The Startup Way (Hindi)


क्या आप अभी भी उसी पुराने घिसे पिटे मैनेजमेंट के भरोसे बैठे हैं। मुबारक हो। आप अपनी कंपनी को खुद अपने हाथों से डुबो रहे हैं। जब पूरी दुनिया बुलेट ट्रेन की स्पीड से बदल रही है तब आप बैलगाड़ी चलाकर सक्सेस की उम्मीद कर रहे हैं। यह आलस आपको बहुत भारी पड़ेगा।

लेकिन फिक्र मत कीजिए। आज हम एरिक रीस की किताब द स्टार्टअप वे से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपकी कंपनी और करियर का डी एन ए बदल देंगे। चलिए देखते हैं वो 3 पावरफुल लेसन जो आपको एक लीडर बनाएंगे।


लेसन १ : एंटरप्रेन्योरियल मैनेजमेंट का पावर

आजकल के जमाने में अगर आप अपनी कंपनी को पुराने स्टाइल के रूल्स और फाइलों में बांधकर चला रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपनी बरबादी का सामान खुद तैयार कर रहे हैं। एरिक रीस हमें बताते हैं कि मॉडर्न मैनेजमेंट का मतलब सिर्फ बजट बनाना या एम्प्लॉई की अटेंडेंस चेक करना नहीं है। असली गेम तो एंटरप्रेन्योरियल मैनेजमेंट में है। इसका मतलब है कि आपकी कंपनी चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाए आपको अपनी हर टीम को एक छोटे स्टार्टअप की तरह ट्रीट करना होगा।

सोचिए, एक ऐसी बड़ी टेलिकॉम कंपनी के बारे में जो अपने नए ऐप को लॉन्च करने के लिए छह महीने तक सिर्फ मीटिंग्स ही करती रहती है। बॉस को लगता है कि वो बहुत डिसिप्लिन में काम कर रहे हैं लेकिन असल में वो सिर्फ एक ऐसी दीवार बना रहे हैं जिससे टकराकर नया आईडिया दम तोड़ देगा। अब जरा अपने पड़ोस के उस लड़के को देखिए जिसने अपने घर के गैरेज से बिना किसी फालतू कागजी कार्रवाई के एक हफ्ते में अपना बिजनेस ऑनलाइन कर दिया। यहाँ फर्क सिर्फ स्पीड का नहीं है बल्कि सोच का है। पुरानी मैनेजमेंट सोचती है कि फेल होना एक पाप है जबकि एंटरप्रेन्योरियल मैनेजमेंट कहता है कि फेल होना तो सीखने का पहला स्टेप है।

अगर आप एक मैनेजर हैं और अपनी टीम को हर छोटे काम के लिए परमिशन लेने पर मजबूर करते हैं तो आप उन्हें लीडर नहीं बल्कि रोबोट बना रहे हैं। और रोबोट कभी भी नया आईडिया नहीं लाते। द स्टार्टअप वे कहता है कि हर एम्प्लॉई के अंदर एक छोटा सा एंटरप्रेन्योर छिपा होता है। उसे बस थोड़ा सा खुला आसमान और फेल होने की आजादी चाहिए। जब आप अपनी कंपनी के हर डिपार्टमेंट को एक स्टार्टअप की तरह पावर देते हैं तो करिश्मा होता है। लोग सिर्फ सैलरी के लिए नहीं बल्कि अपने विजन के लिए काम करते हैं।

क्या आपने कभी किसी सरकारी दफ्तर में जाकर कोई नया आईडिया देने की कोशिश की है। वहाँ का क्लर्क आपको ऐसे देखेगा जैसे आपने उसका उधार मार लिया हो। बड़ी कंपनियों का हाल भी आजकल ऐसा ही हो गया है। वो इतने रूल्स बना देते हैं कि इनोवेशन दम घुटने से मर जाता है। एरिक रीस कहते हैं कि हमें इस ढांचे को तोड़ना होगा। हमें अपनी कंपनी में ऐसे छोटे छोटे ग्रुप्स बनाने होंगे जो बिना किसी डर के नए एक्सपेरिमेंट कर सकें।

जब आप अपनी टीम को ये भरोसा दिलाते हैं कि अगर उनका आईडिया फेल भी हुआ तो उनकी नौकरी नहीं जाएगी बल्कि उन्हें कुछ नया सीखने को मिलेगा तब जाकर असली प्रोग्रेस होती है। पुरानी सोच ये थी कि सब कुछ पहले से प्लान कर लो। नई सोच ये है कि छोटा सा स्टेप लो और देखो कि क्या होता है। यह सिर्फ बिजनेस की बात नहीं है बल्कि ये तो लाइफ का भी फंडा है। बिना रिस्क लिए तो आज के दौर में चाय की दुकान भी नहीं चलती और आप पूरी कंपनी चलाने की बात कर रहे हैं।


लेसन २ : इनोवेशन एकाउंटिंग और प्रोग्रेस

ज्यादातर बिजनेस मालिक अपनी प्रोग्रेस कैसे चेक करते हैं। वो अपना बैंक बैलेंस देखते हैं या फिर अपनी सेल्स रिपोर्ट। लेकिन अगर आप एक नया आईडिया मार्केट में उतार रहे हैं और सिर्फ पैसों को देख रहे हैं तो आप अपनी हार की स्क्रिप्ट लिख रहे हैं। एरिक रीस इसे वैनिटी मीट्रिक्स कहते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप जिम जाएं और अपना वजन कम होने के बजाय सिर्फ नए जिम कपड़ों में अपनी फोटो खिंचवाकर खुश हो जाएं। फोटो पर लाइक तो मिल जाएंगे लेकिन पेट कम नहीं होगा। बिजनेस में भी यही होता है। आप लाखों रुपये विज्ञापन पर फूंक कर अपनी वेबसाइट पर ट्रैफिक तो ले आते हैं लेकिन क्या वो लोग आपका प्रोडक्ट खरीद रहे हैं। क्या वो वापस आ रहे हैं। अगर जवाब नहीं है तो आपका बिजनेस सिर्फ एक सुंदर दिखने वाला गुब्बारा है जो किसी भी दिन फट सकता है।

असली खेल है इनोवेशन एकाउंटिंग का। इसका मतलब है कि आप यह मापें कि आपने कितनी लर्निंग की है। मान लीजिए आपने एक नया ऑनलाइन स्टोर शुरू किया। पहले हफ्ते में आपने देखा कि लोग आपकी वेबसाइट पर आ रहे हैं लेकिन पेमेंट पेज तक पहुँचते ही भाग जा रहे हैं। एक पुराना मैनेजर यहाँ चिल्लाना शुरू कर देगा कि सेल्स क्यों नहीं हो रही। लेकिन एक स्मार्ट लीडर यह देखेगा कि लोग पेमेंट पेज पर क्यों अटक रहे हैं। शायद आपका पेमेंट गेटवे बहुत स्लो है या फिर आपने इतने सारे फॉर्म भरने को कह दिया है कि ग्राहक का मन ही भर गया। यहाँ जो आपको समझ आया वो असली प्रोग्रेस है। इसे ही एरिक रीस 'वैलिडेटेड लर्निंग' कहते हैं।

भारत में बहुत से लोग स्टार्टअप सिर्फ इसलिए शुरू करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऑफिस में अपनी पसंद का फर्नीचर लगाना ही सफलता है। वो करोड़ों की फंडिंग लेकर बड़े ऑफिस ले लेते हैं और फिर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते हैं कि अब तो पैसा आ गया। फिर जब दो साल बाद बैंक अकाउंट खाली होता है तब उन्हें याद आता है कि उन्होंने तो कभी यह चेक ही नहीं किया कि कस्टमर को उनका प्रोडक्ट चाहिए भी या नहीं। यह वैसी ही बेवकूफी है जैसे शादी से पहले ही हनीमून की बुकिंग कर लेना और यह भी न पता होना कि लड़की शादी के लिए तैयार है भी या नहीं। बिजनेस में आपको छोटे छोटे प्रयोग करने होते हैं जिन्हें एम वी पी यानी मिनिमम वायेबल प्रोडक्ट कहते हैं।

अपनी प्रोग्रेस को ट्रैक करने के लिए आपको यह देखना होगा कि आपकी छोटी से छोटी एक्टिविटी क्या रिजल्ट दे रही है। क्या आपका हर नया फीचर कस्टमर की लाइफ आसान बना रहा है या फिर आप सिर्फ अपनी ईगो को संतुष्ट करने के लिए नए बटन जोड़ रहे हैं। अगर आप सही चीजों को नहीं माप रहे हैं तो आप एक अंधे पायलट की तरह हैं जो विमान को पूरी रफ्तार से उड़ा तो रहा है लेकिन उसे यह नहीं पता कि सामने पहाड़ है। इनोवेशन एकाउंटिंग आपको वो आंखें देती है जिससे आप धुंध में भी साफ देख पाते हैं।

याद रखिए प्रोग्रेस का मतलब सिर्फ आगे बढ़ना नहीं है। प्रोग्रेस का मतलब है सही दिशा में आगे बढ़ना। अगर आप गलत रास्ते पर 100 की स्पीड से कार चला रहे हैं तो आप अपनी मंजिल के करीब नहीं बल्कि खाई के करीब पहुँच रहे हैं। इसलिए हर हफ्ते खुद से पूछिए कि इस हफ्ते हमने ऐसा क्या नया सीखा जिससे हमारा बिजनेस कल से बेहतर हुआ। अगर आपके पास इसका जवाब नहीं है तो समझ लीजिए कि आप सिर्फ टाइम पास कर रहे हैं।


लेसन ३ : द स्टार्टअप वे और कल्चर ट्रांसफॉर्मेशन

अब बात करते हैं उस सबसे बड़ी दीवार की जो किसी भी कंपनी की तरक्की रोक देती है और वो है कंपनी का कल्चर। आपने अक्सर देखा होगा कि कुछ कंपनियाँ सालों तक एक ही जगह अटकी रहती हैं जबकि कुछ छोटे स्टार्टअप्स देखते ही देखते आसमान छू लेते हैं। इसका कारण पैसा या टेक्नोलॉजी नहीं बल्कि उनका काम करने का तरीका है। एरिक रीस कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी को मॉडर्न बनाना चाहते हैं तो आपको 'स्टार्टअप वे' को अपने डी एन ए में उतारना होगा। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप सिर्फ बोर्ड रूम की मीटिंग में डिस्कस करें और भूल जाएं। इसे आपको अपनी कंपनी के हर कोने में फैलाना होगा।

सोचिए एक ऐसे पुराने दफ्तर के बारे में जहाँ आज भी हर काम के लिए दस लोगों के साइन चाहिए होते हैं। वहाँ का कल्चर ऐसा है कि अगर किसी जूनियर ने कोई नया आईडिया दिया तो सीनियर उसे ऐसे घूरता है जैसे उसने कोई जुर्म कर दिया हो। ऐसे माहौल में कोई भी नया काम नहीं करना चाहता क्योंकि सबको डर लगता है कि कहीं कुछ गलत हो गया तो उनकी शामत आ जाएगी। यह कल्चर इनोवेशन का सबसे बड़ा दुश्मन है। एरिक रीस हमें सिखाते हैं कि एक लीडर का असली काम हुक्म चलाना नहीं बल्कि एक ऐसा माहौल बनाना है जहाँ हर कोई बिना डरे रिस्क ले सके। आपको अपनी कंपनी के अंदर एक 'इंटरनल स्टार्टअप' इकोसिस्टम बनाना होगा।

इसका मतलब यह है कि आपकी कंपनी में इनोवेशन कोई एक अलग डिपार्टमेंट नहीं होना चाहिए बल्कि यह हर किसी की जिम्मेदारी होनी चाहिए। जैसे एक घर में सफाई की जिम्मेदारी सिर्फ नौकर की नहीं बल्कि सबकी होती है वैसे ही कंपनी को बेहतर बनाने का काम सिर्फ सी ई ओ का नहीं है। आपको अपनी पुरानी और भारी भरकम पॉलिसी को कचरे के डिब्बे में डालना होगा और ऐसी फ्लेक्सिबल टीम्स बनानी होंगी जो खुद अपने फैसले ले सकें। जब लोग खुद को किसी प्रोजेक्ट का मालिक समझने लगते हैं तब वो अपनी पूरी जान लगा देते हैं। लेकिन अगर आप उन्हें सिर्फ एक नौकर की तरह ट्रीट करेंगे तो वो सिर्फ घड़ी देखकर घर जाने का इंतजार करेंगे।

कल्चर बदलने का मतलब यह भी है कि आपको अपनी हार को सेलिब्रेट करना सीखना होगा। हाँ आपने सही सुना। अगर कोई प्रोजेक्ट फेल होता है तो टीम को सजा देने के बजाय यह पूछिए कि हमने इससे क्या नया सीखा। जब तक आपकी कंपनी में गलती करने पर डांट पड़ती रहेगी तब तक कोई भी नया काम करने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा। एरिक रीस का मानना है कि जो कंपनियाँ अपने कल्चर को स्टार्टअप की तरह नहीं बदलतीं वो धीरे धीरे इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। नोकिया और कोडक जैसी बड़ी कंपनियों के साथ भी यही हुआ। उनके पास पैसा था टैलेंट था लेकिन उनके पास वो कल्चर नहीं था जो वक्त के साथ खुद को बदल सके।

अंत में याद रखिए कि बदलाव हमेशा ऊपर से शुरू होता है। अगर आप खुद एक लीडर होकर नई चीजों को अपनाने से डरेंगे तो आपकी टीम कभी भी रिस्क नहीं लेगी। आपको खुद एक रोल मॉडल बनना होगा। स्टार्टअप वे सिर्फ बिजनेस के लिए नहीं है बल्कि यह एक ऐसी सोच है जो आपको सिखाती है कि कैसे अनिश्चितता के दौर में भी आप टिके रह सकते हैं और जीत सकते हैं। अपनी कंपनी को एक बड़ी पुरानी जहाज की तरह मत बनाइए जिसे मोड़ने में घंटों लग जाएं बल्कि उसे छोटी छोटी तेज नावों का एक बेड़ा बनाइए जो किसी भी लहर का सामना कर सकें।


तो दोस्तों, क्या आप आज भी पुरानी सोच के गुलाम बने रहना चाहते हैं या फिर अपने अंदर के एंटरप्रेन्योर को जगाने के लिए तैयार हैं। अपनी लाइफ और बिजनेस में आज ही एक छोटा सा एक्सपेरिमेंट शुरू कीजिए और देखिए कि कैसे एक छोटा सा बदलाव आपकी पूरी दुनिया बदल देता है। अगर आपको ये लेसन पसंद आए तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना खुद का कुछ बड़ा शुरू करना चाहते हैं। कमेंट्स में बताएं कि आपका सबसे पसंदीदा लेसन कौन सा था।

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