आप सोचते हैं कि हर चीज में परफेक्ट बनकर आप बिजनेस के राजा बन जाएंगे। क्या जोक मारा है। इसी चक्कर में आप हर जगह एवरेज बनकर रह गए हैं और कस्टमर आपके पास आने से डरता है। क्या आपको भी अपना बिजनेस डूबाने का बहुत शौक है।
सक्सेसफुल बिजनेस का मतलब सबको खुश करना नहीं होता। फ्रांसिस फ्रेई और ऐन मॉरिस की बुक अनकॉमन सर्विस हमें सिखाती है कि कैसे जानबूझकर कुछ चीजों में खराब बनकर आप मार्केट के लीडर बन सकते हैं। आइए जानते हैं वो ३ लेसन्स जो आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : जानबूझकर खराब बनने की हिम्मत जुटाएं
ज्यादातर इंडियन बिजनेस ओनर्स के साथ एक बड़ी प्रॉब्लम है। वे चाहते हैं कि उनका शोरूम महल जैसा दिखे। रेट एकदम मिट्टी के भाव हों। स्टाफ ऐसा जो पैर धोकर पानी पिए। और सर्विस ऐसी जो पलक झपकते ही हो जाए। सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है। लेकिन असलियत में यह एक सुसाइड मिशन है। आप सुपरमैन बनने की कोशिश में जोकर बन जाते हैं। इस बुक का पहला और सबसे कड़वा लेसन यही है कि अगर आपको किसी एक चीज में भगवान बनना है, तो आपको किसी दूसरी चीज में जानबूझकर घटिया बनना पड़ेगा। इसे कहते हैं स्ट्रेटेजिक फेलियर।
मान लीजिए आप एक बजट होटल खोलते हैं। अब आप चाहते हैं कि वहां फाइव स्टार जैसी मखमली चादरें भी हों और कमरा सिर्फ पांच सौ रुपये में मिले। अगर आप चादरों पर पैसा खर्च करेंगे, तो आप बिजली का बिल नहीं भर पाएंगे। अगर आप स्टाफ को सूट पहनाएंगे, तो आप कस्टमर को सस्ता खाना नहीं दे पाएंगे। आप हर जगह छेद वाले गुब्बारे की तरह बन जाएंगे जो कभी उड़ नहीं सकता। सक्सेसफुल कंपनियाँ जैसे एयरएशिया या इंडिगो को देखिए। उन्होंने साफ कह दिया कि हम आपको उड़ने के लिए सस्ती सीट देंगे, लेकिन खाना फ्री में नहीं खिलाएंगे। वे जानते हैं कि उनका कस्टमर पैसे बचाना चाहता है, फ्री का समोसा खाना नहीं। उन्होंने जानबूझकर खाने की सर्विस को 'खराब' रखा ताकि वे टिकट के दाम में सबको पछाड़ सकें।
हम इंडियंस को हर चीज में डिस्काउंट और एक्स्ट्रा सर्विस की आदत है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप सब कुछ देने का वादा करते हैं, तो अंत में आप कुछ भी ढंग से नहीं दे पाते। आपका कस्टमर कंफ्यूज हो जाता है। वह समझ ही नहीं पाता कि आप सस्ते हैं या आप प्रीमियम हैं। इस चक्कर में आप एक ऐसी खिचड़ी बना देते हैं जिसे कोई खाना नहीं चाहता। आपको यह तय करना होगा कि आपकी 'सुपरपावर' क्या होगी। क्या आप सबसे तेज हैं। या आप सबसे सस्ते हैं। या आप सबसे यूनिक हैं। आप तीनों एक साथ नहीं हो सकते। यह कड़वा सच है।
सोचिए अगर एक डॉक्टर कहे कि वह हार्ट सर्जरी भी करेगा, दांत भी निकालेगा और आपके घर का नल भी ठीक कर देगा। क्या आप उसके पास जाएंगे। बिल्कुल नहीं। आप भाग खड़े होंगे। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है। जब आप अपनी कमजोरियों को गले लगाते हैं, तभी आप अपनी ताकत को निखार पाते हैं। यह सुनने में अजीब है कि खराब होना अच्छा है। लेकिन बिजनेस की दुनिया में यह बहुत बड़ी समझदारी है। अगर आप आज भी हर कस्टमर की हर डिमांड पूरी करने के पीछे भाग रहे हैं, तो यकीन मानिए आप सिर्फ अपनी बर्बादी के पेपर साइन कर रहे हैं।
असली विनर वह नहीं है जो सब कुछ करता है। असली विनर वह है जो जानता है कि उसे क्या नहीं करना है। जब आप अपनी सर्विस में से फालतू की चीजें हटा देते हैं, तो आपके पास वह पैसा और समय बचता है जिसे आप अपनी मेन सर्विस को वर्ल्ड क्लास बनाने में लगा सकते हैं। तो अगली बार जब कोई कस्टमर आपसे वह मांगे जो आपकी स्ट्रेंथ नहीं है, तो उसे प्यार से मना करना सीखें। यही वह कॉन्फिडेंस है जो एक मामूली दुकानदार को एक बड़े ब्रांड में बदल देता है।
लेसन २ : अपने एम्प्लॉई को बेचारा नहीं, बाहुबली बनाएं
अक्सर बिजनेस वाले यह गलती करते हैं कि वे सोचते हैं उनकी कंपनी सिर्फ सुपर टैलेंटेड लोगों के भरोसे चलेगी। उन्हें लगता है कि अगर हर एम्प्लॉई के पास हार्वर्ड की डिग्री होगी, तभी बिजनेस रॉकेट बनेगा। लेकिन भाई साहब, जमीन पर उतरिए। असलियत यह है कि आपको अपने काम के लिए सुपरमैन नहीं, बल्कि आम इंसान ही मिलेंगे। इस बुक का दूसरा बड़ा लेसन यही है कि अपनी सर्विस को ऐसे डिजाइन करें कि एक औसत दिमाग वाला इंसान भी उसे बेहतरीन तरीके से कर सके। अगर आपकी सर्विस आपके एम्प्लॉई की मेहनत पर नहीं, बल्कि आपकी बनाई हुई सिस्टम पर टिकी है, तभी आप चैन की नींद सो पाएंगे।
मान लीजिए आपने एक साउथ इंडियन रेस्टोरेंट खोला। अब आप उम्मीद करते हैं कि आपका हर वेटर कस्टमर को देखते ही उसका मूड पहचान ले और उसे उसकी पसंद का डोसा सजेस्ट करे। यह सुनने में तो फिल्मी लगता है, लेकिन असल में वह वेटर दिन भर की भागदौड़ से थका हुआ है। उसे बस यह याद रहता है कि टेबल नंबर पांच पर पानी देना है। अगर आप उस पर 'एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी' होने का दबाव डालेंगे, तो वह चिढ़ जाएगा और कस्टमर पर चिल्ला देगा। नतीजा क्या होगा। आपका बिजनेस ठप।
इसके बजाय, अगर आप एक ऐसी सिस्टम बनाएं जहां ऑर्डर लेना और सर्व करना इतना आसान हो कि कोई बच्चा भी कर ले, तो आपकी जीत पक्की है। जैसे कि डिजिटल मेन्यू या फिक्स्ड कॉम्बो। इसमें वेटर को दिमाग नहीं लगाना, बस सिस्टम को फॉलो करना है। जब एम्प्लॉई का काम आसान होता है, तो वह खुश रहता है। और जब वह खुश होता है, तो वह कस्टमर को मुस्कुराकर मिलता है। हम इंडियंस अक्सर एम्प्लॉई को गधा समझते हैं और उससे उम्मीद घोड़े वाली करते हैं। यह खुद के साथ और उसके साथ भी धोखा है।
जरा सोचिए, क्या आपने कभी किसी बैंक में घंटों लाइन में खड़े होकर उस क्लर्क को कोसा है जो धीरे काम कर रहा था। असल में गलती उस क्लर्क की नहीं, बल्कि उस बैंक की घटिया सिस्टम की है। उन्होंने अपने एम्प्लॉई को ऐसे टूल ही नहीं दिए जिससे वह जल्दी काम कर सके। एक अच्छी कंपनी अपने लोगों को फेल होने से बचाती है। वह उन्हें ऐसे प्रोसेस देती है जिसमें गलती की गुंजाइश ही न हो। जब काम सिंपल होता है, तो आउटपुट ग्रेट होता है।
ज्यादातर स्टार्टअप्स इसीलिए दम तोड़ देते हैं क्योंकि उनका पूरा बिजनेस किसी एक 'स्टार' एम्प्लॉई के सिर पर नाच रहा होता है। जिस दिन वह स्टार छोड़कर गया, आपका बिजनेस अंधेरे में डूब जाता है। क्या आप वाकई ऐसा रिस्क लेना चाहते हैं। समझदारी इसी में है कि आप टैलेंट की पूजा करना बंद करें और सिस्टम की पूजा शुरू करें। जब आपकी प्रोसेस मजबूत होगी, तो एक साधारण इंसान भी असाधारण रिजल्ट देगा। यही वह सीक्रेट है जो छोटे से कैफे को स्टारबक्स बना देता है।
लेसन ३ : सर्विस को कल्चर नहीं, एक ऑटोमैटिक मशीन बनाएं
अक्सर मोटिवेशनल स्पीकर्स कहते हैं कि अपने स्टाफ में जोश भर दो, उन्हें बड़ी-बड़ी बातें सिखाओ और सर्विस खुद बेहतर हो जाएगी। सुनने में यह बात बहुत कूल लगती है, लेकिन हकीकत में यह सिर्फ एक गुब्बारा है जो पहली ही मुश्किल में फूट जाता है। बुक का तीसरा और सबसे जरूरी लेसन यह है कि अच्छी सर्विस देना एम्प्लॉई की मर्ज़ी पर नहीं, बल्कि आपकी मशीन यानी आपकी सिस्टम पर निर्भर होना चाहिए। अगर आपकी सर्विस सिर्फ इसलिए अच्छी है क्योंकि आज आपका मैनेजर खुश है, तो जिस दिन उसका ब्रेकअप होगा, उस दिन आपका बिजनेस भी ब्रेकअप कर लेगा।
मान लीजिए आप एक ऑनलाइन कपड़ों का ब्रांड चलाते हैं। अगर आपका सिस्टम ऐसा है कि ऑर्डर आने के बाद एक लड़का पर्ची लिखता है, फिर दूसरा लड़का गोदाम में कपड़ा ढूंढता है और तीसरा उसे पैक करता है, तो आप बर्बादी के रास्ते पर हैं। यहाँ गलती होने के चांस १०० परसेंट हैं। कभी साइज गलत होगा, कभी एड्रेस। इसके बजाय, अगर आप एक ऐसी टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करें जहाँ बारकोड स्कैन होते ही पता चल जाए कि कौन सा पैकेट कहाँ जाना है, तो स्टाफ चाहे कितना भी थका हुआ या आलसी क्यों न हो, सर्विस परफेक्ट ही निकलेगी।
हम इंडियंस अक्सर 'जुगाड़' पर भरोसा करते हैं। हमें लगता है कि ऐन वक्त पर कुछ न कुछ कर लेंगे। लेकिन बड़े ब्रांड्स जुगाड़ पर नहीं, सिस्टम पर चलते हैं। जरा सोचिए, डोमिनोज का पिज्जा आधे घंटे में आपके घर कैसे पहुँच जाता है। क्या उनके पास उड़ने वाले घोड़े हैं। नहीं। उनके पास एक सेट सिस्टम है। किचन का लेआउट ऐसा है कि शेफ को एक कदम भी फालतू न चलना पड़े। जैसे ही ऑर्डर आता है, घड़ी टिक-टिक करने लगती है। यहाँ किसी को जोश की जरूरत नहीं है, बस सिस्टम को फॉलो करने की जरूरत है।
ज्यादातर बिजनेस ओनर्स शिकायत करते हैं कि अच्छे लोग नहीं मिलते। लेकिन सच तो यह है कि आपको अच्छे लोगों की नहीं, अच्छे स्ट्रक्चर की जरूरत है। जब आप अपनी सर्विस को एक रिपीट होने वाली प्रोसेस बना देते हैं, तो क्वालिटी हर बार एक जैसी रहती है। कस्टमर को यह पता होता है कि वह आपके पास जब भी आएगा, उसे वही शानदार एक्सपीरियंस मिलेगा। यही भरोसा ब्रांड बनाता है। अगर आप आज भी हर छोटी चीज के लिए खुद मौजूद रहते हैं, तो आप बिजनेस नहीं चला रहे, आप बस एक नौकरी कर रहे हैं जहाँ आप खुद ही बॉस और खुद ही नौकर हैं।
सर्विस कोई जादू नहीं है, यह एक साइंस है। जब आप जानबूझकर कुछ चीजों में पीछे हटते हैं, अपने स्टाफ के लिए काम आसान बनाते हैं और हर चीज को सिस्टम में बांध देते हैं, तब जन्म लेती है एक 'अनकॉमन सर्विस'। यह रास्ता थोड़ा मुश्किल है क्योंकि इसमें आपको अपनी ईगो छोड़नी पड़ती है, लेकिन यकीन मानिए, मंज़िल बहुत खूबसूरत है।
तो क्या आप अब भी हर किसी को खुश करने की नाकाम कोशिश करेंगे, या आज से अपनी 'अनकॉमन' पहचान बनाएंगे। अपने बिजनेस में उस एक चीज को चुनिए जिसमें आप सबसे खराब परफॉर्म करेंगे ताकि आप अपनी असली ताकत में नंबर वन बन सकें। नीचे कमेंट्स में बताइए कि आपका बिजनेस किस एक चीज के लिए जाना जाना चाहिए। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हर काम खुद करने की कोशिश में अपनी लाइफ खराब कर रहा है। चलिए, साथ मिलकर इंडिया के बिजनेस कल्चर को बदलते हैं।
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