Your Brain at Work (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आप एक साथ दस काम करके बहुत बड़े मल्टीटास्किंग किंग बन रहे हैं तो मुबारक हो आप सिर्फ अपने दिमाग का कबाड़ा कर रहे हैं। बिना फोकस के गधों की तरह मेहनत करके आप सिर्फ अपनी मेंटल एनर्जी और कीमती समय की बलि दे रहे हैं।

डेविड रॉक की बुक योर ब्रेन एट वर्क हमें सिखाती है कि कैसे हमारा दिमाग एक छोटे नाटक के स्टेज जैसा है जहाँ भीड़ जमा करके आप सिर्फ शोर मचा रहे हैं परफॉरमेंस नहीं। चलिए जानते हैं वो ३ सीक्रेट लेसन जो आपके काम करने के पुराने और थकाऊ तरीके को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : अपने दिमाग के स्टेज को समझें और इसे हाउसफुल न करें

सोचिए आप एक बहुत बड़े फिल्म डायरेक्टर हैं और आपके पास एक छोटा सा स्टेज है। अब इस छोटे से स्टेज पर आप शाहरुख खान को भी बुला लें और साथ में पूरी बारात भी नचाना चाहें तो क्या होगा। जाहिर है कि वहां सिर्फ भगदड़ मचेगी और कोई ढंग का सीन शूट नहीं हो पाएगा। हमारे दिमाग का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स यानी पीएफसी बिल्कुल इसी छोटे स्टेज की तरह काम करता है। यह वो जगह है जहाँ हम प्लानिंग करते हैं और मुश्किल फैसले लेते हैं। समस्या यह है कि हम इस नन्हे से स्टेज पर एक साथ दस एक्टर्स यानी दस अलग अलग काम चढ़ा देते हैं। हम चाहते हैं कि इसी वक्त हम ऑफिस की फाइल भी चेक कर लें और साथ में बगल वाले केबिन में चल रही गॉसिप पर भी नजर रखें। ऊपर से हमारा प्यारा मोबाइल फोन जो हर दो मिनट में नोटिफिकेशन के पटाखे फोड़ता रहता है।

सच तो यह है कि आपका दिमाग एक बार में एक ही हीरो को स्टेज पर देखना चाहता है। जब आप मल्टीटास्किंग के नाम पर खुद को बहुत बड़ा तीस मार खां समझते हैं तो असल में आप अपने दिमाग की बिजली फालतू में खर्च कर रहे होते हैं। जैसे ही आप एक काम से दूसरे काम पर जंप मारते हैं आपके स्टेज के एक्टर्स आपस में टकराकर गिर जाते हैं। फिर उन्हें दोबारा खड़ा करने और याद दिलाने में कि भाई करना क्या था बहुत ज्यादा मेंटल एनर्जी बर्बाद होती है। अगर आप सुबह उठते ही ईमेल चेक करने बैठ जाते हैं तो समझ लीजिए कि आपने स्टेज का कीमती टाइम और एनर्जी उन फालतू साइड एक्टर्स को दे दी जो फिल्म में शायद बैकग्राउंड में भी नहीं होने चाहिए थे।

लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि यार शाम तक आते आते दिमाग पूरी तरह खाली हो जाता है और समझ ही नहीं आता कि दिन भर किया क्या। इसका सीधा कारण यह है कि आपने अपने दिमाग के स्टेज को कभी शांत रहने ही नहीं दिया। आपने हर छोटे बड़े काम को एक बराबर इम्पोर्टेंस दे दी। अब अगर आप एक प्रोफेशनल की तरह काम करना चाहते हैं तो सबसे पहले यह तय कीजिए कि आज आपके स्टेज का मेन एक्टर कौन होगा। जो काम सबसे कठिन है और जिसमें सबसे ज्यादा दिमाग लगने वाला है उसे सबसे पहले स्टेज पर एंट्री दीजिए। जब वो अपना रोल खत्म कर ले तभी किसी दूसरे को आने की इजाजत दें। वरना आप बस स्टेज पर भीड़ बढ़ाते रहेंगे और आपकी परफॉरमेंस की रेटिंग जीरो ही रहेगी। इस स्टेज की कैपेसिटी बहुत लिमिटेड है इसलिए इसका किराया वसूलने के लिए आपको स्मार्ट बनना होगा। फालतू के नोटिफिकेशन और बिन बुलाए मेहमानों को स्टेज से बाहर का रास्ता दिखाइए तभी आपकी लाइफ की फिल्म ब्लॉकबस्टर बनेगी।

यह पहला लेसन हमें सिखाता है कि फोकस कोई जादू नहीं है बल्कि यह आपके मेंटल रिसोर्स को सही तरह से मैनेज करने का तरीका है। अगर आप अपने दिमाग को एक कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल करेंगे तो उसमें से खुशबू की उम्मीद मत रखिए। स्टेज को खाली रखिए और केवल वीआईपी परफॉरमेंस पर ध्यान दीजिए।


लेसन २ : दिमाग की लिमिटेड बैटरी और डिस्ट्रैक्शन का असली इलाज

हम सबको लगता है कि हमारा दिमाग किसी सुपरफास्ट चार्जिंग वाले स्मार्टफोन जैसा है जो पूरा दिन फुल पावर में चलेगा। पर हकीकत यह है कि आपके दिमाग की बैटरी बहुत ही नाजुक है और इसका सबसे बड़ा दुश्मन है डिस्ट्रैक्शन। डेविड रॉक कहते हैं कि हमारे दिमाग को किसी भी चीज पर फोकस करने के लिए बहुत ज्यादा ग्लूकोज और ऑक्सीजन की जरूरत होती है। अब आप खुद सोचिए कि जब आप सुबह फ्रेश उठते हैं तब आपकी मेंटल बैटरी 100% होती है। लेकिन आप क्या करते हैं। आप अपनी उस कीमती पावर को फेसबुक के मीम्स देखने या व्हाट्सएप ग्रुप की फालतू बहस में उड़ा देते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप अपने घर का इन्वर्टर सिर्फ एक छोटा सा बल्ब जलाने के लिए डिस्चार्ज कर दें और जब असल में पावर कट हो और एसी चलाने की जरूरत पड़े तब इन्वर्टर बोल जाए।

डिस्ट्रैक्शन सिर्फ आपका समय नहीं खाता बल्कि यह आपकी सोचने समझने की शक्ति का मर्डर कर देता है। जब भी आपके फोन की घंटी बजती है या कोई आकर आपसे कहता है कि भाई बस दो मिनट बात सुन ले तो आपका दिमाग उस वक्त चल रहे गहरे विचार को बीच में ही छोड़ देता है। वापस उसी पुराने लेवल के फोकस पर आने के लिए आपको कम से कम बीस मिनट की मेहनत करनी पड़ती है। मतलब आपने दो मिनट की गपशप के लिए अपने दिमाग की बीस मिनट की एफिशिएंसी को कूड़े में डाल दिया। लोग अक्सर कहते हैं कि मुझे तो शोर में काम करने की आदत है। भाई साहब आप खुद को धोखा दे रहे हैं। आपका दिमाग अंदर ही अंदर उस शोर को फिल्टर करने में इतनी एनर्जी लगा रहा है कि असली काम के लिए उसके पास सिर्फ बचा कुचा कचरा ही बचता है।

सच्चाई तो यह है कि डिस्ट्रैक्शन से लड़ना छोड़ दीजिए और उसे इग्नोर करना सीखिए। जैसे किसी शादी में बिन बुलाए रिश्तेदार को देखकर आप अपना रास्ता बदल लेते हैं वैसे ही अपने काम के बीच में आने वाले हर फालतू ख्याल और नोटिफिकेशन को इग्नोर मारिए। अपने सबसे मुश्किल और जरूरी काम को उस समय के लिए बचाकर रखिए जब आपका दिमाग सबसे ज्यादा अलर्ट होता है। ज्यादातर लोगों के लिए यह समय सुबह का होता है। उस वक्त अपने फोन को दूसरे कमरे में फेंक दीजिए या उसे एरोप्लेन मोड पर डाल दीजिए। दुनिया खत्म नहीं हो जाएगी अगर आप दो घंटे के लिए गायब हो जाएंगे। बल्कि अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आपकी अपनी ग्रोथ जरूर खत्म हो जाएगी।

स्मार्ट लोग जानते हैं कि कब उन्हें पूरी दुनिया से कट ऑफ होना है। वे अपने दिमाग की बैटरी को फालतू के एप्स और लोगों पर वेस्ट नहीं करते। जब आप अपनी ऊर्जा को बचाकर रखते हैं तो आप कम समय में वो कर पाते हैं जिसे करने में बाकी लोग पूरा हफ्ता निकाल देते हैं। इसलिए अपने दिमाग के चौकीदार बनिए और हर एरी गैरी सोच को अंदर घुसने की परमिशन मत दीजिए। याद रखिए कि आपका फोकस ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है और अगर आप इसे सबको मुफ्त में बांटते फिरेंगे तो आखिर में आप खुद कंगाल हो जाएंगे।


लेसन ३ : डोपामाइन का सही बैलेंस और प्रेशर को अपना दोस्त बनाना

क्या आपने कभी नोटिस किया है कि जब डेडलाइन सिर पर नाच रही होती है तब आपका दिमाग घोड़े की रफ्तार से दौड़ने लगता है। वही काम जो आप पिछले दस दिन से टाल रहे थे वो अचानक दो घंटे में खत्म हो जाता है। लोग इसे लास्ट मिनट पैनिक कहते हैं लेकिन डेविड रॉक इसे सही लेवल का अलर्टनेस कहते हैं। हमारे दिमाग को काम करने के लिए दो केमिकल चाहिए होते हैं डोपामाइन और नोरेपिनेफ्राइन। सरल भाषा में कहें तो डोपामाइन है इंटरेस्ट और नोरेपिनेफ्राइन है हल्का सा डर या अलर्टनेस। अगर ये दोनों सही मात्रा में नहीं हैं तो आपका दिमाग या तो सो जाएगा या फिर घबराहट में पागल हो जाएगा।

समस्या यह है कि हम या तो बहुत ज्यादा सुस्त होकर बैठ जाते हैं या फिर इतने ज्यादा स्ट्रेस में आ जाते हैं कि हाथ पैर फूलने लगते हैं। अगर आपका काम बोरिंग है तो आपका डोपामाइन लेवल जमीन पर गिर जाता है और आप बार बार अपना फोन चेक करने लगते हैं। वहीं दूसरी तरफ अगर काम बहुत ज्यादा बड़ा और डरावना है तो आपका दिमाग हाथ खड़े कर देता है। स्मार्ट तरीका यह है कि अपने दिमाग को हल्का सा चैलेंज दें। जैसे खुद से कहें कि मैं यह रिपोर्ट अगले तीस मिनट में खत्म करूँगा। यह छोटा सा चैलेंज आपके दिमाग में डोपामाइन का इंजेक्शन लगा देता है जिससे आप बोरियत से बाहर आ जाते हैं।

लेकिन याद रहे कि जरूरत से ज्यादा प्रेशर आपके दिमाग के उस छोटे स्टेज में आग लगा सकता है। अगर आप हमेशा ही टेंशन में रहेंगे तो आपकी क्रिएटिविटी दम तोड़ देगी। पीक परफॉरमेंस वो है जहाँ आप रिलैक्स भी हैं और अलर्ट भी। जैसे कोई माहिर बल्लेबाज पिच पर खड़ा होता है। वो न तो घबराता है और न ही सोता है। वो बस सही गेंद का इंतजार करता है। आपको भी अपने दिमाग के साथ यही खेल खेलना है। जब काम का बोझ बढ़ जाए तो एक छोटा सा ब्रेक लें और गहरी सांस लें ताकि आपका नर्वस सिस्टम ठंडा हो सके। और जब काम में मन न लगे तो उसे एक गेम की तरह देखें।


तो दोस्तों, योर ब्रेन एट वर्क हमें यही समझाती है कि सफलता केवल मेहनत से नहीं बल्कि दिमाग की इंजीनियरिंग को समझने से मिलती है। अगर आप अपने मेंटल स्टेज को भीड़ से बचाएंगे अपनी बैटरी को फालतू चीजों में वेस्ट नहीं करेंगे और अपने इमोशंस को बैलेंस में रखेंगे तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। आज ही तय कीजिए कि आप अपने दिमाग के मालिक बनेंगे या इसके गुलाम। उठिए और अपने काम करने के तरीके को बदलिए क्योंकि एक तेज दिमाग ही आपकी असली ताकत है।

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