उन्होंने वो देखा जो किसी ने नहीं देखा था। उन्होंने लोगों की आदतें बदलने का रिस्क लिया।
हकीकत तो यह है कि परसेप्टिव इमेजिनेशन के लिए आपको थोड़ा पागल होना पड़ता है। आपको उन चीजों पर यकीन करना पड़ता है जिन पर दुनिया हंसती है। अगर आपके आईडिया पर कोई हंस नहीं रहा है, तो समझ लीजिए आपका आईडिया बहुत छोटा है। बिलेनियर बनने का सफर आपकी आंखों से नहीं, बल्कि आपके दिमाग की गहराई से शुरू होता है। आप जिस भी फील्ड में हैं, वहां खुद से पूछिए कि यहाँ क्या गायब है। लोग किस बात से परेशान हैं और मैं उनकी लाइफ को थोड़ा और आसान कैसे बना सकता हूं। जब आप समस्या के बजाय समाधान पर फोकस करते हैं, तो पैसा आपके पीछे भागने लगता है। लेकिन अगर आप सिर्फ दूसरों का बचा हुआ खाना ढूंढ रहे हैं, तो आप कभी अपना खुद का दावतनामा तैयार नहीं कर पाएंगे।
लेसन ३ : स्मार्ट रिस्क और पावरफुल पार्टनरशिप
अगर आपको लगता है कि बिलेनियर्स अकेले ही दुनिया जीत लेते हैं, तो शायद आप अभी भी सुपरहीरो फिल्मों के असर में हैं। हकीकत इससे बिल्कुल अलग और थोड़ी मजेदार है। एक सफल प्रोड्यूसर कभी भी 'अकेला वारियर' बनने की कोशिश नहीं करता क्योंकि उसे पता है कि एक अकेला इंसान सिर्फ उतना ही काम कर सकता है जितने उसके हाथ और घंटे हैं। असली ग्रोथ तब आती है जब आप कैलकुलेटेड रिस्क लेते हैं और ऐसे लोगों के साथ हाथ मिलाते हैं जो उन चीजों में माहिर हैं जिनमें आप कच्चे हैं। बिलेनियर बनने का मतलब जुआ खेलना नहीं है, बल्कि एक ऐसा दांव लगाना है जहाँ हारने का डर कम और जीतने का मौका बहुत बड़ा हो।
मान लीजिए आपको एक बहुत बड़ा महल बनाना है। अब आपके पास आईडिया तो जबरदस्त है, लेकिन आपको ईंट जोड़ना नहीं आता। एक आम इंसान क्या करेगा। वो खुद ईंट जोड़ना सीखने लगेगा और अपनी आधी जिंदगी उसी में बर्बाद कर देगा। लेकिन एक बिलेनियर माइंडसेट वाला इंसान सबसे पहले दुनिया का सबसे बेस्ट राजमिस्त्री ढूंढेगा। वो खुद रिस्क लेगा, पैसा अरेंज करेगा और उस मिस्त्री को अपना पार्टनर बना लेगा। यहाँ रिस्क यह नहीं है कि महल गिरेगा या नहीं, बल्कि रिस्क यह है कि क्या आप सही इंसान पर भरोसा कर रहे हैं। बिलेनियर्स लोगों को पहचानना और उन्हें अपने विजन के साथ जोड़ना जानते हैं। वे जानते हैं कि एक और एक मिलकर ग्यारह कैसे होते हैं।
ज्यादातर लोग रिस्क लेने से इसलिए डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका सब कुछ लुट जाएगा। वे अपनी छोटी सी सेविंग्स को सीने से लगाकर बैठे रहते हैं और फिर सोचते हैं कि वे अमीर क्यों नहीं बन रहे। भाई, जब तक बीज को मिट्टी में डालकर उसे खोने का रिस्क नहीं लोगे, तब तक पेड़ कैसे उगेगा। बिलेनियर्स अंधे होकर खाई में नहीं कूदते, वे पहले खाई की गहराई नापते हैं और फिर एक मजबूत रस्सी यानी पार्टनरशिप के साथ उसमें उतरते हैं। वे जानते हैं कि अगर वे फेल भी हुए, तो उनके पास एक ऐसी टीम है जो उन्हें वापस खड़ा कर देगी। वे अपनी कमियों को छुपाते नहीं हैं, बल्कि उन कमियों को भरने के लिए एक्सपर्ट्स को साथ लाते हैं।
आखिर में, यह पूरी किताब हमें यही सिखाती है कि बिलेनियर बनना कोई किस्मत का खेल नहीं है, बल्कि एक सोची समझी स्ट्रेटेजी है। परफॉर्मर की भीड़ से बाहर निकलना, अपनी कल्पना को पंख देना और सही लोगों के साथ मिलकर बड़े रिस्क उठाना ही वो जादुई फॉर्मूला है। अगर आप आज भी वही कर रहे हैं जो सब कर रहे हैं, तो तैयार रहिए वही पाने के लिए जो सबको मिल रहा है यानी औसत जिंदगी। लेकिन अगर आप इस 'बिलेनियर इफेक्ट' को समझ गए हैं, तो आज से ही अपनी वैल्यू क्रिएट करना शुरू कीजिए। याद रखिए, दुनिया प्रोड्यूसर्स को याद रखती है, परफॉर्मर्स तो बस इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाते हैं। अब फैसला आपका है कि आपको तालियां बजानी हैं या तालियां बटोरनी हैं।
क्या आप आज भी एक परफॉर्मर की तरह सिर्फ दूसरों के हुक्म का इंतजार कर रहे हैं या एक प्रोड्यूसर बनकर अपनी तकदीर खुद लिखने के लिए तैयार हैं। नीचे कमेंट्स में 'प्रोड्यूसर' लिखें अगर आप आज से ही अपनी वैल्यू क्रिएट करने का संकल्प लेते हैं। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर करें जो बहुत मेहनत तो करता है लेकिन सही दिशा में नहीं। याद रखिए, आपकी एक छोटी सी सोच आपके पूरे भविष्य को बदल सकती है। चलिए, साथ मिलकर कुछ बड़ा क्रिएट करते हैं।
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