The People Equation (Hindi)


आप अभी भी यही सोचते हैं कि एक करोड़ का आईडिया आपको रातों रात अमीर बना देगा। मुबारक हो आप गलत हैं। शानदार प्रोडक्ट बना लिया पर टीम कचरा है तो बिजनेस डूबेगा ही। बिना सही लोगों के आपका विजन सिर्फ एक महंगा सपना बनकर रह जाएगा और आप बस देखते रह जाएंगे।

लेकिन रुकिए। हार मानने की जरूरत नहीं है। देबोराह पिसियोन की बुक दी पीपल इक्वेशन हमें बताती है कि असली जादू आईडिया में नहीं बल्कि लोगों में होता है। चलिए समझते हैं इस बुक के वो ३ बड़े लेसन जो आपके काम करने का तरीका बदल देंगे।


लेसन १ : टैलेंट ही असली एसेट है

अगर आपको लगता है कि एक धांसू आईडिया और भारी भरकम फंडिंग आपके स्टार्टअप को चांद पर ले जाएगी तो आप शायद किसी अलग ही दुनिया में जी रहे हैं। असलियत तो यह है कि बिना सही टैलेंट के आपका आईडिया सिर्फ एक बिना इंजन वाली चमचमाती कार जैसा है। बहुत से लोग सोचते हैं कि वे एक बढ़िया सॉफ्टवेयर बना लेंगे या एक जबरदस्त प्रोडक्ट लॉन्च कर देंगे और दुनिया उनके कदमों में होगी। लेकिन भाई साहब वह प्रोडक्ट अपने आप नहीं बनता। उसे बनाने वाले वह लोग होते हैं जो रात भर जागकर कोडिंग करते हैं या क्लाइंट की गालियां सुनकर भी स्माइल के साथ सेल्स क्लोज करते हैं।

जरा सोचिए आपके पास एक रेस्तरां खोलने का प्लान है। इंटीरियर एकदम आलीशान है और लोकेशन भी प्राइम है। लेकिन अगर आपका शेफ नमक की जगह चीनी डाल देता है और वेटर को लगता है कि कस्टमर को घूरना उसकी जॉब प्रोफाइल का हिस्सा है तो क्या होगा? आपका वह करोड़ों का सेटअप कबाड़ बन जाएगा। लोग आपके टाइल्स देखने नहीं बल्कि उस शेफ के हाथ का स्वाद चखने आते हैं। यही बात बिजनेस पर लागू होती है। देबोराह पिसियोन अपनी बुक में साफ कहती हैं कि लोग एसेट नहीं हैं बल्कि वे ही कंपनी हैं। जब तक आप अपने टैलेंट को सबसे ऊपर नहीं रखते तब तक आप सिर्फ एक मैनेज्ड फेलियर की तैयारी कर रहे हैं।

आजकल के कॉर्पोरेट जगत में एक बहुत बड़ा मजाक चलता है जिसे हम एम्प्लॉई एप्रिसिएशन कहते हैं। साल में एक बार पिज्जा पार्टी दे दी या दिवाली पर एक सस्ता सा गिफ्ट हैंपर पकड़ा दिया और बॉस को लगता है कि अब तो एम्प्लॉई अपनी जान दे देगा। यह वही बात हुई कि आप अपनी गाड़ी में पेट्रोल की जगह पानी डाल रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि वह रॉकेट की तरह उड़ेगी। असली टैलेंट मैनेजमेंट वह नहीं है। टैलेंट को पहचानने का मतलब है उनकी क्रिएटिविटी की इज्जत करना। उन्हें वह स्पेस देना जहाँ वे खुल कर सांस ले सकें और नए आईडियाज पर काम कर सकें।

जरा अपने आसपास देखिये। कुछ कंपनियाँ ऐसी होती हैं जहाँ लोग मंडे आने का इंतजार करते हैं और कुछ ऐसी जहाँ संडे की रात से ही लोगों को बुखार आने लगता है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहली कंपनी ने समझ लिया है कि उनके लोग ही उनकी असली ताकत हैं। अगर आपकी टीम का सबसे होनहार लड़का अपनी बात कहने से डरता है क्योंकि उसे लगता है कि बॉस चिल्लाएगा तो समझ लीजिये कि आपने अपना सबसे कीमती एसेट खो दिया है। एक डरा हुआ दिमाग कभी इनोवेट नहीं कर सकता। वह सिर्फ वही करेगा जो उसे बोला गया है। और जो सिर्फ बोला हुआ काम करते हैं वे रोबोट होते हैं एम्प्लॉई नहीं।

इनोवेशन का सीधा संबंध इंसानी दिमाग की आजादी से है। जब आप लोगों को यह भरोसा दिलाते हैं कि उनका विजन उतना ही जरूरी है जितना कि कंपनी का प्रॉफिट तब जाकर असली ग्रोथ शुरू होती है। आप दुनिया भर के टूल्स खरीद सकते हैं बेस्ट एआई का इस्तेमाल कर सकते हैं लेकिन वह एक छोटी सी चिंगारी जो एक नया प्रोडक्ट जन्म देती है वह हमेशा एक इंसान के दिमाग से ही निकलेगी। इसलिए अगर आप अपनी कंपनी या अपनी टीम को नंबर वन बनाना चाहते हैं तो मशीनों पर नहीं बल्कि उन चेहरों पर ध्यान दीजिये जो सुबह नौ बजे आपके ऑफिस में दाखिल होते हैं।


लेसन २ : कंट्रोल्ड रिस्क और फेलियर का कल्चर

अगर आप ऐसे इंसान हैं जो गलती होने पर अपने जूनियर को ऐसे देखते हैं जैसे उसने आपका किडनी चुरा लिया हो तो यकीन मानिए आप इनोवेशन के सबसे बड़े दुश्मन हैं। हमारे यहाँ बचपन से सिखाया जाता है कि फेल होना पाप है। स्कूल में कम नंबर आए तो शर्मा जी का लड़का मिसाल बन जाता है और ऑफिस में एक प्रोजेक्ट बिगड़ा नहीं कि बॉस की नजरें सीधे आपके अप्रेजल पर जाकर टिक जाती हैं। लेकिन दी पीपल इक्वेशन हमें एक कड़वा सच बताती है। अगर आप फेल नहीं हो रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप कुछ नया कर ही नहीं रहे हैं। आप बस उसी घिसी पिटी लकीर के फकीर बने हुए हैं जिसे दुनिया कब का छोड़ चुकी है।

कल्पना कीजिये एक ऐसे बच्चे की जो साइकिल चलाना सीख रहा है। क्या आप उसे पहले दिन ही गिरते देख यह कहेंगे कि बस बेटा तुझसे ना हो पाएगा अब तू पैदल ही चल? बिल्कुल नहीं। आप जानते हैं कि घुटने छिलेंगे तभी बैलेंस आएगा। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। अगर आपकी टीम में कोई नया आईडिया लेकर आता है और आप उसे यह कहकर चुप करा देते हैं कि अगर यह नहीं चला तो तुम्हारी सैलरी कटेगी तो समझ लीजिये कि आपने उसी पल अपनी कंपनी की क्रिएटिविटी का गला घोंट दिया है। इनोवेशन कोई मैजिक बटन नहीं है जिसे दबाया और रिजल्ट आ गया। यह एक एक्सपेरिमेंट है जिसमें फेलियर की गुंजाइश हमेशा रहती है।

सिलिकॉन वैली की बड़ी कंपनियाँ फेलियर को सेलिब्रेट करती हैं। वहां फेल होना बेइज्जती नहीं बल्कि एक्सपीरियंस माना जाता है। और एक तरफ हमारा देसी माहौल है जहाँ अगर कॉफी मशीन भी खराब हो जाए तो लोग ढूंढने लगते हैं कि आखिरी बार इसे छुआ किसने था। जब तक आप अपने वर्कप्लेस पर साइकोलॉजिकल सेफ्टी नहीं देंगे तब तक कोई भी रिस्क लेने की हिम्मत नहीं करेगा। लोग सिर्फ वही काम करेंगे जो सेफ है। और सेफ काम करने से आप एवरेज तो बन सकते हैं लेकिन एप्पल या गूगल नहीं बन सकते। एक लीडर का काम गलती पर चिल्लाना नहीं बल्कि यह पूछना है कि हमने इससे क्या सीखा और अगली बार इसे बेहतर कैसे करेंगे।

मान लीजिये आप एक मार्केटिंग हेड हैं और आपने एक कैंपेन पर लाखों रुपये खर्च कर दिए पर नतीजा निकला जीरो। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि आप अपनी टीम को मीटिंग रूम में बुलाकर उनकी क्लास लें और उन्हें इतना डरा दें कि अगली बार वे कोई आईडिया ही न दें। दूसरा रास्ता यह है कि आप उस फेलियर को एक डेटा पॉइंट की तरह देखें। आप समझें कि ऑडियंस को क्या पसंद नहीं आया। जब आप डर का माहौल खत्म करते हैं तभी लोग वह बाउंड्री तोड़ पाते हैं जिसे बाकी लोग नामुमकिन समझते हैं।

कंट्रोल्ड रिस्क का मतलब यह नहीं है कि आप आंख बंद करके कुएं में कूद जाएं। इसका मतलब है छोटे छोटे एक्सपेरिमेंट करना। अगर कोई फेल भी हो गया तो पूरी कंपनी बर्बाद नहीं होनी चाहिए। लेकिन उस छोटे फेलियर से जो सबक मिलता है वह करोड़ों की ट्रेनिंग से ज्यादा कीमती होता है। याद रखिये इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है जिन्होंने कुछ अलग करने की कोशिश की और उस कोशिश में दस बार गिरे। जो कभी गिरा ही नहीं वह शायद कभी अपनी कुर्सी से उठा ही नहीं। इसलिए अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम दुनिया बदले तो उन्हें गलती करने का लाइसेंस दीजिये।


लेसन ३ : हाइरार्की को खत्म करना

अगर आपको लगता है कि ऑफिस में अपनी केबिन के बाहर नेमप्लेट लगाकर और लोगों को अपनी उंगलियों पर नचाकर आप एक महान लीडर बन जाएंगे तो आप शायद किसी अठारहवीं सदी के राजा की कहानी में जी रहे हैं। आज के दौर में वह पुराना टॉप डाउन मॉडल पूरी तरह से एक्सपायर हो चुका है जहाँ बॉस हमेशा सही होता था और नीचे वाले सिर्फ जी हुजूर करते थे। दी पीपल इक्वेशन हमें यह सिखाती है कि टैलेंट किसी औहदे या डेजिग्नेशन का मोहताज नहीं होता। कभी कभी कंपनी का सबसे बड़ा आईडिया उस इंटर्न के दिमाग से निकलता है जो अभी अभी कॉलेज से आया है और जिसे आपने सिर्फ कॉफी लाने के काम पर लगा रखा है।

सोचिये आप एक ऐसी बस में सफर कर रहे हैं जिसका ड्राइवर रास्ता भटक गया है। पीछे बैठा एक पैसेंजर चिल्लाकर कहता है कि साहब आगे रास्ता बंद है दाएँ मुड़ जाओ। लेकिन ड्राइवर कहता है कि चुप बैठ मैं इस बस का कैप्टन हूँ मुझे सब पता है। नतीजा क्या होगा? बस सीधे खड्ढे में गिरेगी। कंपनियों में भी यही होता है। जब एक जूनियर को दिखता है कि प्रोजेक्ट में कोई बड़ी गड़बड़ है लेकिन वह डर के मारे चुप रहता है क्योंकि बॉस का ईगो उसके काम से बड़ा है तो कंपनी का डूबना तय है। हाइरार्की की दीवारें जितनी ऊंची होती हैं इनोवेशन की आवाज उतनी ही दबी रह जाती है।

असल में ये टाइटल्स जैसे मैनेजर या डायरेक्टर सिर्फ फाइलों में अच्छे लगते हैं। जब बात काम की आती है तो एक असली लीडर वह है जो टेबल के सबसे पीछे बैठकर सबकी बात सुनता है। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आईडिया किसका है उसे सिर्फ इस बात से मतलब है कि आईडिया सही है या नहीं। अगर आप अपनी कंपनी में ऐसा माहौल नहीं बना सकते जहाँ एक छोटा कर्मचारी भी बिना झिझक आपको टोक सके तो समझ लीजिये कि आपने अपनी टीम को गूंगा और बहरा बना दिया है। और गूंगी टीमें कभी वर्ल्ड क्लास प्रोडक्ट्स नहीं बना सकतीं।

एक बहुत ही फनी बात यह है कि कुछ बॉस अपने केबिन को किसी मंदिर के गर्भगृह जैसा बना लेते हैं जहाँ घुसने के लिए भी एम्प्लॉई को दस बार सोचना पड़ता है। यह लीडरशिप नहीं बल्कि असुरक्षा की निशानी है। असली ताकत लोगों को डराने में नहीं बल्कि उन्हें एम्पावर करने में है। जब आप हाइरार्की को खत्म करते हैं और लोगों को डिसीजन लेने की आजादी देते हैं तो वे उस काम को अपनी जिम्मेदारी समझने लगते हैं। फिर उन्हें धक्का मारने की जरूरत नहीं पड़ती वे खुद अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं। क्योंकि अब वे सिर्फ एक एम्प्लॉई नहीं बल्कि उस मिशन का हिस्सा बन चुके हैं।

इनोवेशन तब होता है जब एक कंपनी एक छोटे परिवार की तरह काम करती है जहाँ हर किसी की राय मायने रखती है। जब आप ऊंच नीच का भेदभाव छोड़कर सिर्फ काम और क्रिएटिविटी पर फोकस करते हैं तो एक ऐसा जादुई माहौल बनता है जहाँ हर कोई अपना बेस्ट देना चाहता है। याद रखिये आपके पास दुनिया के सबसे महंगे टूल्स हो सकते हैं लेकिन अगर आपकी टीम की बॉन्डिंग और कम्युनिकेशन खराब है तो सब बेकार है। इसलिए अपनी केबिन के दरवाजे खोलिये लोगों से बात कीजिये और उन्हें महसूस कराइये कि उनका हर छोटा सुझाव भी कंपनी के लिए बहुत बड़ा बदलाव ला सकता है।


तो दोस्तों, दी पीपल इक्वेशन का सार यही है कि प्रोडक्ट्स तो कोई भी कॉपी कर सकता है लेकिन आपकी टीम और उनके काम करने का तरीका कोई नहीं चुरा सकता। आज ही अपने आसपास के लोगों को सिर्फ नंबर्स की तरह देखना बंद कीजिये और उन्हें वह इज्जत और स्पेस दीजिये जिसके वे हकदार हैं। क्या आप अपनी टीम में बदलाव लाने के लिए तैयार हैं? कमेंट्स में बताइये कि आप अपनी कंपनी के कल्चर को बेहतर बनाने के लिए क्या कदम उठाएंगे। इस आर्टिकल को अपने उस बॉस या दोस्त के साथ शेयर कीजिये जिसे इसकी सख्त जरूरत है।

-----

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#Innovation #Leadership #TeamBuilding #StartupCulture #EmployeeEngagement


_

Post a Comment

Previous Post Next Post