अगर आपको लगता है कि आप न्यूज पढ़कर या वायरल वीडियो देखकर भविष्य की तैयारी कर रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का सामान खुद जुटा रहे हैं। भीड़ के पीछे भागने वालों को सिर्फ धूल मिलती है सक्सेस नहीं। जब तक आप सबकी तरह सोचना बंद नहीं करेंगे आप लाइफ में वही एवरेज इंसान बने रहेंगे जिसे दुनिया इग्नोर कर देती है।
आज हम रोहित भार्गव की मशहूर किताब नॉन ऑब्वियस मेगाट्रेंड्स की मदद से समझेंगे कि कैसे उन मौकों को पहचाना जाए जो सबके सामने होकर भी किसी को नहीं दिखते। चलिए जानते हैं वो ३ लेसन जो आपकी सोच और करियर को पूरी तरह बदल देंगे।
लेसन १ : क्यूरेशन की ताकत (The Power of Curation)
आज के समय में हम जानकारी के समंदर में डूबे हुए हैं पर प्यासे फिर भी हैं। हमारे फोन पर सुबह से शाम तक नोटिफिकेशन्स की बारिश होती रहती है। फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप तक हर जगह बस कंटेंट ही कंटेंट है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतनी जानकारी के बाद भी हम सही फैसले क्यों नहीं ले पाते? असल में प्रॉब्लम जानकारी की कमी नहीं है बल्कि जानकारी का शोर है। रोहित भार्गव कहते हैं कि भविष्य में वही इंसान राज करेगा जो एक अच्छा क्यूरेटर बनेगा। अब आप सोच रहे होंगे कि ये क्यूरेटर किस चिड़िया का नाम है? सरल भाषा में कहूँ तो क्यूरेटर वो होता है जो कचरे के ढेर में से हीरा ढूंढ निकालना जानता है।
मान लीजिए आप एक शादी में गए हैं और वहाँ खाने के ५०० स्टॉल्स लगे हैं। अब अगर आप हर स्टॉल पर जाकर सब कुछ खाने की कोशिश करेंगे तो अगले दिन आपका पेट खराब होना पक्का है। समझदार इंसान वही है जो भीड़ और शोर को इग्नोर करके सिर्फ अपनी पसंद और सेहत के हिसाब से बेहतरीन डिश चुनता है। बस यही लाइफ में भी करना है। लोग पागलों की तरह हर नई खबर और हर नए ट्रेंड के पीछे भागते हैं। उन्हें लगता है कि सब कुछ जानने से वो स्मार्ट बन जाएंगे। पर हकीकत में वो सिर्फ एक कन्फ्यूज्ड इंसान बनकर रह जाते हैं जो दूसरों की राय पर चलता है।
मार्केट में जब कोई नया स्मार्टफोन आता है तो रिव्यूज की बाढ़ आ जाती है। एक एवरेज इंसान ५० वीडियो देखता है और अंत में और भी ज्यादा कन्फ्यूज हो जाता है कि कौन सा फोन ले। वहीं एक स्मार्ट क्यूरेटर सिर्फ उन ३ एक्सपर्ट्स को फॉलो करता है जिनकी बातें लॉजिकल होती हैं। वो शोर को फिल्टर करना जानता है। अगर आप भी अपने करियर या बिजनेस में आगे बढ़ना चाहते हैं तो इन्फॉर्मेशन इकट्ठी करना बंद कीजिए और उसे क्यूरेट करना शुरू कीजिए। आपको सब कुछ जानने की जरूरत नहीं है। आपको बस वो जानना है जो वाकई मायने रखता है।
आजकल के इन्फ्लुएंसर्स को ही देख लीजिए। आधे से ज्यादा लोग बस वही बातें दोहरा रहे हैं जो दूसरे कह रहे हैं। अगर आप भी वही करेंगे तो आप बस एक कॉपी बनकर रह जाएंगे। क्यूरेशन का मतलब सिर्फ जानकारी चुनना नहीं है बल्कि उसे एक नया नजरिया देना भी है। जैसे एक म्यूजियम में हजारों पेंटिंग्स होती हैं पर क्यूरेटर उन्हें इस तरह सजाता है कि वो एक कहानी कहने लगती हैं। आपको भी अपनी नॉलेज को इस तरह जोड़ना होगा कि आप वो देख सकें जो बाकी लोग मिस कर रहे हैं। याद रखिए कि दुनिया आपको आपकी जानकारी के लिए नहीं बल्कि आपके नजरिए के लिए पैसा देती है। अगर आप वही देख रहे हैं जो पूरी दुनिया देख रही है तो आपकी वैल्यू जीरो है।
इस लेसन को अपनी लाइफ में उतारने का सबसे आसान तरीका है कि आप अपने इनपुट सोर्सेज को कम करें। उन लोगों को अनफॉलो करें जो सिर्फ शोर मचाते हैं। उन किताबों और आर्टिकल्स पर ध्यान दें जो आपको सोचने पर मजबूर करें न कि सिर्फ फैक्ट्स रटाएं। जब आप जानकारी को फिल्टर करना सीख जाते हैं तब आपके दिमाग में क्लैरिटी आती है। और यही क्लैरिटी आपको भीड़ से अलग खड़ा करती है। क्यूरेशन वो हुनर है जो आपको एक आम फॉलोअर से एक लीडर बना सकता है। तो क्या आप तैयार हैं अपने दिमाग के कचरे को साफ करके असली हीरे ढूंढने के लिए? क्योंकि असली पावर ज्यादा जानने में नहीं बल्कि सही जानने में है।
लेसन २ : नॉन ऑब्वियस सोच (Non Obvious Thinking)
क्यूरेशन के जरिए जब आप शोर को साफ कर लेते हैं तब जन्म होता है एक ऐसी शक्ति का जिसे रोहित भार्गव नॉन ऑब्वियस सोच कहते हैं। ज्यादातर लोग लाइफ में वही देखते हैं जो उन्हें दिखाया जाता है। इसे कहते हैं ऑब्वियस सोच। जैसे अगर बारिश हो रही है तो ऑब्वियस सोच कहेगी कि छाता निकालो। लेकिन एक नॉन ऑब्वियस सोच वाला इंसान यह सोचेगा कि इस बारिश की वजह से लोग घर से बाहर नहीं निकल रहे तो अब डिलीवरी बिजनेस में क्या बदलाव आएगा? असल में भविष्य को देखने के लिए आपको किसी जादू की छड़ी की जरूरत नहीं है बल्कि उन चीजों के बीच कनेक्शन ढूंढने की जरूरत है जिनका आपस में कोई रिश्ता ही नहीं दिखता।
मान लीजिए मार्केट में अचानक से लोग फिटनेस की तरफ भागने लगे हैं। अब एक साधारण बिजनेसमैन सोचेगा कि चलो जिम खोल लेते हैं या प्रोटीन पाउडर बेचने लगते हैं। यह बहुत ही ऑब्वियस है और यहाँ कंपटीशन इतना ज्यादा होगा कि आपकी सांस फूल जाएगी। लेकिन एक नॉन ऑब्वियस सोचने वाला बंदा देखेगा कि जब लोग जिम जाएंगे तो उनका स्क्रीन टाइम कम होगा या शायद उन्हें ऑफिस में पहनने के लिए ऐसे कपड़ों की जरूरत होगी जो कंफर्टेबल भी हों और प्रोफेशनल भी। वो जिम नहीं खोलेगा बल्कि शायद वह एथलीजर फैशन या हेल्थ डेटा मॉनिटरिंग में हाथ आजमाएगा। वह उस मोड़ पर खड़ा होगा जहाँ अभी भीड़ पहुँची ही नहीं है।
हमारी सबसे बड़ी प्रॉब्लम यह है कि हम एक्सपर्ट्स की बातों को पत्थर की लकीर मान लेते हैं। अगर किसी बड़े न्यूज चैनल ने कह दिया कि फलां इंडस्ट्री डूबने वाली है तो हम बिना दिमाग लगाए मान लेते हैं। लेकिन नॉन ऑब्वियस सोच आपको सवाल पूछना सिखाती है। यह आपको सिखाती है कि कैसे छोटे और बिखरे हुए संकेतों को जोड़कर एक बड़ी तस्वीर देखी जाती है। जैसे अगर आप देख रहे हैं कि आजकल के युवा अकेले रहना पसंद कर रहे हैं पर साथ ही वो पालतू जानवरों पर दिल खोलकर खर्च कर रहे हैं तो यह सिर्फ एक हॉबी नहीं है। यह एक मेगाट्रेंड है जो बता रहा है कि भविष्य में इमोशनल सपोर्ट वाली सर्विसेज की डिमांड बढ़ने वाली है।
अक्सर हम उन चीजों को इग्नोर कर देते हैं जो हमारे सामने होती हैं क्योंकि हम बहुत बड़ी और चमक-धमक वाली चीजों की तलाश में रहते हैं। रोहित भार्गव कहते हैं कि आपको एक ऐसा ऑब्जर्वर बनना होगा जो लोगों के व्यवहार को गौर से देखे। लोग क्या कह रहे हैं उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वो क्या कर रहे हैं। अगर आप किसी को हंसते हुए देख रहे हैं पर उसकी आंखों में थकान है तो यह एक संकेत है। बिजनेस और करियर में भी यही होता है। जब हर कोई एक ही दिशा में भाग रहा हो तो रुककर पीछे मुड़कर देखिए कि वो क्या है जो पीछे छूट गया है।
नॉन ऑब्वियस सोच विकसित करने के लिए आपको अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा। ऐसी किताबें पढ़िए जो आपके फील्ड की नहीं हैं। ऐसे लोगों से बात कीजिए जिनसे आपकी राय नहीं मिलती। जब आप अलग-अलग तरह के इनपुट्स को अपने दिमाग में डालते हैं तभी कुछ नया और अनोखा बाहर आता है। याद रखिए कि दुनिया के सबसे बड़े आविष्कार और बिजनेस आइडियाज हमेशा नॉन ऑब्वियस ही रहे हैं। चाहे वो ऊबर हो या एयरबीएनबी। शुरुआत में सबको ये आइडियाज बेवकूफी भरे लगे थे क्योंकि वो ऑब्वियस नहीं थे। लेकिन आज वही दुनिया को कंट्रोल कर रहे हैं। इसलिए भीड़ का हिस्सा मत बनिए बल्कि वो बनिए जो भीड़ के पीछे छिपे सच को देख सके।
लेसन ३ : ऑब्जर्वेशन का तरीका (The Haystack Method)
नॉन ऑब्वियस सोच विकसित करने के बाद सवाल आता है कि आखिर इसे हकीकत में कैसे लागू करें? रोहित भार्गव इसके लिए एक जबरदस्त तरीका बताते हैं जिसे वो 'द हेस्टैक मेथड' कहते हैं। कल्पना कीजिए कि जानकारी का एक बहुत बड़ा भूसे का ढेर है और आपको उसमें से सुई ढूंढनी है। आम आदमी भूसे को देखकर घबरा जाएगा या फिर पागलों की तरह उसमें हाथ मारेगा। लेकिन एक एक्सपर्ट ऑब्जर्वर भूसे के हर तिनके को गौर से देखेगा और उन्हें अलग-अलग ग्रुप्स में बांटेगा। यह प्रोसेस रैंडम नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत ही सोची-समझी टेक्निक है जो आपको भविष्य का भविष्यवक्ता बना सकती है।
इस मेथड के पांच बड़े स्टेप्स हैं। सबसे पहले आता है 'गैदरिंग' यानी जानकारी इकट्ठा करना। यहाँ आपको सिर्फ अपने काम की चीजें नहीं बल्कि हर वो चीज देखनी है जो अजीब या दिलचस्प लगे। जैसे मान लीजिए आप बस में सफर कर रहे हैं और देख रहे हैं कि आजकल लोग फोन पर गेम खेलने के बजाय पुराने बोर्ड गेम्स के ऐप्स ज्यादा यूज कर रहे हैं। इस छोटी सी बात को नोट कर लीजिए। दूसरा स्टेप है 'एग्रीगेटिंग'। यहाँ आप उन अलग-अलग जानकारियों को आपस में जोड़ते हैं। क्या बोर्ड गेम्स का बढ़ना और कैफे में लोगों का ग्रुप में बैठना किसी एक ही बड़े बदलाव की तरफ इशारा कर रहा है? शायद लोग डिजिटल दुनिया से थककर अब रियल ह्यूमन कनेक्शन ढूंढ रहे हैं।
तीसरा और सबसे मजेदार स्टेप है 'एलिवेटिंग'। यहाँ आप उन कनेक्शन को एक बड़ा नाम देते हैं यानी एक मेगाट्रेंड की पहचान करते हैं। इसे एक उदाहरण से समझिए। आजकल हर कोई अपनी प्राइवेसी को लेकर परेशान है पर साथ ही लोग अपनी हर छोटी बात सोशल मीडिया पर शेयर भी कर रहे हैं। एक साधारण इंसान इसे पाखंड कहेगा पर एक स्मार्ट ऑब्जर्वर इसे 'पब्लिक प्राइवेसी' का नाम देगा। यह एक ऐसा ट्रेंड है जहाँ लोग कंट्रोल भी चाहते हैं और अटेंशन भी। अगर आप इस विरोधाभास को समझ गए तो आप ऐसा प्रोडक्ट बना सकते हैं जो लोगों को यह दोनों चीजें एक साथ दे सके।
अगला स्टेप है 'नेमिंग'। जब आप किसी ट्रेंड को एक अनोखा नाम दे देते हैं तो वो आपके दिमाग में फिक्स हो जाता है और आप उसे बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर पाते हैं। और आखिरी स्टेप है 'प्रूवन'। यानी अपने अंदाजे को चेक करना कि क्या यह वाकई सच है या सिर्फ आपके दिमाग की उपज है। यह पूरा प्रोसेस सुनने में थोड़ा भारी लग सकता है पर असल में यह एक जासूसी खेल की तरह है। आपको बस अपनी आंखें और कान खुले रखने हैं। दुनिया के सबसे बड़े सफल लोग कोई भविष्य बताने वाले बाबा नहीं थे बल्कि वो बहुत अच्छे ऑब्जर्वर थे। उन्होंने बस वो छोटी कड़ियाँ जोड़ीं जिन्हें हम और आप नजरअंदाज कर देते हैं।
मान लीजिए आप एक कंटेंट क्रिएटर हैं। आप देख रहे हैं कि आजकल लोग बहुत लंबी वीडियोज भी देख रहे हैं और बहुत छोटे शॉर्ट्स भी। बीच वाली वीडियोज गायब हो रही हैं। यह एक इशारा है कि या तो लोगों को बहुत गहरी जानकारी चाहिए या फिर सिर्फ दो सेकंड का मनोरंजन। जो बीच में फंसेगा वो डूबेगा। यही हेस्टैक मेथड का कमाल है। यह आपको बताता है कि आपको कहाँ खड़ा होना है। जब आप इस तरह से सोचना शुरू करते हैं तो आप मार्केट की चाल से हमेशा दो कदम आगे रहते हैं।
अंत में बस इतना समझ लीजिए कि भविष्य कोई रहस्य नहीं है जो अचानक सामने आएगा। भविष्य छोटे-छोटे संकेतों में आज भी मौजूद है। जरूरत है तो बस उन संकेतों को पकड़ने वाली नजर की। अगर आप अपनी पुरानी घिसी-पिटी सोच को छोड़कर इस हेस्टैक मेथड को अपनाते हैं तो आप न सिर्फ अपने करियर को बचा पाएंगे बल्कि सफलता के उस मुकाम पर पहुँचेंगे जहाँ लोग आपसे पूछेंगे कि भाई तुझे पहले से कैसे पता था? याद रखिए कि किस्मत सिर्फ उन्हें मिलती है जो तैयारी के साथ मौके का इंतजार करते हैं। और मौका हमेशा नॉन ऑब्वियस ही होता है।
तो दोस्तों अब वक्त है कि आप अपनी आंखों से वो चश्मा उतारें जो दुनिया ने आपको पहनाया है। खुद देखिए खुद समझिए और खुद अपना भविष्य लिखिए। क्या आप अब भी वही देखेंगे जो सब देख रहे हैं या फिर आज से आप भी एक नॉन ऑब्वियस थिंकर बनेंगे? फैसला आपका है क्योंकि आपकी सोच ही आपकी तकदीर है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#FutureTrends #NonObvious #RohitBhargava #BusinessStrategy #Innovation
_